क्षेत्रीय दलों को एकजुट करने की मुहिम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए अग्नि परीक्षा होगी। विपक्षी एकता की बैठक तीन बार टलने के बाद अब २३ जून को पटना में बैठक होगी। जहां विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं का जुटान होगा। सीएम नीतीश कुमार अब तक कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। सबसे ज्यादा उन्हें परेशानी उन्हें खुद के घर में पार्टियों को एकमत करने में आयेगी। बैठक के पहले जीतन राम मांझी के महागठबंधन से अलग होने का प्रसंग इससे जोड़़ा जा सकता है। विपक्ष की मानें तो चुनाव आते–आते बिहार की राजनीति १८० डिग्री पर कई बार घूमेगी। अलग अलग विचार धारा और सीट की पेंच विपक्षी एकता की मुहिम में दरार पैदा कर सकती है। कहा यह जा रहा है कि यह मुहिम तभी तक सफल दिख रही है‚ जब तक चुनाव की घोषणा नहीं हो जाती।
इतना तो तय है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी की गोलबंदी में अगर कामयाब रहेे तो राष्ट्रीय फलक पर उनकी शख्सियत पर अलग रंग चढ़ेगा। बैठक को लेकर विधानमंडल में नेता प्रतिपक्ष विजय कुमार सिन्हा ने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि इस बैठक को लेकर उनकी विवशता और लाचारी साफ दिखाई दे रही। कांग्रेस भी विपक्षी एकता को तवज्जो नहीं दे रही। वैसे‚ बिहार की जनता कभी ऐसे लोगों को माफ नहीं करेगी और समय आने पर सबक सिखाएगी। बार बार नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं का बयान देकर विपक्षी दलों और नेताओं को भरमाया जा रहा है। अब यह बयान संदेहास्पद एवं हास्यास्पद प्रतीत हो रहा है। प्रत्येक बैठक में कार्यकर्ताओं को पूर्व से सीखा कर प्रधानमंत्री पद का नारा लगवाया जाता है और फिर उसका खंडन किया जाता है। राज्य के लोग भली भांति अवगत हैं कि मुख्यमंत्री जी ने प्रधानमंत्री पद की लालसा में राज्य को राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अराजकता में धकेल दिया है।
सीएम नीतीश कुमार हाल के दिनों में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल‚ राहुल गांधी‚ सीपीआई (एम) महासचिव सीताराम येचुरी‚ सीपीआई नेता डी.राजा‚पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी‚ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ मुलाकात कर स्थिति को जरूर भांप लिया होगा। इन सभी दलों ने बीजेपी के खिलाफ चुनाव लडने की हामी भरी है। माना जा रहा है कि पटना में होने वाली बैठक में विपक्षी गठबंधन नेता का सर्वसम्मति से चुनाव होगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसके सबसे बड़े़ दावेदार माने जा रहे हैं।
विपक्ष यह कहकर पेंच फंसा रहा है कि अभी तक क्षेत्रीय दलों की ओर से कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने की बात सामने नहीं आई है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा है कि चुनाव आते–आते बिहार की राजनीति १८० डिग्री पर कई बार घूमेगी। उन्होंने बिहार में बने महागठबंधन को अवसरवादी कहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता ने इस सरकार को वोट नहीं दिया था। यह सरकार जुगाड टेक्नोलॉजी पर चल रही है‚ जिसे जनता का विश्वास प्राप्त नहीं है। दक्षिण भारत में कांग्रेस की स्थिति बेहतर है‚ जिससे दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दलों को एकजुट करने की जिम्मेदारी कांग्रेस को दी गई है। दक्षिण भारत के राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बेहतर कर वहां कांग्रेस अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड सके। दूसरी तरफ जदयू–राजद को उत्तर भारत की जिम्मेदारी दी गई है। उत्तर भारत में आम आदमी पार्टी‚ समाजवादी पार्टी‚ तृणमूल कांग्रेस‚ जेएमएम जैसे दलों को एकजुट करने की जिम्मेदारी नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को दी गई है। क्षेत्रीय दलों में अपनी मजबूत पकड रखने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह जिम्मेदारी खुद ली है। पटना में होने वाली पहली विपक्षी दलों की बैठक है। इस कारण इस बैठक में सब कुछ साफ होना संभव नहीं दिख रहा है। सिर्फ और सिर्फ एकता का ‘शो’ होगा। फिलहाल चुनाव लड़़ने के लिए सीट और पीएम उम्मीदवार पर चर्चा असंभव दिख रहा है। बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने का झंड़ा बुलंद किया जायेगा। ऐसे में क्या क्षेत्रीय दल विशेषकर जदयू और राजद कुर्बानी दे सकेगा‚ यह यक्ष सवाल है। अभी सीट बंटवारे पर किसी भी दल के नेता स्पष्ट बोलने से बच रहे हैं। बिहार में महागठबंधन के सभी दलों का लक्ष्य एक है।







