मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 6 नवंबर को जोधपुर की सरदारपुरा विधानसभा सीट से नामांकन भरा। नामांकन फॉर्म वेबसाइट पर अपलोड होते ही हंगामा हो गया।
विरोधियों ने चुनाव आयोग को शिकायत दी कि अशोक गहलोत ने नामांकन में क्रिमिनल केस की जानकारी छिपाई है। भाजपा के सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत ने गहलोत के खिलाफ कार्रवाई के लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन सौंपा।
भाजपा के शिकायत दर्ज कराने के बाद से सवाल उठ रहा है कि क्या शिकायत के आधार पर गहलोत का नामांकन खारिज हो सकता है और वे चुनाव लड़ने से वंचित हो सकते हैं?
पहले समझिए गहलोत के खिलाफ शिकायत क्या है?
6 नवंबर को जोधपुर की सरदारपुरा विधानसभा सीट से नामांकन दाखिल करने के बाद सीएम अशोक गहलोत के खिलाफ 2 शिकायतें हुई।
एक शिकायत जयपुर के पवन पारीक ने ऑनलाइन मुख्य निर्वाचन अधिकारी जयपुर और जोधपुर को की। दूसरी शिकायत एडवोकेट नाथू सिंह राठौड़ ने सरदारपुरा के रिटर्निंग ऑफिसर को शिकायत की।
दोनों शिकायतों में गहलोत के खिलाफ दो केस की जानकारी छुपाने का आरोप लगाया गया। शिकायतकर्ताओं ने चुनाव आयोग से अपील की है कि प्रत्याशी अशोक गहलोत ने उनके खिलाफ दर्ज 2 मामलों की जानकारी नामांकन पत्र में नहीं बताई है। उनके खिलाफ धारा 177, 419, 420, 467 और 471 के तहत मामला दर्ज होना चाहिए।
इसी के साथ चुनाव आयोग को भेजे पत्र में ये भी अपील की गई है कि अशोक गहलोत का नामांकन खारिज करते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए। शिकायत मिलने के बाद जिला निर्वाचन अधिकारी ने रिटर्निंग अधिकारी से मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

पहली शिकायत : ट्रस्ट को करोड़ों की जमीन लाखों में देने का मामला छिपाया
जयपुर के गांधी नगर थाने में 8 सितंबर 2015 को संजय, प्रभात मिश्रा और सीताराम ने चंपा देवी चैरिटेबल ट्रस्ट को करोड़ों की जमीन लाखों में देने का मामला दर्ज करवाया था। मामले की जांच पुलिस मुख्यालय सीआईडी सीबी में तैनात एडिशनल एसपी योगिता मीणा ने की है।
पुलिस की शुरुआती जांच के अनुसार वर्ष 2003 में चंपा देवी चैरिटेबल ट्रस्ट को विद्याधर नगर सेक्टर छह में स्थित 5400 और 4065 वर्गमीटर जमीन के दो भूखंड आवंटित किए गए थे।
पड़ताल में सामने आया है कि पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत के निर्देश पर यूडीएच के तत्कालीन सचिव एनसी गोयल, तत्कालीन जेडीए कमिश्नर दिनेश कुमार गोयल, तत्कालीन जेडीए सचिव हेमंत गेरा, जोन-2 उपायुक्त रश्मि गुप्ता ने ट्रस्ट को जमीन की आरक्षित दर की 25% रियायती दरों पर अवैध रूप से आवंटित कर दी।
तब जमीन की कीमत करीब 2.50 करोड़ रुपए थी। जांच में खुलासा हुआ है कि ट्रस्ट ने महज 62 लाख रुपए में गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने के नाम पर जमीन आवंटित करा ली। इससे सरकार को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ। मामले की जांच के बाद पुलिस मुख्यालय ने 21 नवम्बर 15 को रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी है।
- पहले सीएम को आरोपी माना : मामले की जांच पुलिस मुख्यालय को मिलने के बाद जांच अधिकारी ने ट्रस्ट जमीन आवंटित करने से जुड़ी पत्रावलियां जेडीए, आयकर विभाग नई दिल्ली और देवस्थान विभाग से प्राप्त की। इसके बाद तीनों विभागों के करीब 40 अफसर-कर्मचारियों से पूछताछ कर उनके बयान धारा 161 में दर्ज किए है। पुलिस ने 21 नवंबर 2015 को कोर्ट में मामले की प्रगति रिपोर्ट पेश की थी। इसमें पुलिस ने बयान और पत्रावलियों की जांच के बाद मुख्यमंत्री गहलोत अन्य अफसरों को मिलीभगत कर राजस्व को नुकसान पहुंचाने का आरोपी माना।
- फिर लगी एफआर : पुलिस ने पहली इंवेस्टिगेशन में सीएम और अन्य को राजस्व नुकसान का दोषी माना था। बाद में जांच के बाद मामले में एफआर लगा दी गई। इसके बाद पीड़ित ने एसीएमएम -16 कोर्ट में जांच के लिए याचिका लगाई थी। जिसकी 24 नवंबर को सुनवाई होगी।
- निष्कर्ष क्या? : नियमों के अनुसार, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को नामांकन में उन्हीं केस का जिक्र करना था, जो पेंडिंग चल रहे हों। शिकायत में जिस केस को नामांकन में छुपाने का जिक्र किया जा रहा है, उस केस में पुलिस ने एफआर लगा दी थी। ऐसे में यह शिकायत नामांकन खारिज करने का आधार नहीं बन पाएगी।

दूसरी शिकायत : रेप के मामले में गलत जांच करने का आरोप
चुनाव आयोग की गई शिकायत में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ जिस दूसरी एफआईआर के बारे में जिक्र किया गया है वो असल में दर्ज ही नहीं हुई थी।
शिकायत में बताया गया कि सीकर के रींगस थाने में एक पीड़िता ने 22 जुलाई 2017 को रेप और लूट की एफआईआर 237/2017 करवाई थी। मामले में पुलिस और सीआईडी(सीबी) के पांच बार जांच अधिकारी बदले गए। आखिर में सीआईडी(सीबी) ने एफआर लगा दी थी।
पीड़िता ने मामले में एफआर लगने के बाद 18 जनवरी 2022 को ज्योति नगर थाने में सीएम, पूर्व डीजीपी भूपेंद्र यादव सहित कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ गलत जांच कर एफआर लगाने की शिकायत की थी।
कोर्ट में इस्तगासा लगाने के बाद भी मामले में एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। पीड़िता के अनुसार कोर्ट ने 31 मार्च 2022 को पुलिस को मामला दर्ज करने के आदेश जारी किए लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। जिस पर अभी सुनवाई चल रही है।
- निष्कर्ष क्या? : मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ दूसरे केस के बारे में नामांकन में जानकारी छिपाने का आरोप लगाया गया है, लेकिन इस मामले में अभी एफआईआर ही दर्ज नहीं हुई है। एफआईआर दर्ज करवाने के लिए कोर्ट में इसकी सुनवाई चल रही है। ऐसे में एफआईआर दर्ज नहीं होने के कारण इसकी जानकारी भी नामांकन में देना जरूरी नहीं था। यह शिकायत भी नामांकन खारिज होने का आधार नहीं बन पाएगी।
एक्सपर्ट बोले- गहलोत का नामांकन खारिज नहीं होगा
सीनियर एडवोकेट एके जैन ने बताया कि नामांकन में प्रत्याशी को अपने खिलाफ पेंडिंग केस की जानकारी देनी होती है। गहलोत पर जो दो केस छिपाने के आरोप है, उनमें एक में एफआर लग चुकी है और दूसरे मामले में अभी एफआईआर ही दर्ज नहीं हुई है।
गहलोत ने नामांकन में इन 3 एफआईआर का जिक्र किया
जयपुर के गांधी नगर पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर 472 /2014 का जिक्र किया है। सोनी हॉस्पिटल को जेडीए द्वारा जमीन आवंटन के मामले में गहलोत का नाम है। इसके अलावा खान आवंटन और काली सिंध नदी पर बांध निर्माण से जुड़े मामले में उनका नाम है। श्याम सिंह राठौड़ ने कोर्ट में काली सिंध नदी पर बांध निर्माण मामले में अशोक गहलोत समैत सात लोगों के खिलाफ याचिका लगाई थी। कोर्ट ने मामले पर सुनवाई के बाद 23 मार्च 2015 को याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पुनरीक्षण याचिका लगाई थी। इसे भी कोर्ट ने 3 नवंबर 2017 को खारिज कर दिया था। अब यह शिकायत हाईकोर्ट में लंबित है।
पहले भी चुनावी हलफनामे की शिकायतें, कार्रवाई एक में भी नहीं हुई
1. एमपी में भाजपा महासचिव के खिलाफ केस छुपाने की शिकायत
बीजेपी महासचिव और इंदौर-1 सीट से प्रत्याशी कैलाश विजयवर्गीय पर नामांकन में आपराधिक मुकदमे छुपाने की शिकायत हुई। जिसमें पश्चिम बंगाल में महिला से जुड़ी रेप शिकायत के अलावा छत्तीसगढ़ के प्रकरण में फरार घोषित होने के बावजूद जानकारी नहीं देने की बात कही गई। दरअसल कैलाश विजयवर्गीय ने 30 अक्टूबर को दिए शपथ पत्र में अपने खिलाफ पांच केस की जानकारी दी थी। कांग्रेस का आरोप है कि इसमें उन्होंने इन 2 प्रकरणों का जिक्र नहीं किया।

2. महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री खिलाफ हुई थी शिकायत
महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ 2014 के चुनाव में नामांकन में आपराधिक मुकदमे छुपाने की शिकायत हुई थी। तीन साल पहले कोर्ट ने इस मामले में देवेंद्र फडणवीस को समन भी किया था। नागपुर जिला एवं सत्र न्यायालय ने सुनवाई के बाद उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इस मामले में क्लीन चिट दे दी थी।

3. सांसद दीया कुमारी के खिलाफ भी तथ्य छुपाने की शिकायत हुई थी
सांसद दीया कुमारी के खिलाफ लोकसभा चुनाव के दौरान झूठे शपथ पत्र पेश करने की शिकायत हुई थी। जितेंद्र कुमार खटीक ने शिकायत की थी कि चुनाव के समय दीया कुमारी की ओर से पेश निर्वाचन पत्र में कई तथ्य छुपाए गए हैं। सांसद पर आरोप लगाया कि जयपुर के पारिवारिक न्यायालय ने उन्हें बच्चों की कस्टडी सौंप रखी है, जिसको सांसद ने अपने निर्वाचन पत्र में छुपाया है। इसके अलावा दीया कुमारी का वोटर लिस्ट और टिकट में नाम अलग-अलग है। नामांकन क्रम संख्या नॉमिनेशन में गलत है जबकि शपथ पत्र में भी वह अलग है। इस मामले में दीया कुमारी को कोर्ट से राहत मिल गई थी।








