बात 90 के दशक की है। घाटी में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर शुरू हुई टारगेट किलिंग ऐसा नासूर बना जो आज बाहरी राज्यों से रोजी-रोटी की तलाश में आने वाले मजदूरों की जिंदगी तबाह कर रहा है। टारगेट किलिंग की घटनाएं 1990 के दशक में आतंकवाद के उभार के साथ शुरू हुईं, जब आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों, सरकारी कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया। वर्ष 2000 के बाद सुरक्षा अभियानों से टारगेट किलिंग में कमी आई, लेकिन समय-समय पर राजनीतिक नेताओं, पंचायत प्रतिनिधियों और सुरक्षा बलों से जुड़े लोगों पर हमले जारी रहे।
वर्ष 2021 से टारगेट किलिंग के मामले बढ़े। इन घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था और आम लोगों में चिंता बढ़ा दी। इसके जवाब में सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकवाद विरोधी अभियान तेज किए, संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बढ़ाई और कई आतंकी मॉड्यूल ध्वस्त किए। बावजूद छिटपुट टारगेट किलिंग की घटनाएं पूरी तरह नहीं थमी हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण 31 जुलाई को कुलगाम में छत्तीसगढ़ के दो मजदूरों पर किया गया जानलेवा हमला है, जिसमें दीपक की मौत हो गई और भूपेंद्र जीएमसी अनंतनाग में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है।
कुलगाम में मातम के बीच राहत का एलान
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कुलगाम आतंकी हमले में मारे गए छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी मजदूरों के परिवारों के लिए 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) ने बताया कि उमर अब्दुल्ला ने कुलगाम में मजदूरों की नृशंस हत्या की कड़ी निंदा की है और निर्दोष लोगों की मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा कि सरकार इस मुश्किल समय में पीड़ित परिवारों के साथ मजबूती से खड़ी है।मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) ने बताया कि उमर अब्दुल्ला ने कुलगाम में मजदूरों की नृशंस हत्या की कड़ी निंदा की है और निर्दोष लोगों की मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा कि सरकार इस मुश्किल समय में पीड़ित परिवारों के साथ मजबूती से खड़ी है। सीएमओ के अनुसार मुख्यमंत्री राहत कोष से दी जाने वाली यह 10 लाख रुपये की सहायता राशि जिला प्रशासन की ओर से घोषित 6 लाख रुपये की तत्काल राहत राशि के अतिरिक्त होगी। अधिकारियों के मुताबिक, कुलगाम जिले के दक्षिण कश्मीर स्थित केलम इलाके में शुक्रवार देर शाम ईंट भट्ठे पर हुए आतंकी हमले में छत्तीसगढ़ के रहने वाले दीपक रात्रे और बोपिंदर, दोनों की उम्र करीब 20 वर्ष, को निशाना बनाया गया था।
- 14 सितंबर 1989 : भाजपा नेता और अधिवक्ता टीका लाल टपलू की श्रीनगर में हत्या।
- 4 नवंबर 1989 : सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या।
- 13 फरवरी 1990 : दूरदर्शन श्रीनगर के निदेशक लासा कौल की हत्या।
- 1990 के दौरान शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों और कश्मीरी पंडित परिवारों को निशाना बनाया गया, जिसके बाद घाटी से कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ।
- 1990 के दशक से 2000 के बीच आतंकियों ने अंतराल पर अल्पसंख्यक समुदायों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों से जुड़े लोगों पर हमला जारी रखा। कई सामूहिक हत्याएं भी हुईं।
2021 से टारगेट किलिंग का नया दौर
- 2021 में आतंकियों ने फिर से गैर स्थानीय मजदूरों, शिक्षकों, कश्मीरी पंडितों और व अन्य समुदाय के लोगों को निशाना बनाया।
- अक्तूबर 2021 : श्रीनगर में स्कूल की प्रधानाचार्य सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या।
- अक्तूबर 2021 : प्रसिद्ध कश्मीरी फार्मासिस्ट माखन लाल बिंदरू की हत्या।
- मई 2022 : बडगाम में राजस्व विभाग के कर्मचारी राहुल भट की हत्या।
- मई 2022 : कुलगाम में शिक्षिका रजनी बाला की हत्या।
- जून 2022 : बैंक प्रबंधक विजय कुमार (राजस्थान निवासी) की कुलगाम में हत्या।
2023 से 2026 तक घटनाएं
इस अवधि में भी छिटपुट आतंकी हमले हुए। हालांकि 2021-22 जैसी लगातार टारगेट किलिंग की शृंखला नहीं रही। अप्रैल 2025 में पहलगाम-बायसरन में पर्यटकों पर बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई। लेकिन इसे आतंकी हमला मानते हुए भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया। घुटनों पर ला दिया।
कुलगाम में प्रवासी मजदूर की टारगेट किलिंग को रक्षा मामलों के विशेषज्ञ आतंकियों की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसी टारगेट किलिंग का मकसद केवल किसी व्यक्ति की हत्या नहीं होता, बल्कि जम्मू-कश्मीर की बदलती तस्वीर पर सवाल खड़े करना, लोगों में डर पैदा करना और देश-दुनिया तक यह संदेश पहुंचाना भी होता है कि घाटी अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
दहशत का सीधा असर कारोबार पर
जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर्यटन, बागवानी, व्यापार और सेवा क्षेत्र पर टिकी है। ऐसे में हर बड़ी आतंकी घटना की आंच इन क्षेत्रों से जुड़े कारोबार और रोजगार तक भी पहुंचती है। पिछले दस वर्षों का अनुभव बताता है कि ऐसी घटनाओं के बाद सबसे पहले पर्यटन की रफ्तार थमती है और धीरे-धीरे इसका असर पूरी आर्थिक गतिविधियों पर दिखाई देने लगता है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार पर्यटन का प्रदेश की जीएसडीपी में करीब सात प्रतिशत योगदान है और इससे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से लगभग पांच लाख लोगों की आजीविका जुड़ी है। बागवानी क्षेत्र भी इससे जुड़ा है। कृषि और बागवानी समेत प्राथमिक क्षेत्र का प्रदेश की अर्थव्यवस्था में 20 प्रतिशत से अधिक योगदान है। सेब और अन्य फसलों के मौसम में दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में मजदूर आते हैं। ऐसे में पर्यटन और परिवहन प्रभावित होने का असर स्थानीय आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ता है।
जम्मू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर शैलेंद्र सूदन का कहना है कि किसी भी आतंकी घटना का पहला असर पर्यटन पर पड़ता है। पर्यटकों की संख्या घटते ही होटल, टैक्सी, हाउसबोट, ट्रेवल एजेंसियां, रेस्तरां और स्थानीय बाजार प्रभावित होने लगते हैं। हस्तशिल्प, ड्राई फ्रूट और पर्यटन से जुड़े दूसरे कारोबार भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। उनका कहना है कि ऐसे माहौल में निजी निवेशक नई परियोजनाओं को लेकर सतर्क हो जाते हैं।
निवेश और विकास की रफ्तार भी होती है प्रभावित
केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के अर्थशास्त्री प्रो. अश्वनी नंदा के अनुसार आतंकवाद का आर्थिक असर तत्काल और दीर्घकालिक दोनों होता है। स्थानीय कारोबार की आय घटती है, निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ता है और सरकार को सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तथा विश्वास बहाली पर अतिरिक्त संसाधन खर्च करने पड़ते हैं। यदि ऐसी घटनाएं लगातार होती रहें तो विकास परियोजनाएं, रोजगार सृजन और निजी निवेश तीनों प्रभावित होते हैं। उनका कहना है कि आर्थिक विकास के लिए शांति और स्थिरता सबसे जरूरी है।
रक्षा विशेषज्ञ सेवानिवृत्त कर्नल सुखबीर सिंह मनकोटिया का कहना है कि टारगेट किलिंग के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य हैं। पहला, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह धारणा बनाना कि कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हुए हैं। दूसरा, घाटी में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों और दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों के मन में डर पैदा करना, ताकि उनके आने और कामकाज पर असर पड़े। उन्होंने कहा कि बागवानी, निर्माण और कई अन्य क्षेत्रों की गतिविधियां बाहरी मजदूरों पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाने से केवल सुरक्षा का संदेश नहीं जाता, बल्कि स्थानीय कारोबार और लोगों के भरोसे पर भी असर पड़ता है।
विकास की रफ्तार भी निशाने पर
पाकिस्तान मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार संत शर्मा का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में पर्यटन, विकास परियोजनाओं और निवेश की रफ्तार बढ़ने से प्रदेश की सकारात्मक छवि मजबूत हुई है। ऐसे में आतंकी संगठन ऐसी घटनाओं के जरिए उस माहौल को प्रभावित करना चाहते हैं।
मौजूदा समय में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के घटनाक्रम, सिंधु जल संधि को लेकर बने हालात और अमरनाथ यात्रा जैसे अहम घटनाक्रमों के बीच ऐसी वारदातों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सुरक्षा एजेंसियों की लगातार कार्रवाई से आतंकी नेटवर्क दबाव में हैं। इसलिए वे कम संसाधनों में ज्यादा मनोवैज्ञानिक असर डालने वाली घटनाओं के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और डर का माहौल बनाने की कोशिश करते हैं।







