अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश को फिर से महान बनाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने दुनिया के कई देशों पर टैरिफ लगाया है। लेकिन अमेरिका में दिवालिया हो रही कंपनियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। अमेरिका में 2025 की पहली तिमाही में 188 बड़ी कंपनियां दिवालिया हुई हैं। पिछले साल की समान तिमाही की तुलना में यह 49 ज्यादा है। यह साल 2010 के बाद किसी एक तिमाही में दिवालिया होने वाले कंपनियों की सबसे बड़ी संख्या है। यहां तक कि 2020 की कोरोना महामारी में भी यह संख्या 150 के पार नहीं गई थी। इस तरह अमेरिका बड़ी कंपनियों के दिवालिया होने के मामले में 15 साल का रेकॉर्ड टूट गया है। पिछले साल देश में कुल 694 बड़ी कंपनियां दिवालिया हुई थीं।
2025 की पहली तिमाही में अमेरिका में सबसे ज्यादा इंडस्ट्रियल सेक्टर की 32 कंपनियां दिवालिया हुई। इसी तरह कंज्यूमर सेक्टर की 24 और हेल्थकेयर सेक्टर की 13 कंपनियों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। माना जा रहा है कि विदेशी सामान पर टैरिफ लगने से देश में महंगाई बढ़ सकती है और देश मंदी की चपेट में आ सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर 245 फीसदी टैरिफ लगाया है। इस कारण अमेरिका की कई कंपनियां चीन से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी में है। अगर वे अमेरिका में सामान बनाती हैं तो उनके लिए यह बहुत महंगा सौदा हो सकता है। यानी आने वाले दिनों में कई और कंपनियों के दिवालिया होने की आशंका है।
मंदी की आशंका
साल 2010 की पहली तिमाही में 254 कंपनियां दिवालिया हुई थीं जबकि पिछले साल पहली तिमाही में दिवालिया होने वाली कंपनियों की संख्या 139 थीं। जानकारों का कहना है कि कमजोर बैलेंस शीट वाली कंपनियों का मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। उनका डेट मैच्योर हो रहा है और ज्यादा ब्याज दर के कारण वे इसे रिफाइनेंस नहीं करा पा रही हैं। अब टैरिफ वॉर से उनकी स्थिति और बदतर होने जा रही है। महंगाई बढ़ने से लोग पैसा खर्च करने से परहेज करेंगे जिससे डिमांड में गिरावट होगी। इससे मंदी आ सकती है।
अर्थशास्त्री और निवेशक इसको लेकर क्या कुछ कह रहे हैं-
1- मंदी अमेरिका के कितने पास?
रायटर्स के इकॉनोमिस्ट पोल में 7 अप्रैल को कहा गया कि अगले 12 महीने में मंदी आने की 45 फीसदी संभावना है, जो दिसंबर 2023 के बाद सबसे ज्यादा है. इसकी वजह है 2025 को लेकर जीडीपी का पूर्वानुमान और कैपेक्स प्लान का गिरना. मूडी के विश्लेषक मार्क जिंदी मार्च 2025 के पॉडकास्ट में कहा कि 2025 के आखिर तक मंदी की करीब 40 फीसदी संभावना है. ब्लूमबर्ग के ओपिनयन में ऑथर जॉन ने कहा कि 2008 की गलत नीति की तरफ से वैसे फैसले लिए जा रहे हैं.
2-क्या अमेरिकी मंदी से आएगी वैश्विक मंदी?
अमेरिका में अगर मंदी आती है तो उसका असर उस स्थिति में वैश्विक होगा जब 2008 की तरह वित्तीय झटका लगेगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर इसका असर कम होगा. आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने वैश्विक मंदी की संभावना को खारिज करते हुए कहा कि साल 2001 में आयी अमेरिकी मंदी का वैश्विक स्तर पर असर नहीं हुआ था. दुनिया की जीडीपी 2.5 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही थी, लेकिन व्यापारिक ग्रोथ गिर गया था.
2007-09 के बीच वैश्विक मंदी छाई थी, जो पहला विश्व युद्ध के बाद पहली बार वैसी स्थिति बनी, जब जीडीपी 2009 में 1.3 प्रतिशत पर चली गई थी. हालांकि 2020 में लॉकडाउन की वजह से वैश्विक जीडीपी 3 प्रतिशत पर आ गई थी, जो 1945 के बाद पहली बार ऐसा हुआ. जाहिर है अगर ऐसी स्थिति में अमेरिका में मंदी आती भी है तो एक्सपर्ट्स का यही मानना है कि भारत पर कम से कम असर होगा.
क्रिस वुड बोले- भारत, चीन और यूरोप जैसे देशों का करें रुख
जेफरीज के ग्लोबल इक्विटी स्ट्रैटजिस्ट क्रिस वुड का मानना है कि अमेरिकी शेयर बाजार आने वाले समय में बाकी देशों के बाजारों से पीछे रह सकता है. इसकी वजह है कमजोर होता अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी बॉन्ड मार्केट में गिरावट. उनका कहना है यह सब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी की वजह से हो रहा है.
अपनी पॉपुलर रिपोर्ट ‘Greed & Fear’ में क्रिस वुड ने लिखा- ‘अमेरिकी स्टॉक्स अभी भी 19.2 के पीई रेशियो पर ट्रेड कर रहे हैं, जो महंगे माने जाते हैं. ऐसे में ग्लोबल इन्वेस्टर्स को अमेरिका में निवेश कम करके यूरोप, चीन और भारत जैसे देशों की ओर रुख करना चाहिए.’
अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत खतरे में
वुड ने ये भी कहा- ‘अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वो दुनिया की रिजर्व करेंसी छाप सकता है, लेकिन अब ये भी खतरे में दिख रही है.’ दरअसल, दुनिया के ज्यादातर देशों और बड़ी-बड़ी कंपनियों के बीच जो लेन-देन होता है, वो डॉलर में होता है. इसलिए डॉलर को ‘दुनिया की रिजर्व करेंसी’ कहा जाता है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हाल ही में हमने देखा कि अमेरिका का शेयर बाजार गिरा, साथ ही डॉलर और ट्रेजरी बॉन्ड्स में भी बिकवाली हुई – जो साफ इशारा कर रही है कि मंदी की आहट महसूस की जा रही है.’
वुड बोले – पिछले 30 सालों में कभी ऐसा नहीं देखा
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स को दुनियाभर में सबसे सुरक्षित निवेशों में गिना जाता है. जब भी दुनिया में कोई बड़ा संकट आता है, तो निवेशक घबरा जाते हैं और अपना पैसा सुरक्षित जगह पर लगाने लगते हैं. ऐसे में अक्सर उनकी पहली पसंद होती है: अमेरिका के सरकारी बॉन्ड्स और डॉलर. नतीजा? ट्रेजरी यील्ड्स (यानि ब्याज दरें) नीचे आ जाती हैं और डॉलर मज़बूत हो जाता है. लेकिन इस बार कुछ अलग ही हुआ.
वुड का कहना है कि पिछले 30 सालों में ऐसा कभी नहीं देखा कि जब बाजार में डर फैला हो, तब डॉलर कमजोर हो गया हो. वो याद दिलाते हुए बताते हैं- 1997 का एशियाई आर्थिक संकट, फिर LTCM नाम की एक बड़ी इन्वेस्टमेंट फर्म का डूबना, 2008 की सबप्राइम क्राइसिस और 2020 की कोरोना महामारी- इस सब के दौरान जब बाजार में डर का माहौल बना, तो निवेशकों ने तेजी से डॉलर खरीदा. इसका मतलब कि डॉलर मजबूत हो गया, क्योंकि लोग इसे सुरक्षित मानते थे.
लेकिन अब हालात उलटे हैं. हाल ही में एक इंटरव्यू में ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड के CIO एस. नरन ने भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि जब ग्लोबल स्टॉक मार्केट में गिरावट आई, खासकर ट्रंप के टैरिफ फैसलों के बाद तब निवेशकों ने डॉलर या बॉन्ड की तरफ भागने के बजाय, सोने को चुना. उनके शब्दों में -‘अबकी बार अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड्स बढ़ रही हैं. इसका मतलब है कि लोग अब ट्रेजरी को उस पुराने भरोसेमंद ‘सेफ हेवन’ के रूप में नहीं देख रहे. पहले जब बाजार गिरते थे, लोग डॉलर और ट्रेजरी में पनाह लेते थे. लेकिन इस बार तो सोना ही सबसे भरोसेमंद साथी बन गया है और यही सबसे ज्यादा चिंताजनक बात है.’







