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जंगलराज और सेक्युलरिज्म के झुले में कभी राजद की तरफ तो कभी बीजेपी की ओर………….

UB India News by UB India News
January 16, 2024
in खास खबर, पटना, मुख्यमंत्री
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जंगलराज और सेक्युलरिज्म के झुले में कभी राजद की तरफ तो कभी बीजेपी की ओर………….
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बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का यूएसपी सुशासन बाबू या विकास कुमार वाला है। इसके अलावे एक और उनके स्वभाव से मिलता सत्य है कि वे अक्सर राजनीतिक जगत को चौंकाते रहे हैं। याद कीजिए वह स्लोगन मिट्टी में मिल जाएंगे भाजपा में नहीं जाएंगे। पर नीतीश कुमार भाजपा में वापस आ कर चौंका दिया। इस चौंकाने वाली नीति में नीतीश कुमार ने दो शब्दों का भरपूर प्रयोग किया। एक शब्द रहा जंगलराज और दूसरा सेक्युलरिज्म। इन दो शब्दों की नीतीश कुमार ने झूले की तरह इस्तेमाल किया। कभी राजद की तरफ रुख किया तो कभी बीजेपी की ओर। कन्वेनर का पद ठुकराना भी नीतीश कुमार की राजनीति का वह हिस्सा रहा, जहां देश के राजनीतिज्ञों को चौंकना भी था और अपनी अविश्वसनीय को विश्वास के दायरे में लाना भी। आइये जानते हैं कि नीतीश के कन्वेनर पद ठुकराने के पीछे का स्टेप बाय स्टेप सच।

अविश्वसनीय हो चुके नीतीश का ट्रंप कार्ड
बिहार की राजनीत में अपने मन मुताबिक राजनीति को धार देने में नीतीश कुमार देश की राजनीति में अविश्वसनीय नायक बन गए थे। जिस तरह से अपने लोगों के कंधे पर सवार हो कर राजद के साथ गठबंधन बनाना और फिर भाजपा के साथ आ जाने के दो प्रसंग ने नीतीश कुमार की राजनीति को कठघरे में खड़ा कर दिया था। इस वजह से भाजपा का या राजद का साथ छोड़ा और पकड़ा उसके पीछे न तो राजद की राजनीति में कोई बदलाव आया और न ही भाजपा की। राजद पर भ्रष्टाचार के आरोप आज भी लगे हैं और दूसरी ओर भाजपा अपने हिंदुत्व की धार को निरंतर तेज ही करते रही। यही वजह है कि किसी ठोस कारण के सत्ता के नेचर में परिवर्तन करने के कारण नीतीश कुमार अविश्वसनीय हो गए थे। इस अविश्वसनीय शब्द से मुक्ति की ओर का राह बना यह पद ठुकराने का भाव।

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डिमांड और त्याग की राजनीति साथ-साथ
नीतीश कुमार की राजनीति का यह भी एक अलग अंदाज है। जहां अपने चाहने वालों से डिमांड की भरपूर आवाज उठाना और फिर पद की लालसा का नहीं दिखाना। इंडिया गठबंधन के सूत्रधार नीतीश कुमार थे। ऐसा कर नीतीश कुमार खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बरक्स एक चेहरे के रूप में प्रस्तुत भी किया। फिर अन्य राज्यों की लीडिंग पार्टी के नेताओं ने इनमें विश्वास भी किया। तेलंगाना के केसीआर,पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, तमिलनाडु के स्टालिन, महाराष्ट्र से उद्धव ठाकरे, दिल्ली से केजरीवाल तक का साथ मिला। इस साथ के भरोसे जदयू के तमाम वरीय नेताओं ने इन्हें पीएम के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू भी कर दिया। ऐसे में जदयू के रणनीतिकार इंडिया गठबंधन की पहली बैठक से कन्वेनर की भूमिका में नीतीश कुमार को देखना चाहते थे। वह भी उस स्वरूप में जो जिम्मेदारी वीपी सिंह ने उठाई और पीएम भी बने। पर यहां कांग्रेस की लंगड़ी मार पॉलिटिक्स ने जदयू के द्वारा तैयार हवाकिला भरभरा कर गिर गया। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के चेयरपर्सन में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद ही कन्वेनर पद के ठुकराने का आधारशीला रख दी गई थी।

कांग्रेस की चाकरी को ना
राजनीत के माहिर खिलाड़ी नीतीश कुमार जानते थे कि खरगे के चेयरपर्सन बनते ही कन्वेनर का पद एक डाकिया से ज्यादा नहीं था। एनडीए गठबंधन में अटल बिहारी वाजपेई की अध्यक्षता में जॉर्ज फर्नांडिस का हश्र देख चुके थे। अगर पहली बैठक में नीतीश कुमार को कन्वेनर बना दिया जाता तो वे सहर्ष स्वीकार भी करते। पर चार बैठकों के बाद आए इस प्रस्ताव में नीतीश कुमार की उस राजनीति पर आवाज उठाती कि नीतीश कुमार भी पद के लोभी हैं। यह ठुकराना राजनीति जगत में बन रही धरना को नकारना भी था।

आसान भी नहीं रह गया था कन्वेनर की भूमिका
जिस इंडिया गठबंधन की नींव नीतीश कुमार ने रखी थी, उसे बनाने में किए गए अथक परिश्रम भी उन्हें याद था। खास कर वे दल जो कांग्रेस विरोध की राजनीति से शीर्ष पर आए हैं। नीतीश कुमार जानते हैं यह समस्या उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और पंजाब में आज भी बनी हुई है। अब समय इतना कम है कि उनके बीच सीट शेयरिंग के मुद्दे को सुलझाना आसान नहीं है। और नीतीश कुमार जहां जानते हैं, असफलता सामने खड़ी है, उस ओर से मुख मोड़ना उनकी राजनीति का ही हिस्सा है।

और लक्ष्य तो पीएम की कुर्सी!
कई दशक तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार की राजनीति में पीएम की दावेदारी थोड़ी देर से आई। पर वह देश की राजनीति के हालात से सही समय भी था। दक्षिण में कांग्रेस उभर ही चुकी थी। उत्तर भारत में नीतीश कुमार एक स्वीकार्य नेता तो थे। यहां उनकी वरीयता भी एक आधार रही। अभी कई ऐसे राज्य हैं जहा विरोध की राजनीति कर रहे दलों के नेताओं के पिता के साथ नीतीश कुमार राजनीति कर चुके थे। हरियाणा में चौटाला परिवार, उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह, उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव के साथ राजनीति भी कर चुके हैं। यही वजह भी है कि नीतीश कुमार ने आप, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस युक्त इंडिया गठबंधन से जोड़ने में सफलता मिली। अब कन्वेनर पद के साथ उत्तर भारत का चेहरा नहीं बना जा सकता।

राजनीति के दो छोर के नायक भी हैं नीतीश कुमार
नीतीश कुमार की राजनीत का यह नेचर रहा है कि हमेशा वे दो ध्रुवों के बीच की राजनीति को जीवित रखते हैं। कांग्रेस से मिली निराशा का प्रकटीकरण कहीं न कहीं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आकर्षित करना भी है। ऐसे में जब वे पीएम अभियान में सफल नहीं होते तो भाजपा के दरवाजे क्यों बंद करेंगे। सीएम ही रहना है तो भाजपा क्यों नहीं? वैसी भी भाजपा और जदयू को नेचुरल एलायंस माना जाता रहा है। और दो ध्रुव की राजनीति के लिए उनके मोहरे छुटे रहते हैं, जिसका खुलासा पाला बदलने के बाद खुद नीतीश कुमार करते रहे हैं।

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