महाकुंभ मूल रूप से गरीबों और मध्यम वर्ग के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। देश के कोने-कोने से आए करोड़ों लोगों की श्रद्धा की अभिव्यक्ति का मंच बन गया। इतनी बड़ी संख्या में लोग आए कि उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी। अब इसके राजनीतिक नफे नुकसान की बात होगी। 66 करोड़ श्रद्धालु आए। उनके सियासी असर की बात होगी। मोदी और योगी को सफल आयोजन का श्रेय मिलेगा तो विरोधियों को बहुत तकलीफ होगी। अखिलेश यादव ने कुंभ में आने वाले लोगों की भावनाओं को समझने में काफी देर की। पहले सवाल उठाते रहे, लेकिन जब भक्तों की भीड़ देखी तो वह भी डुबकी लगा आए ताकि कल कोई ये न पूछ पाए कि वह महाकुंभ में स्नान करने क्यों नहीं गए।
कांग्रेस में 2 तरह के लोग दिखाई दिए। एक तरफ तो डीके शिवकुमार और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे नेताओं ने महाकुंभ में स्नान किया लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी नहीं आए। मैं हैरान हूं। अगर राहुल गांधी संगम में डुबकी लगा लेते तो क्या बिगड़ जाता? अगर उनका तर्क ये है कि ये उनका पर्सनल मामला है, तो फिर अपनी अनुपस्थिति से होने वाले राजनीतिक नुकसान के लिए भी तैयार रहना चाहिए। केजरीवाल ने तो कैमरे पर कहा था कि वो दिल्ली का चुनाव होने के बाद कुंभ जाएंगे पर उनकी लुटिया यहीं डूब गई। अब जब-जब चुनाव होंगे, योगी लोगों को याद दिलाएंगे कि ये सब चुनावी हिंदू हैं। राहुल, केजरीवाल और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।







