भारतीय पुलिस सेवा से कुछ महीने पहले इस्तीफा देने वाले पूर्व IPS शिवदीप वामनराव लांडे ने अपनी नई पार्टी हिन्द सेना बनी ली है। इसकी उन्होंने औपचारिक घोषणा भी कर दी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी बिहार विधानसभा की सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। वे खुद भी चुनाव लड़ेंगे। महाराष्ट्र मूल के लांडे ने लोगों से मिले मान-सम्मान को देखते हुए बिहार को ही अपनी राजनीतिक जमीन बनाने का फैसला किया है। इसके साथ ही कयास लगने लगे हैं तेजतर्रार आईपीएस लांडे के मैदान में उतरने का कितना नफा-नुकसान किसे होगा। लांडे की चुनावी मैदान में उपस्थिति यकीनन नया वोट आधार तैयार करेगी। ऐसे में ये किस पार्टी या गठबंधन के वोटर होंगे, जो उनके साथ जाएंगे?
युवाओं को लेकर राजनीति करेंगे लांडे
शिवदीप लांडे ने कहा है कि वे युवाओं को लेकर राजनीति करेंगे। उनके हित के लिए संघर्ष करेंगे। प्रसंगवश यह जिक्र आवश्यक है कि इस बार चुनावी जंग में हर दल युवाओं के सहारे ही अपना सियासी हित साधना चाहता है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर युवाओं के मुद्दे पर मुखर रहे हैं। बीपीएससी की 70वीं परीक्षा में गड़बड़ी का आरोप जब अभ्यर्थियों ने लगाया तो प्रशांत किशोर ने उनका साथ दिया। पूर्व डेप्युटी सीएम और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी अपना ध्यान रोजगार-नौकरी के नाम पर युवकों को ही साधने की कोशिश कर रहे हैं। जेडीयू के नेता और सीएम नीतीश कुमार भी नौकरियां बांट कर युवाओं को अपनी ओर लाने का लगातार प्रयास करते रहे हैं।
बिहार में दो करोड़ से अधिक युवा हैं
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या 7.80 करोड़ है। इनमें 18-19 साल के सर्वाधिक कम उम्र के मतदाताओं की संख्या आठ लाख है। युवा में शुमार 30-39 आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 2.04 करोड़ है। सबकी निगाहें इन्हीं युवा वोटरों पर है, जो कुल मतदाताओं में तकरीबन चौथाई की हिस्सेदारी रखते हैं। युवा ही वह तबका है, जिसे पढ़ाई और नौकरी के लिए दो-चार होना पड़ रहा है। हालांकि पढ़ाई और नौकरी के मामले में दूसरे राज्यों के मुकाबले बिहार काफी आगे दिखता है, लेकिन अब भी सबको इसमें स्कोप दिखाई दे रहा है।
तेजस्वी का नौकरी दांव रहा था सफल
सवाल उठता है कि नवगठित राजनीतिक दलों के साथ पुरानी पार्टियों को भी युवाओं की अहमियत क्यों महसूस हो रही है? दरअसल तेजस्वी यादव ने 2020 के विधानसभा चुनाव में नौकरी और रोजगार के वादे पर महागठबंधन की झोली में खासी सीटें बटोर ली थीं। दर्जन भर सीटें उन्हें और मिल जातीं तो आज नीतीश कुमार की जगह तेजस्वी यादव ही सीएम होते। तेजस्वी की इस कामयाबी में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई थी। इसलिए कि जहां नीतीश कुमार ने आर्थिक कारणों से बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियां देने से मना कर दिया था, वहीं तेजस्वी यादव ने पहली ही कैबिनेट मीटिंग में 10 लाख को सरकारी नौकरी देने का वादा किया था।
फ्लोटिंग वोट के कई दावेदार दिख रहे
आमतौर पर यह माना जाता है कि ज्यादातर प्रौढ़ या बुजुर्ग मतदाता किसी न किसी दल के कोर वोटर होते हैं, जबकि युवा मतदाताओं का दिमाग कोरे स्लेट की तरह होता है। यानी ये फ्लोटिंग वोटर हैं। इन्हें जिस भी किसी दल या नेता पर विश्वास जम गया, वे उसी की ओर मुखातिब हो जाते हैं। बिहार में चूंकि ऐसे वोटरों की तादाद एक चौथाई है, इसलिए हर नया दल युवा को ही टार्गेट करता है। जन सुराज के प्रशांत किशोर भी युवाओं की बात शिद्दत से रखते हैं। अब हिन्द सेना के शिवदीप लांडे भी युवाओं को लेकर ही राजनीति करने की बात कह रहे हैं।
लांडे के उदय से किसे होगा नुकसान?
चुनावी मैदान में ताल ठोकने की शिवदीप लांडे की घोषणा के साथ ही यह चर्चा शुरू हो गई है कि वे किसे नुकसान पहुंचाएंगे? आरजेडी का युवाओं पर पहले से ही भरोसा बना हुआ है। प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज भी युवाओं पर ही अधिक भरोसा कर रही है। शिवदीप लांडे को भी युवा वोटरों से ही उम्मीद है। यानी एक चौथाई वोटों के लिए फिलवक्त तीन खिलाड़ी मैदान में होंगे। जाहिर है कि जब एक चौथाई वोटर तीनों राजनीतिक दलों में बंट जाएंगे तो इसका सर्वाधिक लाभ एनडीए की पार्टियों को होगा। इसलिए कि वे इन दलों की तरह उम्र और लिंग के आधार पर राजनीति नहीं करतीं। यानी वोटों का बंटवारा एनडीए के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। शायद इसीलिए सियासी गलियारे में ऐसी अफवाह भी है कि शिवदीप लांडे ने एनडीए के इशारे पर ही मैदान में उतरने का फैसला किया है। प्रशांत किशोर के बारे में भी इसी तरह की चर्चा होती रही है।






