नया साल 2025 आ गया है, लेकिन क्या यह भारत के लिए ‘अच्छे दिन’ लाएगा या फिर ‘बुरे दिन’? क्या हमारी अर्थव्यवस्था तरक्की की राह पर आगे बढ़ेगी या फिर गहरे संकट में फंस जाएगी? यह सवाल अक्सर मन में डर पैदा करते हैं. एक तरफ तेजी से बढ़ती तकनीक नए अवसर लेकर आ रही है, तो दूसरी तरफ वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता का माहौल है.
2024 की पहली तीन तिमाहियों में भले ही भारत की अर्थव्यवस्था थोड़ी धीमी रही, लेकिन भारत की दीर्घकालिक विकास कहानी बरकरार रहने की उम्मीद है. अगले 5 सालों में 6.5% के ग्रोथ रेट से दुनिया की सबसे तेजी बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बने रहने का अनुमान है.
चीन, जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों ने जब तरक्की की, तो उनकी ग्रोथ रेट 8% से भी ज्यादा थी. भारत की विकास दर 6% से ज्यादा तो है, पर सवाल है कि क्या इतना काफी होगा? भारत को 2030 तक हर साल 80 लाख नौकरियां चाहिए. क्या इतने ग्रोथ रेट से इतनी नौकरियां मिल पाएंगी? इन तमाम मुद्दों पर एबीपी न्यूज ने एसोचैम के पूर्व चीफ एडवाइजर डॉ जीपी श्रीवास्तव से विस्तार से बातचीत की.
2025 में भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य कैसा होगा?
इस पर एसोचैम के पूर्व चीफ एडवाइजर डॉ जीपी श्रीवास्तव ने बताया, 2025 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही चुनौती से भरा होने वाला है, लेकिन साथ ही ग्रोथ की अपार संभावनाएं भी होंगी. अगर भारत को अमेरिका और चीन जैसे देशों से आगे बढ़ना है तो बहुत सारे बदलाव की जरूरत है. इकॉनोमिक रिफॉर्म्स फिर से लाने होंगे, बैंकिंग सेक्टर की समीक्षा करनी होगी.
“आज की चुनौतियों के हिसाब से भले ही हमारी जरूरतें पूरी हो रही हैं, लेकिन जब आप एक विकसित देश बनाने के लिए आगे बढ़ेंगे तो अलग तरह की चुनौतियां होंगी. तब हमें न सिर्फ अपने देश की इकनॉमी की चिंता करनी होगी, बल्कि दूसरे देशों में क्या हो रहा है उसे भी चैलेंज करना होगा.”
डॉ जीपी श्रीवास्तव ने आगे कहा, ‘भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर में काफी अच्छा इंप्रूव्मेंट हुआ है. इसके अलावा आईटी, इलेक्ट्रोनिक्स, डिफेंस सेक्टर से भारत को काफी सहयोग मिल रहा है. लेकिन समस्या यह है कि दुनिया के बाकी देशों में अशांति है. युद्ध का माहौल बना हुआ है. देश के विकास के लिए कम से कम आसपास के देशों में शांति जरूरी है.’
2025 में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
1970 से भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले डॉ जीपी श्रीवास्तव ने बताया, ‘सबसे बड़ी चुनौती हमें भारत के फाइनेंशियल सेक्टर की होगी. अगर भारत का फाइनेंशियल सेक्टर मजबूत होगा, तभी हमारा FDI बढ़ेगा, तभी हमारा एक्सपोर्ट भी बढ़ेगा. जब हम कोई सामान इंपोर्ट करते हैं तो हमारा पेमेंट उनकी करेंसी के आधार पर होता है और जब हम एक्सपोर्ट करते हैं तो हमारे रुपये की वैल्यू के अनुसार पेमेंट मिलता है. तो देखा जाए तो एक्सपोर्टर को कुछ एडवांटेजेस हैं, उसे थोड़े ज्यादा पैसे मिल रहे हैं. इसलिए फाइनेंशियल सेक्टर मजबूत होना जरूरी है.’
दरअसल, सरकार, कंपनियों और आम लोगों का कर्ज बढ़ रहा है. अगर यह कर्ज कंट्रोल से बाहर हो जाता है, तो यह फाइनेंशियल सिस्टम को अस्थिर कर सकता है. बैंकों के पास फंसे हुए कर्ज (NPAs) की समस्या अभी भी बनी हुई है. अगर यह समस्या और बढ़ती है, तो बैंकों की लेंडिंग कैपेसिटी कम हो सकती है और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है. अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर, बढ़ती महंगाई और दूसरे वैश्विक कारक भारतीय फाइनेंशियल सेक्टर को प्रभावित कर सकते हैं. डिजिटल ट्रांजेक्शन बढ़ने के साथ साइबर सिक्योरिटी का खतरा भी बढ़ रहा है.
जीपी श्रीवास्तव ने ये भी कहा कि “एक समस्या यह भी है कि दुनिया के कई देशों में अशांति है. युद्ध का माहौल बना हुआ है. देश के विकास के लिए कम से कम आसपास के देशों में शांति जरूरी है. इस वजह से भारत को उन देशों पर काफी ज्यादा खर्च करना पड़ा रहा है. यही पैसा अगर इकनॉमी ग्रोथ में लगाया जाता, तो बहुत ही अच्छा रहता. अगर हर जगह कानून व्यवस्था बनी रहती है तो उसका इकनॉमी ग्रोथ पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा.”
वैश्विक मंदी का भारत पर क्या असर होगा?
यूरोप में जर्मनी जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था मुश्किलों में घिरी है. अमेरिका-चीन के साथ व्यापार में रुकावटें इसके उद्योगों पर भारी पड़ रही हैं, जिससे मंदी की आशंका बढ़ गई है. ब्रिटेन भी मंदी की कगार पर है. दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान भी अचानक मंदी की चपेट में आ गया. यह सब देखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या 2025 में दुनिया भर में मंदी का दौर शुरू हो जाएगा? अगर ऐसा होता है, तो इसका असर भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर क्या होगा?
इस पर भारतीय अर्थव्वस्था को गहराई से समझने वाले इकॉनोमिस्ट जीपी श्रीवास्तव ने बताया, ‘वैश्विक मंदी का असर दूसरे देशों पर अक्सर पड़ता ही है. भारत पर भी इसका असर जरूर होगा, लेकिन इसे एक एडवांटेज की तरह कैसे ले सकते हैं, ये हमारी पॉलिसी पर निर्भर करता है. क्योंकि इससे हमारा एक्सपोर्ट घट जाता है. दूसरे देशों की सामान खरीदने की क्षमता काफी कम हो जाती है.’
बढ़ती महंगाई और कर्ज का बोझ भारत के लिए चिंता का विषय है?
नवंबर 2024 में भारत की महंगाई दर घटकर 5.48% हो गई, जो पिछले महीने 6.21% थी. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुसार, महंगाई दर 4% के आस-पास रहना चाहिए, लेकिन यह अभी भी इस लक्ष्य से काफी ज्यादा है. वहीं मार्च 2024 तक केंद्र सरकार पर 173 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो मार्च 2020 में 86 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है.
भारत में बढ़ती महंगाई और कर्ज के बोझ पर अर्थशास्त्री जीपी श्रीवास्तव ने कहा, ‘देखिए महंगाई कम करना बहुत आसान है. अगर चाहें तो कुछ आसान उपाय अपनाकर महंगाई सरल और सीधे तरीके से कंट्रोल कर सकते हैं. लेकिन फिर उससे इकनॉमी ग्रोथ प्रति व्यक्ति आय कम हो जाएगी. जहां अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही होती है, वहां महंगाई दर का बढ़ना एक स्वाभाविक घटना है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में लोगों के पास ज्यादा पैसा होता है, जिससे चीजों और सेवाओं की मांग बढ़ जाती है. जब मांग आपूर्ति से ज्यादा होती है, तो कीमतें बढ़ने लगती हैं और इसी को महंगाई कहते हैं. अगर किसी सामान की कीमत बढ़ी है तो आपकी कमाई भी तो बढ़ी है.’
“अगर सिर्फ महंगाई रोकना ही मकसद है तो सारे सरकार प्रोजेक्ट को रोक दीजिए, सारे सोशल प्रोजेक्ट (जैसे- फ्री राशन) रोक दीजिए. ऐसे अपने आप ही बाजार में चीजें सस्ती हो जाएंगी. चीजें सस्ती तो हो जाएंगी, मगर आपके पास सामान खरीदने के लिए पैसे ही कहां होंगे. इसलिए अगर किसी भी देश की विकास दर ज्यादा है तो महंगाई भी ज्यादा ही होगी.”
क्या भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर और एजुकेशन की कमी विकास में बाधा बनती है?
इस सवाल का जवाब देते हुए अर्थशास्त्री जीपी श्रीवास्तव ने कहा, “शुरुआत में भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर और लोअर स्कूलिंग सिस्टम बहुत ही खराब रहा है. इसलिए भारत की विकास दर भी कम रही और भारत विकिसित राष्ट्र नहीं बना. जब बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतर एजुकेशन सिस्टम होगा, तभी आप परफॉर्म कर पाएंगे. इसलिए साल 2025 भारत के लिए सुनहरा होने वाला है. भारत में जितने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स आ रहे हैं, इनका इस साल अच्छा रिटर्न मिलेगा.”
अर्थशास्त्री जीपी श्रीवास्तव ने एक उदाहरण से अपनी बात समझायी. उन्होंने कहा, ‘जैसे सरकार ने दिल्ली से जयपुर 242 किमी लंबा नेशनल हाईवे (NH48) बनाया. इस वजह से आज तीन से साढ़े तीन घंटे में आसानी से सफर पूरा हो जाता है, क्या ये पहले संभव था? इस पर टोल टैक्स भी लगाया. लोग कहते हैं कि ये टोल प्लाजा अपने खर्चे से कई गुना ज्यादा पैसा वसूल कर चुका है. लेकिन दूसरी साइड देखें तो अब इस हाईवे पर नए-नए शॉपिंग कॉप्लेंक्स, पेट्रोल पंप, रेस्टॉरेंट खुल रहे हैं. इससे सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा है. इस तरह से जब भी इंफ्रास्ट्रक्चर डवलप होगा, उसका लॉन्ग टर्म में फायदा ही होगा.’
2025 में रोजगार की क्या संभावनाएं हैं?
एबीपी न्यूज ने अर्थशास्त्री जीपी श्रीवास्तव से भारत की रोजगार संभावनाओं पर भी सवाल पूछा. इस पर उन्होंने कहा, आजकल एक सोच ये बन गई है कि सरकारी दफ्तर या परमानेंट नौकरी करने वाला व्यक्ति को ही रोजगार माना जाता है. अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम करने वाले लोगों को रोजगार माना ही नहीं जाता है, ये सोच गलत है. असल में ज्यादातर लोग अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम कर रहे हैं. देखा जाए तो छोटे-मोटे काम करने वाले लोग, रेहड़ी-पटरी वाले दुकानदार लोअर सर्विस क्लास से काफी ज्यादा कमा लेते हैं. इन्हें बेरोजगार नहीं माना जा सकता है. ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. इनका भी भारत की इकॉनोमी में बहुत बड़ा योगदान है.
जीपी श्रीवास्तव ने आगे कहा, ‘पहले के मुकाबले आज भारत में बहुत अच्छी स्थिति है. बड़े स्तर पर देखें तो देश में बेरोजगारी बिल्कुल नहीं बढ़ी है. बल्कि देश में अब लोग लगातार नए-नए काम धंधा शुरू कर रहे हैं. भारत में काम के बहुत से अवसर पैदा हो रहे हैं और 2025 में रोजगार बढ़ने की संभावना है.’






