पटना हाईकोर्ट में सोमवार को जाति आधारित गणना पर सुनवाई अधूरी रही। मंगलवार को भी सुनवाई होगी। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश कृष्णन विनोद चंद्रन तथा न्यायमूर्ति पार्थसारथी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की वरीय अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने बहस की। उन्होंने इंदिरा साहनी व आधार मामले में दिए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार को जाति अधारित गणना कराने का अधिकार नहीं है। बिना कानून बनाए ऐसा करना गलत है। यह निजता के अधिकार के साथ संविधान के अनु. 21 का भी उल्लंघन है।
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याचिकाकर्ता ने कहा- अगर कोई जानकारी नहीं देगा तो सरकार उस पर कार्रवाई करेगी; महाधिवक्ता की दलील- ऐसा नहीं है
अपराजिता सिंह : राज्य को जातीय अधारित गणना कराने का अधिकार नहीं है। यह एक प्रकार से सेंसस कराने का प्रयास है जो संसद के अधिकार का हनन है। बिना कानून बनाए राज्य सरकार हर व्यक्ति का जातीय डेटा संग्रहित कर रही है जो गलत है। (इंदिरा साहनी और आधार मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए)
अपराजिता : किसी को व्यक्तिगत जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। (जातीय गणना को लेकर राज्य सरकार द्वारा जारी की गई गाइड लाइन का उल्लेख करते हुए)
अपराजिता : यह संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। इसे कानूनी रूप से वैध नहीं ठहराया जा सकता है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की थी, उसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति जानकारी नहीं देगा तो उस पर कार्रवाई की जाएगी।
महाधिवक्ता पी के शाही : यह सही नहीं है। अपराजिता जी को नोटिफिकेशन दिखाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश : अपराजिता जी क्या आपके पास नोटिफिकेशन की प्रति है?
अपराजिता : सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार ने अपनी याचिका में इस बात का उल्लेख किया गया है।
उन्होंने बहस में तर्क दिया कि एक राज्य का कर्तव्य है कि वह जनता के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे, लेकिन राज्य सरकार द्वारा अपनी शक्तियों के दायरे से बाहर जाकर नागरिकों की पहचान के अधिकार, उनकी निजता का अधिकार एवं अन्य मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
उन्होंने इस गणना में एकत्रित डेटा की सुरक्षा का हवाला देते हुए कहा कि यह सारा डेटा एक मोबाइल ऐप के माध्यम से इकट्ठा किया जा रहा है, जो कि काफी जोखिम भरा है। उन्होंने नागरिकों के डेटा की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किए।
उन्होंने कहा कि यह सर्वे के नाम पर जनगणना है, जिसका अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। उन्होंने कहा कि कोई भी कानून सरकार को इस बात की अनुमति नहीं देता कि नागरिकों के संवेदनशील जानकारियों को इस प्रकार इकट्ठा किया जाए।







