बिहार विधान परिषद में रविवार को प्रो. शत्रुघ्न प्रसाद स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इसका शुभारम्भ राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आलæकर के उद्बोधन से हुआ। राज्यपाल ने स्व. प्रो. शत्रुघ्न प्रसाद को अपनी श्रद्धांजलि दी और आचार्य अभिनव गुप्त के माध्यम से अपने राष्ट्र की महान ज्ञान परंपरा की याद दिलाई। उन्होंने वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
महामहिम ने आचार्य शंकराचार्य का भी स्मरण किया और उनके अद्वैत को प्रासंगिक बताते हुए द्वैत या विविध वादों और उनके टकराव को राष्ट्रीय अखंडता के लिए नकारात्मक बताया। उन्होंने भारतीय दर्शन परंपरा के ज्ञान को आधुनिक देशकाल के अनुरूप प्रस्तुत करने पर बल दिया। उन्होंने प्रो. शत्रुघ्न प्रसाद स्मृति व्याख्यानमाला की निरन्तरता की कामना की और उम्मीद जताई कि अगले वर्ष पुनः किसी महत्वपूर्ण विषय पर यह व्याख्यानमाला आयोजित हो। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कथाकार रणेंद्र ने अपने पूज्य पिताजी प्रो. शत्रुघ्न प्रसाद की साहित्यिक उपलब्धियों तथा भारत और भारतीय संस्कृति के पुनरोदय के लिए उनकी आजीवन व्यग्रता और प्रयासों की चर्चा की।
मुख्य वक्ता भोपाल से पधारे संस्कृत विश्वविद्यालय‚ नई दिल्ली के पूर्व कुलपति आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कश्मीरी शैव–दर्शन की उज्ज्वल परम्परा का विवरण देते हुए यह बताया कि द्वैत शैव तंत्र की चारों दार्शनिक शाखाएं किस तरह अभिनवगुप्त के व्यक्तित्व कृतित्व में समाहित होकर विकसित और प्रसार पाती हैं। आचार्य त्रिपाठी ने अभिनवगुप्त के अद्वैत शैव दर्शन की वर्तमान देशकाल में प्रासंगिकता और महत्ता को भी रेखांकित किया। प्रथम तकनीकी सत्र देवघर (झारखंड) से आये देेवघर कॉलेज के प्राचार्य ड़ॉ. अखिलेश कुमार ने शारदापीठ कश्मीर की सारस्वत–परम्परा का स्मरण किया। वहां ८वीं सदी के आचार्य वामन से ११वीं सदी के क्षेमेन्द्र जैसी मनीषियों के मध्य अभिनवगुप्त की महता को स्थापित किया। उसी सत्र में प्रो. कंचन कुमारी ने महाकवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर अभिनवगुप्त के अद्वैत शैव दर्शन के प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की ।
चर्चा में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविध्यालय में दर्शनशास्त्र की प्राध्यापिका प्रो. आभा झा ने कहा कि अभिनवगुप्त के दर्शन में शिव ऐसा दर्पण है जो अपने बिम्ब की भी रचना है और प्रतिबिम्ब भी‚ फिर पुनः अपने में समेट भी लेता है। द्वितीय तकनीकी सत्र का आगाज करते हुए स्व. प्रो शत्रुघ्न प्रसाद के कनिष्ठ पुत्र लोक अभियोजक ज्ञानेन्द्र कुमार ने वैदिक परंपराओं में शैव दर्शन के सूत्र को रेखांकित किया। चर्चा को आगे बढाते हुए हजारीबाग (झारखंड) से पधारे विनोवा भावे विश्वविद्यालय के डीन एवं हिन्दी के प्राध्यापक प्रो. मिथिलेश ने आचार्य अभिनवगुप्त के समग्र दर्शन पर प्रकाश डाला जिसमें तत्कालीन भारत की अनेक दार्शनिक मान्यताएं और साधना पद्धतियां समाहित थीं।
इस आयोजन के दूसरे मुख्य वक्ता नई दिल्ली से पधारे डॉ. योगेश शर्मा ने आचार्य के प्रत्यभिज्ञा दर्शन या त्रिकदर्शन की व्याख्या की। प्रत्यभिज्ञा (प्रति और अभिज्ञा) के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने आह्वान किया कि जिस प्रकार अभिनवगुप्त ने अपने दर्शन में स्वयं को विस्मृति के आवरण से मुक्त कर अपने असली को पहचानने को स्थापित किया था वैसे ही हमारे राष्ट्र को विस्मृति की परतों को तोड कर अपने ज्ञान भंडार को प्रकट करने की आवश्यकता है।
आयोजन का समापन प्रो. रामवचन राय‚ सदस्य‚ बिहार विधान परिषद् के वक्तव्य के साथ हुआ। उन्होंने स्व. प्रो शत्रुघ प्रसाद की विद्वता की चर्चा करते हुए वक्ताओं के उद्बोधन का सार प्रस्तुत किया । कार्यक्रम में संघ के क्षेत्रीय प्रचारक श्रीराम नवमी प्रसाद‚ क्षेत्र कार्यवाह ड़ॉ. मोहन सिंह‚ स्वदेशी जागरण मंच के सह संयोजक अरुण ओझा‚ धर्म जागरण क्षेत्रीय समन्वयक सूबेदार सिंह‚ प्रांत सह संघचालक राजकुमार सिन्हा‚ क्षेत्रीय बौद्धिक प्रमुख राणाप्रताप सिंह ‚पूर्व विधान परिषद अध्यक्ष अवधेश नारायण सिंह ‚ अनिल शर्मा ‚ सदस्य बिहार विधान परिषद‚ संजीव चौरसिया‚ विधायक उपस्थित रहे।







