जीतता वही है‚ जिसमें धैर्य‚ साहस और
मंत्री राजनाथ सिंह ने एक उम्मीद भरा बयान दिया है। कहा है‚ ‘गुलाम जम्मू–कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है‚ इस पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं है। यहां के लोग पाकिस्तान से तंग हैं‚ अतएव वे स्वयं ही ऐसा कुछ करेंगे कि भारत का हिस्सा बन जाएं।’ किसी नेता ने ऐसा बयान शायद पहली बार दिया है कि गुलाम कश्मीर के लोग स्वयं ही भारत में शामिल हो जाएं। संभव है भारत की यह ऐसी किसी रणनीति का हिस्सा हो‚ जिसकी निकट भविष्य में फलीभूत होने की संभावना होॽ उन्होंने यह बात जम्मू–कश्मीर प्रदेश भाजपा की ओर से आयोजित ‘सुशासन भी‚ सुरक्षा भी’ विषय पर बोलते हुए कही। ॥ इसमें कोई दो राय नहीं कि बंटवारे के समय के हस्ताक्षरित दस्तावेज के अनुसार संपूर्ण पाक अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है। पाकिस्तान ने उस पर अवैध कब्जा किया है। इस विलय के संबंध में सर्वसम्मति से संसद में प्रस्ताव भी पारित होते रहे हैं। १९९४ में पीवी नरसिंह राव की सरकार में भी इस बाबत एक प्रस्ताव पारित हुआ था। चूंकि पीओके भारत का हिस्सा है इसलिए जम्मू–कश्मीर विधानसभा में पीओके क्षेत्र की बनाई गइÈ चौबीस सीटें खाली रखनी पड़ती हैं। दरअसल‚ भारत कश्मीर मुद्दे पर अब तक नाकाम इसलिए रहा क्योंकि आक्रामकता दिखाने की बजाय उसने रक्षात्मक रवैया अपनाया हुआ था। विभाजन की जिस अव्यावहारिक और अप्राकृतिक मांग के आगे नेहरू समेत हमारे तत्कालीन नेता नतमस्तक होते चले गए थे‚ उससे न केवल जम्मू–कश्मीर‚ बल्कि पीओके‚ भारत‚ पाकिस्तान और बांग्लादेश को भी विभाजन का दर्द झेलना पड़ा है। जबकि विभाजन के समय ही यह साफ लगने लगा था कि यह अखंड भारत की विरासत को खंडित करने की अंग्रेजी हुकूमत की कुटिल चाल है।
१९४७ तक के कालखंड में १९४२ की अगस्त क्रांति तथा आजाद हिन्द फौज के अभियान और दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब फिरंगी हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त असंतोष और सशस्त्र संघर्ष की घटनाएं आम हो गइÈ तो अंग्रेजों ने अनुभव किया कि अब भारत पर नियंत्रण संभव नहीं है‚ तब उन्होंने भारतीय रियासतों के विलीनीकरण के लिए धाÌमक और क्षेत्रीय उपराष्ट्रीयताओं को भी उकसाना शुरू कर दिया। फलतः शेख समेत अनेक हिन्दू और मुस्लिम शासकों में एक नये स्वतंत्र देश पर राज करने की कामना अंगड़ाई लेने लगी जबकि रियासतों का विलय भारतीय राष्ट्र को अखंड भारत का रूप देकर सशक्त और एकीकृत संविधान द्वारा संचालित राजनीतिक ईकाई का निर्माण करना था। इसी समय शेख ने स्वतंत्र कश्मीर का सुल्तान बनने का सपना देखना शुरू कर दिया। १९४६ में शेख ने हरि सिंह के विरु द्ध ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो आंदोलन’ छेड़ दिया। २० मई‚ १९४६ को शेख ने श्रीनगर की मस्जिदों का दुरुपयोग करते हुए सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के ऐलान कराए। नतीजतन‚ शेख की गिरफ्तारी हुई और उन्हें तीन साल की सजा सुनाई गई। इस गिरफ्तारी के बाद कश्मीर की स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में थी किंतु यह गिरफ्तारी नेहरू हो रास नहीं आई। नेहरू शेख को छुड़ाने के लिए उतावले हो गए। हरि सिंह ने नेहरू का कहना नहीं माना तो ‘सत्याग्रह’ की घोषणा कर दी। मित्रता के भुलावे में नेहरू द्वारा की गई यह भूल और शेख को छुड़ाने की जिद्द कालांतर में ऐतिहासिक भूल साबित हुई। हरि सिंह ने कठोरता बरतते हुए नेहरू की हठ को सर्वथा नकार दिया और उन्हें हिरासत में लेकर कश्मीर की सीमा से बाहर का रास्ता दिखाकर रिहा कर दिया।
नेहरू ने इस आचरण को नितांत अव्यावहारिक माना और हरि सिंह से बदला लेने का संकल्प ले लिया। इसलिए देश की ५६२ रियासतों को विलय करने का जो दायित्व पटेल चतुराई से संभाल रहे थे‚ उसमें एक जम्मू–कश्मीर का दायित्व नेहरू ने जबरदस्ती अपने हाथ ले लिया।
२० फरवरी‚ १९४७ को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने ऐतिहासिक घोषणा की कि जून‚ १९४८ तक भारत को स्वतंत्र कर दिया जाएगा। इस घोषणा के परिणाम की जिम्मेवारी एडमिरल लुईस माउंटबेटन को सौंपी गई। २४ मार्च‚ १९४७ को वायसराय के रूप में माउंटबेटन ने भारत के प्रशासनिक दायित्व अपने हाथ में ले लिए। माउंटबेटन ने अलग–अलग गोपनीय मुलाकतें लीगी और कांग्रेसी नेताओं से करके भारत विभाजन का संकल्प गांधी के विरोध के बावजूद ले लिया।
अंततोगत्वा ४ जुलाई‚ १९४७ को ब्रिटेन की संसद के दोनों सदनों में ‘भारतीय स्वतंत्रता विधेयक–१९४७’ पेश कर दिया जो मत–विभाजन से पारित हो गया।
१८ जुलाई‚ १९४७ को ब्रिटिश हुकूमत ने अनुमोदन भी कर दिया। इसी विधेयक के तहत भारत को धर्म के आधार पर दो स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्यों में बांट दिया गया। जम्मू–कश्मीर रियासत का विलय नेहरू के हाथ में होने के कारण असमंजस में रहा। राजा हरि सिंह जहां कश्मीर की स्वतंत्र राज्य की परिकल्पना कर रहे थे‚ वहीं उनके प्रधानमंत्री रामचंद्र काक पाकिस्तान के साथ विलय पर विचार कर रहे थे‚ क्योंकि उनकी पत्नी यूरोपियन थीं‚ इसलिए उनकी आंखें मुंद गई थीं। इसी अनिश्चितता के दौर में २२ अक्टूबर‚ १९४७ को शेख की शह पर पाक फौज जीपों और ट्रकों पर सवार होकर कश्मीर में चढ़ी चली आई। इस संकट से मुक्ति के लिए हरि सिंह विवश हुए और उन्होंने २६ अक्टूबर‚ १९४७ को विलय–पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।
इसके बाद २७ अक्टूबर‚ १९४७ को कबिलाइयों को बेदखल करने के लिए हवाईजहाज से सेना भेज दी गई। भारतीय सैनिकों ने कबिलाइयों को खदेड़ दिया किंतु दुर्गम क्षेत्र होने के कारण मुजफ्फराबाद का पीओके‚ गिलगिट और बाल्टिस्तान क्षेत्र पाक के कब्जे में बना रहा। इस परिप्रेIय में नेहरू जल्दबाजी में संयुक्त राष्ट्र संघ चले गए। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् ने इसे विवादित क्षेत्र घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप युद्धविराम तो हो गया लेकिन कश्मीर की शासन व्यवस्था को लेकर नेहरू‚ हरि सिंह और शेख के बीच ‘दिल्ली समझौता’ हुआ। कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए ३७० का अनुच्छेद पटेल और अंबेडकर के विरोध के बावजूद जोड़ दिए गए। हालांकि अब इस अनुच्छेद को हटा दिया गया है। लिहाजा‚ अब अवसर है कि गुलाम कश्मीर माने जाने वाले पीओके‚ गिलगिट और बाल्टिस्तान को पाक के शिकंजे से मुक्त करके भारत में विलय कर लिया जाए।
संपूर्ण पीओके भारत का हिस्सा है। पाकिस्तान ने उस पर अवैध कब्जा किया हुआ है। चूंकि पीओके भारत का हिस्सा है इसलिए जम्मू–कश्मीर विधानसभा में पीओके क्षेत्र की बनाई गइ चौबीस सीटें खाली रखनी पड़ती हैं। दरअसल‚ भारत कश्मीर मुद्दे पर अब तक नाकाम इसलिए रहा क्योंकि आक्रामकता की बजाय उसने रक्षात्मक रवैया अपनाया हुआ था। अब अवसर है कि पीओके‚ गिलगिट और बाल्टिस्तान को पाक के शिकंजे से मुक्त करके भारत में विलय कर लिया जाए।







