भारत में आम तौर पर लोकसभा का चुनाव प्रधानमंत्री और उसके दावेदारों के लिए अग्निपरीक्षा माना जाता है, लेकिन इस बार 5 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए यह आम चुनाव ‘फ्लोर टेस्ट’ बना हुआ है.
कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में अगर ठीक से परफॉर्मेंस नहीं हुआ तो इन मुख्यमंत्रियों की कुर्सी संकट में आ सकती है.
इसमें सबसे पहला नाम हिमाचल के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू का है. हाल ही में हिमाचल में कांग्रेस के भीतर बड़ी बगावत हुई थी, लेकिन कांग्रेस हाईकमान की पहल पर यह बगावत कुछ दिनों के लिए टल गया था.
सुक्खू के अलावा इस फेहरिस्त में झारखंड के सीएम चंपाई सोरेन, आंध्र के सीएम जगनमोहन रेड्डी, बिहार के सीएम नीतीश कुमार और ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक का नाम भी प्रमुख रूप से शामिल हैं.
क्यों खतरे में हैं कुर्सी, एक-एक की कहानी समझिए…
1. नीतीश कुमार- इंडिया गठबंधन छोड़ एनडीए में शामिल होने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कुर्सी भी लोकसभा की वजह से दांव पर लगी हुई है. पहली बार नीतीश को एनडीए बिहार में छोटे भाई की भूमिका में रखा गया है.
जानकारों का कहना है कि लोकसभा का चुनाव नीतीश के लिए 2 वजहों से बड़ी अग्निपरीक्षा है.
- लोकसभा चुनाव में अगर नीतीश कुमार की पार्टी पिछली बार की तरह परफॉर्मेंस करने में नाकाम रहती है, तो नीतीश मोलभाव की स्थिति में नहीं रह पाएंगे.
- बिहार में कैबिनेट विस्तार की वजह से पार्टी के कई विधायक नाराज हैं. अगर लोकसभा में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहता है, तो इनमें टूट हो सकती है.
लोकसभा चुनाव 2019 में जेडीयू बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी और पार्टी ने 17 में से 16 सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी का परफॉर्मेंस काफी फिसड्डी साबित हुआ था.
2022 के एक घटनाक्रम में जेडीयू ने बीजेपी को छोड़ महागठबंधन का दामन थाम लिया था, लेकिन लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने को लेकर दोनों में जब सहमति नहीं बनी तो जेडीयू ने महागठबंधन से नाता तोड़ लिया.
वर्तमान में बिहार विधानसभा में जनता दल यूनाइटेड के पास 45, बीजेपी के पास 81 और हम के पास 4 सीट है. महागठबंधन के पास 111 और एआईएमआईएम के पास 1 सीट है. विधानसभा में एक निर्दलीय विधायक भी हैं.
2. चंपाई सोरेन- झारखंड के मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के लिए भी लोकसभा का चुनाव अग्निपरीक्षा माना जा रहा है. वजह दो है- पहला, झारखंड में हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद चंपाई को कुर्सी मिली है और अगर वे ठीक से परफॉर्मेंस नहीं कर पाते हैं, तो पार्टी के भीतर उनके खिलाफ माहौल बनेगा.
दूसरी वजह विधायकों का असंतोष है. झारखंड में जेएमएम और कांग्रेस की साझा सरकार है. दोनों दलों के कई विधायक नाराज हैं. हाल ही में शिबू सोरेन की बड़ी बहु और जामा से विधायक सीता सोरेन ने विधायकी से इस्तीफा दे दिया है.
कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में अगर गठबंधन का परफॉर्मेंस कमजोर रहा तो कई और इस्तीफे हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में चंपाई की कुर्सी खतरे में आ सकती है.
झारखंड में लोकसभा की 14 सीटें हैं, जिसमें से 12 पर अभी एनडीए का कब्जा है, जबकि 2019 में दो सीटों पर महागठबंधन (इंडिया गठबंधन) ने जीत दर्ज की थी.
3. सुखविंदर सिंह सुक्खू- हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कुर्सी भी लोकसभा चुनाव के परफॉर्मेंस पर टिकी है. हिमाचल में लोकसभा की कुल 4 सीटें हैं, जो अभी बीजेपी के कब्जे में है.
सुक्खू के कुर्सी पर संकट की भी 2 वजहें हैं-
1. हिमाचल में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा के 6 सीटों पर उपचुनाव में भी हैं. यह 6 सीटें अभी तक कांग्रेस के पास थी. अगर इन 6 सीटों पर कांग्रेस को हार मिलती है, तो सरकार गिर जाएगी.
2. लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव में अगर सुक्खू परफॉर्मेंस करने में नाकाम रहते हैं, तो प्रतिभा सिंह गुट का प्रेशर बढ़ेगा और सरकार फिर अस्थिर हो जाएगी.
68 विधानसभा सीटों वाली हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के पास वर्तमान में 34 सीट है. बीजेपी के पास 25 सीट है और उसे 3 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन प्राप्त है. राज्य की 6 सीटें अभी रिक्त है.
4. जगनमोहन रेड्डी- आंध्र प्रदेश के सीएम जगनमोहन रेड्डी की कुर्सी भी लोकसभा के चुनावी परफॉर्मेंस पर टिकी है. आंध्र में लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव भी होने हैं.
अब तक के जो आंकड़े हैं, उसके मुताबिक आंध्र में जो दल लोकसभा में बेहतरीन परफॉर्मेंस करती है, उसी दल को विधानसभा में भी चुनकर जनता भेजती है.
उदाहरण के लिए- 2014 में टीडीपी को आंध्र की लोकसभा सीटों पर एकतरफा जीत मिली थी और पार्टी ने विधानसभा में भी जीत हासिल कर सरकार बनाई थी.
2019 में जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस का भी परफॉर्मेंस कुछ इसी तरह का था.
इसी आंकड़े को देखते हुए टीडीपी ने लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के साथ बड़ा समझौता किया है. टीडीपी आंध्र में बीजेपी और पवन कल्याण की पार्टी के साथ मिलकर आंध्र का चुनाव लड़ेगी.
5. नवीन पटनायक- ओडिशा में भी लोकसभा के साथ विधानसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं. नवीन पटनायक यहां के मुख्यमंत्री हैं. 77 साल के पटनायक के लिए दोनों चुनाव में बेहतरीन परफॉर्मेंस की चुनौती है.
2019 में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव में भी नवीन की पार्टी का परफॉर्मेंस गिरा.
इस बार यहां पटनायक के लिए राह काफी मुश्किलें हैं. कांग्रेस और बीजेपी चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में जुटी है.
जहां सीएम की कुर्सी दांव पर वहां लोकसभा की 104 सीटें
देश के जिन 5 राज्यों में लोकसभा चुनाव की वजह से मुख्यमंत्रियों की कुर्सी दांव पर है, उन राज्यों में 104 सीटें हैं. सबसे ज्यादा बिहार में 40, आंध्र में 25, ओडिशा में 21, झारखंड में 14 और हिमाचल में 4 सीटें हैं.
इन 104 में से एनडीए के कब्जे में 63 सीट है, जबकि इंडिया गठबंधन के पास सिर्फ 4. आंध्र और ओडिशा में क्षेत्रीय पार्टियों के पास लोकसभा की ज्यादा सीटें हैं.







