करप्शन के खिलाफ एक बड़े आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई। अब 12 साल बाद करप्शन के ही एक मामले में पार्टी का अस्तित्व दांव पर है। दिल्ली शराब घोटाला केस में पार्टी के मुखिया और दिल्ली के CM अरविंद केजरीवाल और डिप्टी CM रहे मनीष सिसोदिया जेल में हैं।
लंबे इंतजार के बाद 12 जुलाई को अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली, लेकिन रिहाई अटकी हुई है। अब केस में AAP को भी आरोपी बना दिया गया है। इन सबके बीच एक साल के अंदर मौजूदा विधायक, पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री समेत सैकड़ों कार्यकर्ता पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं।
पार्टी में मौजूद सोर्सेज ने बताया कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अब लोग दबी जुबान में ये चर्चा करने लगे हैं कि बिना लीडरशिप के पार्टी कितने दिन चलेगी। अरविंद केजरीवाल का जेल से सरकार चलाने का फैसला कहीं पार्टी को डुबो ना दे।
पार्टी छोड़कर गए पूर्व विधायक नितिन त्यागी और पूर्व मंत्री राजकुमार आनंद ने भी CM अरविंद केजरीवाल पर झूठे वादे करने और फिर विक्टिम कार्ड खेलने का आरोप लगाया है। हालांकि आम आदमी पार्टी इन आरोपों पर जवाब देने से बच रही है।
क्या वाकई AAP का अस्तित्व खतरे में है? क्या पार्टी लीडरशिप क्राइसिस से जूझ रही है, AAP में बगावती सुर के आरोप कितने सही हैं? पार्टी की सेकेंड लेयर जिम्मेदारी संभालने के लिए कितनी तैयार है? दैनिक भास्कर ने पार्टी छोड़कर गए लीडर्स, पॉलिटिकल एक्सपर्ट और पार्टी में मौजूद अपने सोर्सेज के जरिए इन तमाम सवालों के जवाब जानने की कोशिश की।
सबसे पहले एक्सपर्ट्स की राय…
सवाल: एक साल में इतने झटके लगने के बाद क्या AAP का अस्तित्व खतरे में है?
आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और सीनियर जर्नलिस्ट आशुतोष कहते हैं, ‘AAP के सामने अपना अस्तित्व बचाने का संकट है। शराब घोटाला ने इनकी मुश्किल बढ़ा रखी है। पार्टी के सबसे बड़े नेता जेल में हैं। पार्टी का कोई स्ट्रक्चर नहीं है। कोई सेकेंड लाइन और थर्ड लाइन लीडरशिप नहीं है। अब आप ही सोचिए कि पार्टी कैसे आगे बढ़ेगी।’
वे आगे कहते हैं, ‘दूसरी बड़ी पार्टियां किसी भी संकट से उबर सकती हैं। हर बड़ी पार्टी में प्रेसिडेंट और जनरल सेक्रेटरी होते हैं, लेकिन AAP का प्रेसिंडेट कौन है, क्या आपको पता है? पार्टी के जनरल सेक्रेटरीज कौन हैं, क्या आप जानते हैं? पूरी पार्टी सिर्फ एक आदमी के इर्द-गिर्द घूम रही है।’
सीनियर जर्नलिस्ट और पॉलिटिकल एनालिस्ट अभय दुबे की राय इससे बिल्कुल अलग है। वे पार्टी की यूएसपी उसका स्ट्रक्चर और आइडियोलॉजी का न होना मानते हैं। वे कहते हैं, ‘पार्टी का कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं है। हर पार्टी के पास कोई न कोई विचारधारा है, लेकिन इस पार्टी के पास कोई विचारधारा नहीं है। इसीलिए स्कॉलर्स ने इसे पोस्ट आइडियोलॉजी वाली पार्टी कहा है।’
‘ये पार्टी किसी कम्युनिटी या धर्म के लोगों के आधार पर नहीं खड़ी है। जैसे BJP ऊंची जातियों के आधार पर मजबूत है। समाजवादी पार्टी का आधार मुसलमान और यादव हैं। आम आदमी पार्टी एक अलग किस्म की पार्टी है और यही इसकी यूएसपी है। इसका स्वभाव तरल है, यानी समय के हिसाब से पार्टी में बदलाव होते रहते हैं।’
अभय दुबे आगे कहते हैं, ‘पार्टी अभी जरूर मुश्किल में है, लेकिन आगे भी स्थिति यही रहेगी, मुझे ऐसा नहीं लगता। अब माहौल थोड़ा बदला है। तभी हेमंत सोरेन छूटे और अरविंद केजरीवाल को राउज एवेन्यू कोर्ट ने बेल दी थी। ED ने पूरी ताकत लगा दी तब अरविंद को बाहर आने से रोक पाए।’
अभय दुबे का मानना है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर विधानसभा का रिजल्ट तय नहीं करना चाहिए। न ही AAP के अस्तित्व पर कोई खतरा है। वे कहते हैं, ‘विधानसभा चुनाव की जो पिच है, उसमें आम आदमी पार्टी BJP के मुकाबले बहुत मजबूत है। आज भी दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के कद का नेता BJP या कांग्रेस के पास नहीं है।’
हालांकि, आम आदमी पार्टी के अंदर मौजूद हमारे सोर्सेज बताते हैं, ‘अभी पार्टी में काफी खलबली है। इतना तो तय है कि आने वाले वक्त में पार्टी को और झटके लगेंगे। पार्टी के कई नेता अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। इसीलिए वे दूसरी पार्टियों से आए ऑफर को एकदम से रिजेक्ट नहीं करना चाहते हैं।’
सवाल: जेल से सरकार चलाने का फैसला केजरीवाल की जिद या रणनीति?
पॉलिटिकल एनालिस्ट अभय कुमार दुबे केजरीवाल के जेल से ही सरकार चलाने के सवाल पर कहते हैं, ‘CM पद से इस्तीफा न देना एक तय रणनीति का हिस्सा है। अगर केजरीवाल मुख्यमंत्री न होते तो उन्हें प्रचार के लिए बाहर निकलने का मौका नहीं मिलता। अगर विधानसभा चुनाव तक उन्हें जेल में रहना पड़ा तो उनकी यही रणनीति उन्हें प्रचार के लिए बाहर लाएगी।’
हालांकि, आशुतोष इसे नहीं मानते हैं। वे कहते हैं, ‘अरविंद केजरीवाल पार्टी के सबसे बडे़ नेता हैं। उन्हें संविधान में संभावना देखनी ही पड़ेगी, लेकिन उन्हें संविधान पर भरोसा ही नहीं है। वो अभी कितने दिन जेल में रहेंगे किसी को नहीं पता, लेकिन वो पद नहीं छोड़ना चाहते।’
AAP सरकार में मंत्री रहे राजकुमार आनंद भी केजरीवाल के जेल से सरकार चलाने के फैसले पर सवाल खड़े करते हैं। वे कहते हैं, ‘जेल से सरकार चलाने की जिद खुद उनकी है। उन्हें लगता है कि CM पद छोड़ेंगे, तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ेगा। हजारों करोड़ का शीशमहल छूट जाएगा।’
‘जब वो जेल जा रहे थे, तब जनता से कहा गया कि पार्टी के अंदर रेफरेंडम हुआ। इसके मुताबिक कार्यकर्ता चाहते हैं कि केजरीवाल जेल से सरकार चलाएं, लेकिन ये रेफरेंडम कैसे होते हैं, कौन नहीं जानता।’
सवाल: क्या अरविंद केजरीवाल की लीडरशिप कमजोर हुई है?
आशुतोष कहते हैं, ‘अरविंद केजरीवाल की लीडरशिप को न तब कोई चैलेंज था, न अब है। वे विनम्रता के साथ CM पद से इस्तीफा देकर किसी और को एक्टिंग CM बना सकते थे। फिर जेल से बाहर आकर खुद कुर्सी संभाल लेते, जैसा हेमंत सोरेन ने किया। उस स्थिति में वे ज्यादा लोकतांत्रिक लगते। केजरीवाल को लगता है कि वो कुर्सी छोड़ेंगे तो लड़ाई हार जाएंगे। ये अहंकार है।’
सुनीता केजरीवाल बीच में काफी एक्टिव हुई थीं। उस वक्त बातें ये भी थीं कि शायद वे मुख्यमंत्री बनें, लेकिन फिर जेल से सरकार चलाने का फैसला सामने आया। क्या सुनीता के नाम पर सब राजी नहीं हुए? इसके जवाब में आशुतोष कहते हैं, ‘मैंने पार्टी में काफी दिन तक काम किया है। अरविंद केजरीवाल खुद फैसले लेते हैं। भला किसकी हिम्मत थी कि उनके फैसले पर सवाल करे।’
‘उन्होंने किसी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया, क्योंकि वो नहीं चाहते थे। जेल का बदला वोट का स्लोगन भी केजरीवाल को सिंपैथी नहीं दिला पाया। इसके बाद भी उनकी जिद बरकरार है।’
सवाल: क्या स्वाति मालीवाल केस को लेकर पार्टी के अंदर नाराजगी है?
स्वाति मालीवाल केस ने AAP की मुश्किलें और बढ़ाईं। पार्टी के एक सीनियर लीडर ऑफ द रिकॉर्ड कहते हैं, ‘सबको चुप रहने का ऑर्डर मिला है, लेकिन पार्टी के अंदर इस मामले को लेकर गुस्सा है।’
वे आगे कहते है, ‘स्वाति मालीवाल पार्टी की पुरानी सदस्य हैं। वो पार्टी बनने से पहले से आंदोलनों और तमाम गतिविधियों से जुड़ी रहीं। उनके मामले में कम से कम विधायकों की एक बैठक तो होनी चाहिए थी। स्वाति मालीवाल पार्टी में CM की सबसे करीबी थीं। उन्होंने ये आरोप क्यों लगाए? उस पर साथ बैठकर चर्चा की जरूरत तक नहीं समझी गई।’
हालांकि इसका असर पार्टी की छवि पर कितना पड़ेगा? इसके जवाब में सीनियर जर्नलिस्ट अभय दुबे और आशुतोष दोनों एकमत हैं। इनका कहना है कि स्वाति मालीवाल के मामले से पार्टी को कोई बड़ा नुकसान न हुआ है, न होता दिख रहा है।’
अब बात AAP के बागियों की…
केजरीवाल पहले झूठे वादे करते हैं, फिर विक्टिम कार्ड खेलते हैं
AAP के पूर्व विधायक नितिन त्यागी को 7 जून, 2024 में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर निकाल दिया गया। कुछ ही दिनों बाद नितिन ने BJP जॉइन कर ली। वो पार्टी विरोधी गतिविधि क्या थी? हमने जब इसका जवाब जानने की कोशिश की तो पार्टी के एक पुराने कार्यकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर जवाब दिया।
उन्होंने बताया- ‘लोकसभा चुनाव में दिल्ली की महिलाओं को हर महीने 1000 रु. देने का वादा किया था। नितिन त्यागी, दिल्ली में लक्ष्मीनगर के कुछ कार्यकर्ताओं और पार्षदों ने अप्रैल में इस स्कीम पर सवाल खड़े किए। तभी से वे पार्टी के सीनियर लीडर्स के निशाने पर थे। विरोध किस बात को लेकर था, ये ज्यादा साफ नहीं था, लेकिन त्यागी के सस्पेंशन की वजह यही विरोध था।’
योजना के विरोध और सस्पेंशन की वजह जानने हमने नितिन त्यागी से भी बात की। वे बताते हैं, ‘योजना अच्छी थी, लेकिन नीयत नहीं। दरअसल ये योजना कभी लागू ही नहीं होनी थी। पार्टी का पहले से प्लान था कि सितंबर में हम कह देंगे कि लेफ्टिनेंट जनरल योजना को अप्रूव नहीं कर रहे। जैसा पहले ‘वन टाइम वाटर बिल सेटलमेंट स्कीम’ को लेकर किया था।’
वे आगे कहते हैं, ‘ये योजना 1 अगस्त, 2023 में लागू होनी थी, लेकिन कह दिया गया कि LG ने अप्रूव नहीं की। योजना लागू न होने का आरोप केंद्र की BJP सरकार पर लगा।’
‘जबकि सच तो ये है कि इस पर कभी कोई कैबिनेट नोट बना ही नहीं था। ना ही कोई बैठक हुई थी। योजना को प्रोसेस करने की कोशिश ही नहीं हुई थी। ये वादा सिर्फ खुद को विक्टिम दिखाने और केंद्र पर ठीकरा फोड़ने के लिए किया गया था।’
त्यागी कहते हैं, ‘1000 रु. वाली स्कीम को लेकर भी हमें कहा गया कि महिलाओं से फॉर्म भरवाओ। मैंने आवाज उठाई तो मुझे गद्दार और धोखेबाज कहा गया और सस्पेंड कर दिया गया। पार्टी में जो भी आवाज उठाता है, उसे BJP का एजेंट कह दिया जाता है।’
AAP के पूर्व मंत्री बोले: केजरीवाल और उनकी सरकार की नीयत ही खराब
हमने AAP सरकार में सोशल वेलफेयर मिनिस्ट्री संभाल चुके राजकुमार आनंद से भी बात की। राजकुमार भी मानते हैं कि सरकार की नीयत ही खराब है। ये पहले योजनाओं की घोषणा करते हैं। फिर विक्टिम कार्ड खेलते हैं कि LG अड़ंगा लगा रहे हैं। योजना को पास कराने की कोशिश नहीं करते।’
राजकुमार आगे कहते हैं, ‘बात 2015-16 की है। दिल्ली सरकार बुजुर्गों की पेंशन योजना LG से अप्रूव नहीं करा पा रही थी। मैंने CM से कहा तो जवाब मिला कि अप्रूव नहीं होगी, छोड़ दो। हालांकि मैं लगा रहा। 3-4 बार LG के यहां के चक्कर काटे। आखिरकार LG सहमत हुए और पेंशन योजना अप्रूव हुई।’
वे आगे कहते हैं, ‘दिल्ली में हर साल करीब 3000 करोड़ रुपए का SC-ST फंड एलोकेट होता है। ये फंड दलितों की बस्तियों, उनके बच्चों की पढ़ाई और दूसरी वेलफेयर स्कीम्स के लिए आता है, लेकिन इस फंड का बहुत मामूली सा हिस्सा ही उन पर खर्च होता है। बाकी दूसरे डिपार्टमेंट्स के खाते में चला जाता है।’
‘बच्चों के लिए फैलोशिप स्कीम्स लाई गईं। मंत्री रहते हुए मैं सैकड़ों बच्चों से मिला, लेकिन उसमें दलित नहीं थे। यही हाल दलितों की बस्तियों और उनके हिस्से की दूसरी योजनाओं का है।’
AAP के अंदर CM पद के कई दावेदार
पार्टी में इस वक्त लीडरशिप क्राइसिस साफ दिख रही है। अरविंद केजरीवाल किसी को लीडरशिप नहीं सौंपना चाहते, तो क्या पार्टी में कोई इस पद का दावेदार नहीं है? पार्टी के एक सीनियर लीडर इस पर कहते हैं, ‘ऐसे कई हैं, लेकिन कोई बोल नहीं पा रहा। या ये कहें कि किसी में हिम्मत नहीं है। आतिशी, संदीप पाठक, दुर्गेश पाठक, संजय सिंह और कई हैं।’
पूर्व AAP नेता नितिन त्यागी इस सवाल का बेहतर जवाब देते हैं। वे कहते हैं, ‘पार्टी के अंदर 5-6 CM हैं। मैंने लक्ष्मीनगर से जैसे ही इस्तीफा दिया, यहां के कैंडिडेट के लिए 5 नाम आए। एक आतिशी का कैंडिडेट है, तो दूसरे को संदीप पाठक ने आश्वासन दिया है।’
‘तीसरे को संजय सिंह ने तो चौथे को गोपाल राय और पांचवें को दुर्गेश पाठक ने दिया है। छठा मनीष सिसोदिया का भतीजा है। अगर पार्टी के अंदर दरारें नहीं होतीं, तो एक सीट के लिए 6-6 कैंडिडेट नहीं होते।’
आम आदमी पार्टी ने नहीं दिए सवालों के जवाब
अपने सवालों के जवाब जानने हमने AAP के सीनियर लीडर संजय सिंह और सौरभ भारद्वाज से बात करने की कोशिश की, लेकिन वो बात करने को राजी नहीं हुए। फिर हमने मीडिया कोऑर्डिनेटर को अपने सवाल भेजे, ताकि जवाब मिल सकें।
पहले सवालों के जवाब देने का आश्वासन मिला, लेकिन बाद में कहा गया कि अभी ज्यादा व्यस्तता है। पार्टी के अंदर बहुत कुछ चल रहा है। लिहाजा, जवाब देना मुमकिन नहीं।







