राज्य सरकार ने महाकुंभ मेले की पूर्णाहुति महाशिवरात्रि को कर दी है. मतलब ये है कि सरकारी तौर पर 26 फरवरी को महाकुंभ का समापन हो जाएगा. लेकिन क्या मेला इसी दिन खत्म हो जाएगा? महाशिवरात्रि के नहान पर मेले में जुटी भीड़ से मेला और प्रयागराज दोनों ठसाठस भरे हैं.लिहाजा समापन के सवाल का जवाब आसान नहीं है. इसका जवाब खोजने से पहले कुछ बातें समझ लेनी होंगी. जो लोग मेले और इलाहाबाद से जुड़े रहे हैं उनके बीच एक आमफहम जुमला चलता है. ‘मेला तो भगवान ही चलाते हैं. कोई सरकार कुछ नहीं करती.’
कैसे ‘गंगा मइया’ ही चलाती हैं मेला
मेले में आने वालों की तादात और मेले के खतरों को समझते हुए इसे सही भी कहा जा सकता है. अगर कोई विदेशी इंजीनियर आ कर मेले की व्यवस्था देखे तो चक्कर खा जाएगा. मेले में बिजली के तमाम तार तंबुओं के बीच फैले रहते हैं. रेत की ठंढ से बचने के लिए तंबुओं में श्रद्धालु सूखा पुआल बिछा कर रखते हैं. सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी कपड़े के तंबुओं में सर्दी से बचने के लिए हीटर जलाते हैं. जरा सी स्पार्किंग होने पर तंबुओं में आग लगने और उसके विकराल होने का बहुत अंदेशा रहता है.
एआई महाकुंभ मेले की कुछ ऐसी तस्वीर बना रहा है.
यकीन मानिए आग की उतनी घटनाएं नहीं होती, जितना कोई विशेषज्ञ देख कर अंदेशा जताएगा. भीड़ में आग बुझाने के दमकल को ले जाना भी बहुत मुश्किल होता है. फिर भी मेला और श्रद्धालु बचे रहते हैं. अलग-अलग इलाकों से मेले में आने वालों के संचारी रोगों की कोई जांच नहीं होती. फिर भी कोई विकराल संचारी रोग नहीं फैलता. तमाम कीटाणुओं की चर्चा वैज्ञानिक लैबोरेटरी में करते रहते हैं, लेकिन अकीददमंद भगवान भरोसे बचा रहते हैं. मेले में ड्यूटी पर लगाए गए पुलिस वालों की गिनती चाहे जितनी भी बड़ी हो, भीड़ के आगे उसका कोई मतलब नहीं होता. उसमें से भी बहुत सारे पुलिसकर्मी तो वीआईपी और अफसरों की खिदमत में लगे रहते हैं.







