लोकसभा चुनाव के परिणाम आने और केंद्र में नई सरकार के गठन के बाद लोगों की नजर 2025 में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव पर टिक गई हैं। समय पर अगर विधानसभा चुनाव हुए तो अक्टूबर-नवंबर 2025 में होंगे। लेकिन, चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार समय से पहले विधानसभा चुनाव करवा सकते हैं।
बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के परफॉर्मेंस के आधार पर नीतीश कुमार समय से पहले विधानसभा चुनाव के मैदान में जा सकते हैं। हालांकि, जिन लोकसभा सीटों पर विधायकों की जीत हुई है, वहां उपचुनाव की तैयारी चल रही है।
आगे 6 पाॅइंट में समझेंगे कि बिहार की पॉलिटिकल सिचुएशन क्या है, कौन महत्वपूर्ण नेता क्या कह और कर रहे हैं। साथ ही जानेंगे कि चर्चा क्यों तेज है कि नीतीश कुमार समय से पहले क्यों चुनाव करा सकते हैं?
जानिए चर्चा क्यों है- नीतीश समय से पहले चुनाव करा सकते हैं
पहली बात यह कि नीतीश कुमार कई बार अफसरों के बीच सार्वजनिक मंच से कह चुके हैं कि चुनाव समय से पहले हो सकते हैं। इसको लेकर तैयार रहिए। विकास कार्यों को जल्दी निबटाइए। दूसरी बात यह कि नीतीश कुमार की पार्टी जदयू 16 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ी और 12 सीटों पर जीत हासिल की।
जदयू से दो मंत्री भी बनाए गए- रामनाथ ठाकुर और ललन सिंह। इससे नीतीश कुमार का हौसला बुलंद है। चर्चा इस बात की भी है कि इस बड़े जनादेश को नीतीश कुमार इस्तेमाल करेंगे और समय से पहले विधानसभा का चुनाव करवा सकते हैं।
नीतीश कुमार के बारे में आम राय यह है कि वे क्या फैसला लेंगे, यह वही जानते हैं, कोई दूसरा नहीं जानता। कई सीटों पर विधायकों ने दल-बदल किया है और उनकी सदस्यता रद्द नहीं हुई है।
विधानसभा में सीटों का हिसाब-किताब
बिहार में भविष्य की विधानसभा चुनाव की राजनीति पर बात करने से पहले जान लें कि अभी विधानसभा में किस पार्टी की क्या स्थिति है। विधानसभा की 243 सीटों में आरजेडी के 79, बीजेपी के 78, जेडीयू के 45, कांग्रेस के 19, माले के 12, हम पार्टी के 4, सीपीआई के 2, सीपीएम के दो, एआईएमआईएम के एक और दो निर्दलीय विधायक हैं।
फ्लोर टेस्ट के समय कई विधायक इधर से उधर हुए हैं, लेकिन अभी तक सिर्फ जदयू की बीमा भारती की ही सदस्यता गई है। वह पूर्णिया से राजद के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने गई थीं, लेकिन निर्दलीय पप्पू यादव से हार गई हैं। इस लिहाज से जदयू विधायकों की संख्या 44 हो गई है।
बता दें कि कांग्रेस के 2 विधायक, मुरारी गौतम और सिद्धार्थ सौरव भाजपा खेमे में चले गए। राजद के 5 में से 2 विधायक भाजपा में और 3 जदयू खेमे में गए हैं।
अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी और आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद जदयू खेमे में चले गए, जबकि प्रह्लाद यादव, भरत बिंद और सुनीता देवी बीजेपी खेमे में चली गई। लेकिन, इनकी सदस्यता अब भी कायम है।
कांग्रेस और राजद पहले ही बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करने का आग्रह विधानसभा अध्यक्ष से कर चुकी है। अभी विधानसभा अध्यक्ष भाजपा के नंद किशोर यादव हैं।
अब 6 सीन में बिहार की बदल रही राजनीति को समझिए:
सीन 1 – चिराग पर सभी की नजर
विधानसभा चुनाव-2020 की राजनीति यह थी कि भाजपा ने चिराग पासवान को पॉलिटिकल टूल के रूप में इस्तेमाल किया था। इस तरह 30 सीटों पर नीतीश कुमार की पार्टी को नुकसान पहुंचाया था।
चिराग ने जदयू के मंत्री और नीतीश कुमार के विश्वासी मंत्री अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी को लोजपा (रामविलास) का टिकट दिया और वह सांसद भी बन गई।
विधानसभा चुनाव में लोजपा के पारस गुट का क्या होगा, यह भी सवाल है। या तो दोनों अलग-अलग ही चलेंगे या चिराग की पार्टी में पारस की लोजपा का विलय हो सकता है।
बता दें लोजपा विधानसभा चुनाव अकेले 138 सीटों पर लड़ी थी। हालांकि, जीत सकी थी महज एक सीट। विधायक राजकुमार सिंह को भी बाद में नीतीश कुमार ने तोड़ कर मंत्री बना दिया था।
इस बार एनडीए के अंदर लोजपा (रा) यह कह सकती है कि वह पांच सीटों पर लोकसभा चुनाव जीती है। एक लोकसभा में छह विधानसभा हैं। इस लिहाज से उसे 30 से ज्यादा सीटें चाहिए।
सीन 2 – भाजपा फिर नीतीश के भरोसे
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी कह चुके हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में विधानसभा का चुनाव लड़ा जाएगा। मतलब साफ है एनडीए को बिहार में बहुमत मिलता है तो नीतीश सीएम होंगे और भाजपा से डिप्टी सीएम बनेंगे।
भाजपा उस तरह से एग्रेसिव नहीं दिखेगी, जैसा वह पहले सोच रही थी। अब बिहार में अकेले के दम पर सरकार नहीं बनाएगी।
सीन 3 – प्रशांत किशोर बड़ा दांव खेलने की तैयारी में
जन सुराज के प्रशांत किशोर इस बार विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत के साथ राजनीतिक पार्टी के रूप में उम्मीदवार उतारेंगे। वे ऐलान कर चुके हैं कि 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे। जीत का बड़ा दावा भी कर रहे हैं।
हालांकि, इस मामले में वे कोई चुनाव विश्लेषक के रूप में बयान नहीं दे रहे, बल्कि पॉलिटिकल पार्टी के सुप्रीमो की तरह बोल रहे हैं। जानकारी है कि उन्होंने बिहार की यात्रा के क्रम में ज्यादातर जिलों और प्रखंडों में अपने कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कर ली है। वे यह भी बोल चुके हैं कि बिहार जातीय सर्वे के अनुसार जातियों की ताकत को देखते हुए टिकट का बंटवारा करेंगे।
उन्होंने ऐसा किया तो दो बातें दिखेंगी- एक यह कि राष्ट्रीय व अन्य क्षेत्रीय पार्टियों पर दबाव बढ़ेगा। दूसरा यह कि वे अपने संगठन को भी मजबूत करेंगे। प्रशांत किशोर ब्राह्मण जाति से आते हैं, उन पर बिहार की यादव, कुर्मी, कुशवाहा, वैश्य जातियां कितना भरोसा करेंगी, यह अलग सवाल है। इस लिहाज से उनका जनाधार नहीं दिखता।
प्रशांत किशोर यह कोशिश कर सकते हैं कि मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी, ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम, उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा और पप्पू यादव जैसे नेताओं को साथ लाने का प्रयास करें। इसकी वजह है कि प्रशांत किशोर के साथ बड़ी पार्टियां नहीं जाएंगी। प्रशांत की खासियत यह है कि वे तेजस्वी यादव, नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की पार्टी को अंदर-बाहर से काफी जानते हैं।
सीन 4 – माले 50 से ज्यादा सीटें मांग सकती है
महागठबंधन में माले का मिजाज बम-बम है। वह तीन सीटों पर चुनाव लड़ी। आरा में भाजपा के केंद्रीय मंत्री आरके सिंह को माले नेता सुदामा प्रसाद ने हरा दिया और काराकाट में पवन सिंह व उपेन्द्र कुशवाहा को राजाराम सिंह ने हरा दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस 9 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़कर 3 पर जीती है।
विधानसभा चुनाव 2020 को देखें तो माले 19 सीट पर लड़ी थी और 12 पर जीती थी। जबकि, कांग्रेस 70 सीट पर लड़कर 19 सीट पर जीती थी। इसलिए इस बार माले महागठबंधन के अंदर ज्यादा सीटों की मांग करेगी। माले 243 में 50 से ज्यादा सीटें भी विधान सभा चुनाव लड़ने के लिए मांग सकती है। पिछली बार यही कहा गया था कि कांग्रेस को इतनी सीटें देने के बदले माले को कुछ और सीटें दी गईं होती तो तेजस्वी की सरकार बन जाती।
सीन 5 – मांझी भी इस बार ज्यादा सीट मांगेंगे
पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव से पहले कहा था कि आप अपनी पार्टी हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा का विलय जदयू में कर लें। मांझी ने अपने बेटे को मंत्री पद से हटाना कबूल कर लिया, लेकिन अपनी पार्टी का विलय नहीं किया। इस बार वो लोकसभा चुनाव जीत गए हैं। उनके बेटे संतोष सुमन पार्टी का जनाधार मजबूत करने में लगातार लगे हैं।
पिछले विधान सभा चुनाव में हम पार्टी 7 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें 4 जीतों पर जीत हासिल की थी। तीन सीटों पर हम पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी। इस बार हम पार्टी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। वह एनडीए में 10 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर सकती है।
सीन 6 – जिस पर खंजर भोंकने का आरोप लगाया उनके साथ मछली खा रहे मुकेश सहनी
मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी ने पिछली बार आरोप लगाया था कि तेजस्वी यादव ने अतिपिछड़ा के पीठ में खंजर भोंका है। तब प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी यादव ने महागठबंधन की साथी पार्टियों के लिए सीटों का ऐलान किया था, पर वीआईपी कितनी पर लड़ेगी, नहीं कहा था।
नतीजा रहा कि मुकेश सहनी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस का बहिष्कार कर दिया था। इस बार लोकसभा चुनाव में वे तेजस्वी यादव के साथ रहे। हेलिकॉप्टर की मदद से चुनावी सभाओं में साथ-साथ गए। साथ मछली खाते रहे। पिछली बार विधानसभा चुनाव में वीआईपी एनडीए के साथ थी और 11 सीटों पर लड़ी थी, जिसमें से 4 पर जीती थी।
इस लोकसभा चुनाव में महागठबंधन के साथ तीन सीटों पर लड़ी और सभी हार गई। 2025 के विधानसभा चुनाव में भी मुकेश सहनी के तेजस्वी यादव के साथ ही रहने की संभावना है।
प्रशांत किशोर का अपना कोई जनाधार नहीं है- संतोष कुमार
राजनीतिक विश्लेषक संतोष कुमार कहते हैं कि बिहार विधान सभा चुनाव को लेकर अगर प्रशांत किशोर की बात करें तो उनका अपना कोई जनाधार नहीं है। वे अच्छे मैनेजर हो सकते हैं। वे कोशिश करेंगे कि उपेन्द्र कुशवाहा, मायावती, ओवैसी की पार्टी को साथ लेकर एक नया फ्रंट बनाएं। इनके फ्रंट से ओवरऑल इंडिया गठबंधन को ही नुकसान होगा। एनडीए को ही इससे मजबूती मिलेगी।







