बिहार में बांकीपुर उपचुनाव की शोर है. मीडिया में कभी बीजेपी के प्रत्याशी बदलने तो कभी जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के खुद उपचुनाव में प्रत्याशी बनने की खबरें सुर्खियां बटोर रही है. हालांकि इन सुर्खियों में भी बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और उसके नेता तेजस्वी यादव नेपथ्य में हैं. इसी बीच राजधानी पटना में सेक्स रैकेट का विरोध करने वाले बंटी यादव की हत्या होती है. हत्या भी ऐसी वैसी नहीं, बिल्कुल विभत्स तरीके से. डेड बॉडी मिली पटना से करीब 60 किलोमीटर दूर अथमलगोला में. इस हत्याकांड के बाद आरजेडी का भला सोचने वालों को लगा कि अब बहुत हो गया, कम से कम अपने नेता की छुट्टियों में खलल डालकर उन्हें जगाया जाए. यूरोप में फैमिली के साथ छुट्टियां मनाने गए तेजस्वी यादव तक सूचना पहुंची की बंटी यादव की हत्या हो गई है.
बंटी यादव की मां से फोन कॉल पर बात कर तेजस्वी ने निभाई नेता प्रतिपक्ष की ड्यूटी
तेजस्वी यादव को लगा कि मसला बड़ा हो गया है, लेकिन इतना भी नहीं कि छुट्टियां रद्द कर झट से पटना पहुंचा जाए. सो उन्होंने एक फोन कॉल घुमाकर अपनी नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी पूरी कर ली. नेता प्रतिपक्ष यूरोप की ठंडी वादियों में रिलैक्स फरमा रहे हैं, इसलिए आरजेडी नेताओं की एक टोली पीड़ित के घर पहुंची और वहीं से फोन लगाकर बंटी की मम्मी से नेता प्रतिपक्ष की बात कराई.
जवान बेटे को खोने वाली मां बेचारी फोन कॉल पर तेजस्वी यादव को अपना दुखड़ा सुनाती रहीं. इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उनकी पुलिस के क्रियाकलाप की शिकायत भी कीं. दुख की इस घड़ी में बेचारी मां को क्या पता कि वह जिसके सामने अपना दुखड़ा रो रही हैं वह टूर पॉल्टिक्स करने वाले नेता तेजस्वी यादव हैं. उन्हें याद नहीं रहा कि नेता प्रतिपक्ष आरजेडी संस्थापक लालू प्रसाद यादव या उनकी पत्नी राबड़ी देवी नहीं हैं, जिनके पास कभी भी कोई भी अपना दुखड़ा लेकर पहुंच सकता था.
फोन कॉल पर दुखियारी मां कहती हैं- ‘जब से सम्राट चौधरी कुर्सी पर बैठे हैं वह आरजेडी को नहीं चाह रहे हैं.’ भले ही एक मां ने भावनाओं में बहकर ये लाइन कही हैं. लेकिन इसके मर्म को समझें तो मां की यह लाइन तेजस्वी यादव को यह जताने और जगाने की कोशिश है कि आप बिहार के नेता प्रतिपक्ष हैं. 2025 के विधानसभा चुनाव में तमाम वादों और घोषणाओं के बाद जनता ने आपको सत्ता सौंपने का भरोसा नहीं किया, बल्कि आपको अपनी आवाज बनने की जिम्मेदारी सौंपी है.
पटना जंक्शन के प्रसिद्ध महावीर मंदिर के पास बंटी यादव रेहड़ी पटरी पर दुकान लगाकर अपना रोजी रोटी कमाता था. उसे पता चलता है कि उसके इलाके में सेक्स रैकेट का धंधा चल रहा है. वह लड़का इसके खिलाफ आवाज उठाना शुरू करता है. इसके लिए वह पुलिस से भी शिकायत करता है. सीसीटीवी फुटेज वगैरह भी सौंपता है, लेकिन पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती है. इसी बीच 25 वर्षीय बंटी कुमार का 6 जुलाई को पटना जंक्शन के पास से किडनैपिंग होती है. बंटी के घरवाले बेटे की किडनैपिंग का सीसीटीवी फुटेज पुलिस को सौंपते हैं, इसके बाद भी पुलिस कुछ नहीं करती है. किडनैपर बंटी को बाईपास के जरिए मोकामा की तरफ ले जाते हैं. इसके बाद बख्तियारपुर-मोकामा फोरलेन के पास उसकी हत्या कर देते हैं. डेड बॉडी को अथमलगोला में जमीन के नीचे दबा दिया जाता है. शव की शिनाख्त ना हो पाए इसलिए उसके हाथों पर बने टैटू को खरोंचकर मिटाने का प्रयास होता है. पोस्टमार्टम में गोली मारने की नहीं, बल्कि पीटकर हत्या होने की बात कही जा रही है.
तेजस्वी ने नेता प्रतिपक्ष का मतलब छुट्टियां मनाने की जनता की इजाजत मान बैठे
25 सीटों पर सिमटने के बाद लगता है तेजस्वी यादव ने समझ लिया है कि बिहार की जनता ने उन्हें सत्ता नहीं सौंपकर छुट्टी मनाने की आजादी दे दी है. तभी तो वह चुनाव के बाद लगातार विदेश में छुट्टियां मनाने में व्यस्त हैं.
- नई सरकार बनने के बाद जब विधानसभा का पहला सत्र चल रहा था तब तेजस्वी यादव क्रिसमस और नये वर्ष के आगमन की छुट्टियां मनाने विदेश टूर पर थे.
- बिहार में जब नीतीश कुमार सीएम की कुर्सी छोड़ रहे थे और सम्राट चौधरी की ताजपोशी हो रही थी तब पूरा बिहार तलाश रहा था कि तेजस्वी यादव कहां हैं.
- बिहार में नई सरकार बनने के बाद तमाम चर्चित हत्याएं हुईं, रेड मारने गई पुलिस की ही चेकिंग. ईरान-अमेरिका और इजरायल युद्ध के चलते बढ़ी महंगाई, देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाए जाने से गाड़ियों के माइलेज घटने, ईंजन में खराबी पर बातें, अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी जैसी बड़ी घटना हुईं, लेकिन हर मौके पर बिहार की जनता अपने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की लोकेशन ही तलाशती रही.
- अब जब बांकीपुर उपचुनाव को लेकर इतनी बातें हो रही है, आरजेडी की प्रत्याशी रेखा गुप्ता नॉमिनेशन करने पहुंची तब भी तेजस्वी यादव नदारद.
भरत भूषण तिवारी हत्याकांड में भी तेजस्वी यादव गायब
समाज की लड़ाई लड़ने वाले भरत भूषण तिवारी का जब बिहार पुलिस ने एनकाउंटर किया तब भी तेजस्वी यादव गायब दिखे. आरा के बिलौटी गांव के लाल भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद जनता में स्वभाविक उबाल दिखा. इस युवा के दाह संस्कार में लोगों की भीड़ अपनी मर्जी से जमा हुई. सम्राट चौधरी की सरकार के प्रति पब्लिक का गुस्सा उबाल मार रहा था. इस हत्याकांड की शोर दिल्ली तक सुनाई दे रही थी, लेकिन जिस तेजस्वी यादव को बिहार में जनता ने अपनी आवाज बनने का मौका दिया है, वह पूरी तरह से चुप दिखे. इस चुप्पी का मैसेज यही गया कि भरत भूषण तिवारी ब्राह्मण समाज से आते थे, इसलिए तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी ने इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी 2005 से मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने का प्रयास कर रही है. हर चुनाव में आरोप लगते हैं कि आरजेडी को केवल यादव और मुस्लिम वोट देते हैं. तमाम राजनीति के जानकार कहते हैं कि यही वजह है कि आरजेडी सत्ता से लगातार दूर है. भरत तिवारी हत्याकांड से दूरी बनाकर तेजस्वी ने साबित कर दिया कि उनकी पार्टी पर जो भी आरोप लगते हैं वह कहीं से गलत नहीं है.
दूसरी तरफ लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान केंद्र और राज्य दोनों जगह सत्ता में भागीदार हैं. उनकी पार्टी पर भी आरोप है कि वह दलितों और खासकर पासवान जाति की राजनीति करते हैं. इसके बावजूद भरत तिवारी हत्याकांड में जनता के गुस्से का मूड भांपते हुए पीड़ित के घर पहुंचे. साथ ही सत्ता में रहते हुए भी सीएम सम्राट चौधरी की पुलिस को खूब खरी खोटी सुनाई. वहीं तेजस्वी यादव एक युवा की मौत पर भी जाति और वोटबैंक तलाशते रहे.
अगर तेजस्वी यादव को वाकई ए टू जेड की राजनीति करनी भी है तो उन्हें कम से कम पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव से कुछ सीखना चाहिए. अखिलेश यादव पर भी केवल यादव और मुस्लिम वोटबैंक का नेता होने के आरोप लगते रहे हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने इन आरोपों से बाहर आने के लिए केवल पांच यादव और चार मुस्लिमों को टिकट दिया. इसी का नतीजा दिखा कि यूपी का दलित समाज और गैर यादव ओबीसी जातियों ने समाजवादी पार्टी पर भरोसा कर पाया. अब अखिलेश इसी फॉर्मूले को 2027 के विधानसभा चुनाव में भी आजमाने का प्रयास कर रहे हैं. सफलता मिलेगी या नहीं, ये बात की बात है, लेकिन कम से कम वह प्रयास तो कर रहे हैं.
तेजस्वी जी! ए टू जेड का नारा देने से नहीं, उसे जमीन पर उतारना भी होगा
सत्ता पाने की लालच में तेजस्वी यादव ने 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों से ए टू जेड का नारा देना शुरू किया है. 2024 का लोकसभा चुनाव और 2025 का विधानसभा चुनाव गुजर गया, लेकिन बिहार की जनता ने तेजस्वी के इस नारे पर तनिक भी भरोसा नहीं किया है. क्योंकि जब उन्हें ए टू जेड निभाने का मौका आता है तब वह अपने समर्थन वाली जाति और धर्म तलाशने लगते हैं. हद तो तब हो गई है कि अब वह अपनी जाति के लोगों के साथ खड़े होने में भी सशरीर उपस्थित होने के बजाय फोन कॉल का सहारा लेने लगे हैं. सेक्स रैकेट चलाने वालों के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए जान गंवाने वाला बंटी भी यादव बिरादरी से है. ऐसे मौके पर स्वभाविक है कि यादव समाज सोच रहा होगा कि उनका नेता उनके साथ खड़ा होता, लेकिन उनका नेता तेजस्वी यादव तो यूरोप में छुट्टियां मना रहा है.
जमीन छोड़कर सोशल मीडिया के नेता हैं तेजस्वी यादव
2020 के बाद तेजस्वी यादव के पूरे राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो वह पूरी तरह से सोशल मीडिया के नेता बनकर रह गए हैं. उनके पिता लालू प्रसाद यादव ने गरीब, गुरबा और पिछड़ों को आवाज देने के लिए आरजेडी बनाई थी. उन्होंने इसका पालन करते हुए जमीन से जुड़े रहकर इसे काफी हद तक निभाया भी, लेकिन उनके लाडले तेजस्वी यादव जमीन से पूरी तरह उखड़े नजर आते हैं. कोरोना महामारी हो या कोई और मौका तेजस्वी पूरी तरह जमीन से उखड़े नजर आते हैं. एक तो वह पूरे पांच साल गायब रहते हैं, वहीं चुनाव के समय वह कभी एसी बस में बैठकर यात्रा करते हैं तो हेलीकॉप्टर से रैलियां. मौसम खराब होने पर बाई रोड जाने का कष्ट ना हो इसलिए मोबाइल पर रैलियों को संबोधित करते हैं. हां एक बात जरूर है कि वह विधानसभा में एकाध पर ताबड़तोड़ भाषण देकर उसके रील कटवाकर सोशल मीडिया पर वायरल जरूर करवाते हैं.







