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एक देश, एक चुनाव: दुविधा में विपक्ष

UB India News by UB India News
September 4, 2023
in संपादकीय
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एक देश, एक चुनाव: दुविधा में विपक्ष
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वन नेशन, वन इलेक्शन’ की दिशा में शुक्रवार को नरेन्द्र मोदी की सरकार ने एक कदम और बढ़ा दिया। सरकार ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर विचार के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में कमेटी का गठन कर दिया। इस कमेटी के गठन के एलान के बाद सियासत का रुख बदल गया। मुंबई में चल रही विरोधी दलों के गठबंधन की मीटिंग में भी ये मुद्दा छाया रहा। योगी आदित्यनाथ, शिवराज सिंह चौहान, मनोहर लाल खट्टर, हिमंता विश्व शर्मा और एकनाथ शिन्दे जैसे तमाम बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने बिना देर किए कह दिया कि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ हों, और ये जितने जल्दी होगा उतना अच्छा होगा। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और NCP जैसे विरोधी दलों के नेताओं ने भी इसका सीधे-सीधे विरोध नहीं किया। लेकिन किसी ने कहा कि मोदी विपक्ष की एकता से डर गए हैं इसलिए ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की बात शुरू की है, किसी ने कहा कि बीजेपी को राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में हार साफ दिख रही है इसलिए मोदी ‘एक देश, एक चुनाव’ की बात कर रहे हैं तो किसी ने कहा कि मोदी ने सिर्फ शिगूफा छोड़ा है, होगा कुछ नहीं। लेकिन जो कानून के जानकार हैं, जो देश में चुनाव प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं, संविधान के विशेषज्ञ हैं, वे कह रहे हैं कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ हो सकता है, होना भी चाहिए, लेकिन ये आसान नहीं है। प्रक्रिया बहुत लंबी और जटिल है, इसलिए कम से कम 2024 के इलेक्शन से पहले इसे लागू करना आसान नहीं होगा। आजादी के बाद हमारे देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते थे। 1967 तक ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का फॉर्मूला चला था।

उस वक्त पूरे देश में कांग्रेस का एकछत्र राज था, लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस में बगावत शुरू हुई, कांग्रेस से टूट कर नई नई पार्टियां बनने लगी, राज्यों में उठापटक शुरू हुई, उसके बाद ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का सिलसिला टूट गया। ऐसा भी नहीं है कि 2015 में नरेन्द्र मोदी ने जो लॉ कमीशन बनाया, उसने पहली बार ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की सिफारिश की। इससे पहले इंदिरा गांधी की सरकार के वक्त 1982-83 में भी लॉ कमीशन ने यही सिफारिश की थी, लेकिन उस वक्त इस पर ध्यान नहीं दिया गया। 2018 में जस्टिस बी एस चौहान की अध्यक्षता वाले लॉ कमीशन ने फिर यही सिफारिश की। दिलचस्प बात ये है कि अकाली दल और समाजवादी पार्टी ने इसका सपोर्ट किया था। उस वक्त नीतीश कुमार भी ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के फेवर में थे। अखिलेश यादव ने इस वक्त इसका स्वागत किया था, उद्धव ठाकरे भी सपोर्ट में थे, स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल ने भी इसे देश के लिए जरूरी बताया था। 2018 में सिर्फ असदुद्दीन ओवैसी, ममता बनर्जी और एचडी देवेगौड़ा ने स्पष्ट रूप से इसका विरोध किया था। लेकिन अब सियासी हालात बदल गए हैं, इसलिए पार्टियों और नेताओं का स्टैंड भी बदला है। हालांकि तमाम पार्टियों को नेता ये समझ रहे हैं कि इसे लागू करना आसान नहीं होगा क्योंकि कमेटी की रिपोर्ट आने में वक्त लगेगा। फिर कम से कम 15 विधानसभाओं से इसके समर्थन में प्रस्ताव पारित कराना होगा। तब केन्द्र सरकार बिल लाएगी जिसे संसद में दो तिहाई बहुमत से पास कराना होगा और इसके लिए कम से कम 5 संविधान संशोधन करने होंगे। उसके लिए भी दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। इन सब कामों में वक्त लगेगा, इसलिए पार्लियामेंट के स्पेशल सेशन में ये सब हो जाएगा, इसकी उम्मीद तो कम है। लेकिन मोदी के लिए कोई काम नामुमकिन नहीं है, अगर मोदी ने ठान लिया होगा तो उन्होंने रास्ते भी निकाल लिए होंगे। इसीलिए विरोधी दल परेशान हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि भले ही ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ इस बार लागू न हो पाए, लेकिन मोदी इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकते हैं। इसीलिए विरोधी दलों के नेता न इसका विरोध कर रहे हैं, न इसका सपोर्ट कर रहे हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है।

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