पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह का भाजपा से मन भर गया है। अब वे नई पार्टी बनाएंगे। बोले- ‘नई पार्टी, प्रदेश और समाज के लिए बहुत जरूरी है।’ वे शनिवार को मीडिया से मुखातिब थे। उन्होंने कहा- ‘राजनीतिक कार्यकर्ता बेहद निराश हैं। यह प्रदेश और समाज के लिए खतरनाक स्थिति है। प्रदेश और समाज की चौतरफा बेहतरी के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं में उत्साह की बहुत जरूरत है।
मैंने पिछले 4 महीनों में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया। कार्यकर्ता, शुभचिंतकों से लेकर आम लोगों से बात की। सबका यही कहना रहा कि राजनीतिक तौर पर कुछ नया होना चाहिए। नई पार्टी बननी चाहिए, जो सार्थक विकल्प हो। सो, हमने नई पार्टी बनाने की बात तय की है।’ उनके अनुसार, मैंने 6 अगस्त 2022 को जदयू छोड़ा। तब से बड़ी संख्या में नेता-कार्यकर्ता हमारे साथ हैं। मैंने इन सबका भी फीडबैक लिया। इन्होंने भी नई पार्टी बनाने की बात कही।
आरसीपी सिंह जदयू में ‘नेक्स्ट टू’ की हैसियत में रहे। जब नीतीश कुमार केंद्र में मंत्री थे, तब से आरसीपी उनके साथ रहे। नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनके साथ रहे। पार्टी संगठन से जुड़े। राज्यसभा भेजे गए। पार्टी के कोटे से केंद्र में मंत्री बने। हालांकि, उनका मंत्री बनना बहुत विवादास्पद रहा। खुद जदयू के बड़े नेताओं ने कहा कि वे अपने मन से मंत्री बन गए, जबकि पार्टी ने उनको केंद्रीय मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी के लिए भाजपा नेतृत्व से बात करने को कहा था। मगर वे खुद ही मंत्री बन गए। इसके बारे में जदयू नेतृत्व से सहमति नहीं ली।
आरसीपी पर भाजपा के साथ मिलकर जदयू को तोड़ने का आरोप लगा। राजीव रंजन सिंह ‘ललन’ आदि नेताओं ने उन्हें ‘भाजपाई एजेंट’ कहा। यहां तक की नीतीश कुमार ने भी काफी कुछ कहा। आरसीपी ने इन तमाम बातों को कई मौकों पर खारिज किया। कहा- ‘नीतीश कुमार को घेरे हुए कॉकस ने मुझे साजिशन उनसे दूर कर दिया।’ बहरहाल, आरसीपी जदयू छोड़कर भाजपा में आ गए।
तब जदयू, राजद के साथ मिलकर सरकार चला रहा था। कुछ दिन बाद जदयू खुद भाजपा के साथ हो गया। यह स्थिति आरसीपी के लिए बहुत परेशान करने वाली रही। जदयू के साथ होते ही भाजपा ने उनको ठंडा कर दिया। यानी कोई जिम्मेदारी या तवज्जो नहीं मिली। लोकसभा चुनाव के दौरान तो आरसीपी बिहार में दिखे भी नहीं। हां, इन सबके बाद पहली बार उनकी तरफदारी के पोस्टर-बैनर राजधानी में जरूर दिखे। इस पर लिखा था-टाइगर अभी जिंदा है।







