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म्यांमार और थाईलैंड में आए विनाशकारी भूकंप के बाद बचाव कार्य अब भी जारी…………..

UB India News by UB India News
April 1, 2025
in खास खबर, दुर्घटना
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म्यांमार और थाईलैंड में आए विनाशकारी भूकंप के बाद बचाव कार्य अब भी जारी…………..
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म्यांमार और थाईलैंड में आए 7.7 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के बाद बचाव कार्य अब भी जारी है। म्यांमार में इस भूकंप में 1,700 से ज्यादा लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है। हालांकि, भूकंप से बड़े पैमाने पर इमारतों को नुकसान पहुंचा है, जिससे हजारों लोग जिंदा ही दफन हो गए। संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुमान के अनुसार, मरने वालों की संख्या 10,000 से अधिक हो सकती है। बताया जा रहा है कि इमारतों के मलबे में हजारों लोगों के दफन हैं। जिंदा बचे होने की उम्मीद में राहत और बचाव कार्य जारी है। जानते हैं-मलबे में दबे लोग कितने दिन तक जिंदा रह सकते हैं? एक जान बचाने पर कितना खर्च होता है?

गोल्डन ऑवर में जिंदा बचने की उम्मीद ज्यादा

एक्सपर्ट्स के अनुसार, जो लोग मलबे से जिंदा बचाए जाते हैं, उनमें से ज्यादातर भूकंप के 24 घंटे के भीतर मिल जाते हैं। इसे गोल्डन ऑवर्स कहा जाता है। इस 24 घंटे के बाद हर दिन के साथ लोगों के जिंदा मिलने की संभावनाएं की लगातार घटती जाती हैं। इसकी मुख्य वजह चोटें होती हैं। गिरने से लोगों को गंभीर चोटें लगी होती हैं और भले ही एकदम उनकी जान नहीं जाती लेकिन समय पर इलाज ना मिलने के कारण और कई बार बहुत मलबे के नीचे दबे हुए ही बहुत ज्यादा खून बह जाने के कारण उनकी जान चली जाती है।

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जिंदा बचे रहने में क्या बात मायने रखती है

विशेषज्ञों के अनुसार, लोगों की जिंदगी और मौत के बीच हवा और पानी की उपलब्धता मैटर करती है। अगर लोग गहरे कहीं दब गए हैं जहां हवा ठीक से उपलब्ध नहीं है तो दम घुटने से लोगों की जान चली जाती है। वहीं, पानी ना मिल पाने से भी लोगों की जान जा सकती है। इसके अलावा मौसम भी बहुत हद तक लोगों के बचे रहने के लिए जिम्मेदार हो सकता है। जैसे जब तुर्की और सीरया में जिस रात भूकंप आया, उस रात भी कई जगह बर्फ गिरी थी और तापमान माइनस 6 डिग्री सेल्सियस था। साथ ही कई इलाकों में बारिश भी हो रही थी। इससे बचाव कार्य में बेहद दिक्कत आती है। इसमें देरी होती है और जान जाने की आशंका बढ़ जाती है।

जापान में दादी और पोता जिंदा मिले थे

2011 में जापान में आए भूकंप और सूनामी के बाद एक किशोर और उसकी 80 वर्षीया दादी अपने घर के मलबे से नौ दिन बाद जिंदा मिले थे। उससे एक साल पहले हैती में भूकंप आया था। उस वक्त पोर्ट ओ प्रिंस में 16 साल की एक किशोरी 15 दिन बाद जिंदा मिल गई थी। बाद में भी ऐसी कई कहानियां सामने आ चुकी हैं।

जिंदा बचे होने की उम्मीद कब धुंधली पड़ जाती है

अमेरिका के मैसैचुसेट्स जनरल अस्पताल में इमरजेंसी और डिजास्टर मेडिसन एक्सपर्ट डॉ. जेरोन ली के अनुसार, आमतौर पर पांचवें से लेकर सातवें दिन के बाद मलबे के नीचे से किसी का जिंदा मिलना दुर्लभ ही होता है। ऐसे में अधिकतर राहत और बचाव दल उस वक्त तक लोगों की तलाश बंद कर देते हैं। मगर कई ऐसी कहानियां हैं जिनमें सात दिन बाद भी कुछ लोगों को जिंदा निकाला गया। दुर्भाग्य से ये बहुत ही दुर्लभ है।

पत्थरों और कंक्रीट से कुचले जाने से लगी चोटें

नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी फाइनबर्ग के मेडिकल स्कूल में इमरजेंसी मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ. जॉर्ज शियांपास कहते हैं कि लोगों की बचने की उम्मीद में सबसे बड़ा रोड़ा इमारत के पत्थरों या कंक्रीट के नीचे कुचले जाने से लगीं चोटें और अंगों का कट जाना होता है। वह कहते हैं, पहला घंटा गोल्डन ऑवर होता है। अगर आप उन्हें पहले घंटे में बाहर नहीं निकालते तो उनके बचने की संभावना बहुत कम होती है। नीचे वीडियो में दिख रहा है कि म्यांमार में भूकंप इतना जोर से आया कि पूरा अस्पताल ही हिलने लगा।

मलबे में दबे व्यक्ति की मनोस्थिति खराब

डॉ. शियांपास के अनुसार, पीड़ित की मानसिक स्थिति भी बहुत कुछ तय करती है। वह बताते हैं कि जो लोग शवों के साथ फंसे हों और किसी से संपर्क में ना हों, उनके उम्मीद छोड़ देने की संभावना ज्यादा होती है। वह कहते हैं, अगर आपके पास कोई है जो जिंदा है तो आप दोनों एक दूसरे का सहारा बन जाते हैं और संघर्ष करते रहते हैं।

चोट और हालात पर निर्भर है जिंदा बचे होने की उम्मीद

आखिर कब तक लोगों के जिंदा होने की उम्मीद में तलाश जारी रखी जानी चाहिए? इस पर एक्सपर्ट कहते हैं कि लोग हफ्ते भर तक मलबे के नीचे जिंदा रह सकते हैं। हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे किन हालात में फंसे हुए हैं, उन्हें गिरने की वजह से कितनी चोट लगी है। मौसमी हालात कैसे हैं? लोगों को जल्द से जल्द निकाला जा सके इसलिए म्यांमार और थाईलैंड में स्थानीय लोगों के अलावा विदेशों से भी बचाव टीम लगी है। मलबे में दफन लोगों को बचाने की उम्मीद बची हुई है।

बूढ़े या बीमार लोगों के बचे होने की उम्मीद कम

शियांपास के अनुसार, ऐसे लोगों के बचने की संभावना भी बहुत कम होती है जो बूढ़े या बीमार होते हैं और किसी तरह की दवा पर निर्भर होते हैं। साथ ही उम्र और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है।

युवाओं के बचे होने का चमत्कार ज्यादा

अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को की कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी में डॉ. क्रिस्टोफर कोलवेल भी इमरजेंसी मेडिसिन विशेषज्ञ हैं। वह कहते हैं-आप बहुत से अलग-अलग परिदृश्य देखते हैं, जिनमें कि लोगों को किसी चमत्कार की तरह बचा लिया गया और लोग बेहद भयानक परिस्थितियों में भी जिंदा रहे। वे अक्सर युवा लोग होते हैं और बहुत किस्मत वाले होते हैं कि किसी ऐसी जगह फंसे जहां उन्हें पानी या हवा जैसी चीजों की उपलब्धता रही।

खून बहने से हो जाती हैं ज्यादा मौतें

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में डिजास्टर और हेल्थ के प्रोफेसर इलान केलमेन के मुताबिक आम तौर पर भूकंप के बाद इमारतें ढह जाती हैं, जिसमें लोग दब जाते हैं। इस दौरान उन्हें चोट लगती है और यही मौत की मुख्य वजह होती है। लोगों की जान भले ही एकदम नहीं जाती, लेकिन समय पर इलाज न मिलने और बहुत ज्यादा खून बह जाने से मौत हो जाती है।

एक आदमी की जान बचाने में 8.5 करोड़ खर्च

कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भूकंप के मलबे में दबे किसी व्यक्ति के जीवन को बचाने के लिए औसत 8.5 करोड़ रुपए का खर्च आता है। केलमेन का मानना है कि भूकंप के बाद बचाव के लिए इन देशों में जितनी तेजी से पैसा खर्च हो रहा है, उतना पैसा आपदा को रोकने के लिए खर्च होता तो शायद आज ये स्थिति देखने को नहीं मिलती।

पानी के बिना पांचवें दिन दम तोड़ देते हैं लोग

केलमेन कहते हैं कि यह बहुत दुख की बात है कि बर्फबारी की वजह से लोगों को हाइपोथर्मिया संभव है और शायद इसी वजह से उनकी मौत हो जा रही होगी। पानी ना मिल पाने से भी लोगों की जान जा सकती है। जो लोग ठंड और कम चोट लगने के बाद बचे होते हैं उन्हें खाने और पानी की जरूरत होती है। पानी के बिना बहुत से लोग तीन से चार दिन तक जिंदा रह सकते हैं, लेकिन पांचवें दिन दम तोड़ सकते हैं।

मलबे में फंसे लोगों का बचाव कैसे होता है?

किसी स्थान पर भूकंप के बाद बचाव के कई तरीके हैं, जिनसे मलबे में फंसे लोगों को ढूंढा जा सकता है। इसमें एक तरीका बचाव दल के साथ मौजूद कुत्ते के जरिए मलबे में फंसे लोगों को खोजना भी है। प्रशिक्षित कुत्ते सबसे पहले मलबे को सूंघकर वहां फंसे लोगों के बारे में पता करते हैं। केलमेन के मुताबिक मैक्सिको के पास इस तरह के कुत्तों की एक टीम है जो किसी आपदा के बाद बचाव में अहम भूमिका निभाते हैं।

रोबोट और ड्रोन का भी किया जाता है इस्तेमाल

इसके अलावा भूकंप प्रभावित तंग गलियों और संकरी जगह में फंसे लोगों के बारे में पता करने के लिए रोबोट और ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे ही मलबे में फंसे इंसान के बारे में पता चलता है तो बचावकर्मी तुरंत उसे वहां से सुरक्षित बाहर निकालने की प्रोसेस में लग जाते हैं।

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