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तीन राष्ट्रीय, बारह राज्य स्तरीय और चार छोटी पार्टियों के मिलान के बाद कैसा हो सकता है विपक्षी एकता का स्वरूप………

UB India News by UB India News
June 13, 2023
in पटना, बिहार, ब्लॉग
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तीन राष्ट्रीय, बारह राज्य स्तरीय और चार छोटी पार्टियों के मिलान के बाद कैसा हो सकता है विपक्षी एकता का स्वरूप………
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2024 में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ बनने वाली विपक्षी एकता की तस्वीर अब लगभग साफ हो गई है. सूत्रों के मुताबिक पटना में होने वाली मीटिंग में उन्हीं दलों को बुलाया गया है, जो आगामी लोकसभा चुनाव साथ में लड़ेंगे. विपक्षी एकता के भीतर इसे प्री-पोल एलायंस कहा जा रहा है.

विपक्षी एकता में 3 राष्ट्रीय स्तर की पार्टी, 12 राज्य स्तर की पार्टी और 4 छोटी पार्टियां शामिल होने जा रही है. विपक्षी गठबंधन में एक कॉर्डिनेशन कमेटी बनाए जाने की बात कही जा रही है. इसी कमेटी के पास मिनिमम कॉमन प्रोग्राम और सीट बंटवारे का विवाद सुलझाने का जिम्मा रहेगा.

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एबीपी से बात करते हुए जेडीयू के सलाहकार और कद्दावर समाजवादी नेता केसी त्यागी ने कहा कि देश की 450 लोकसभा सीटों पर विपक्ष से एक उम्मीदवार उतारने पर सहमति बन गई है. ऐसे में सियासी गलियारों में विपक्षी गठबंधन को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.

मसलन, गठबंधन में सीट बंटवारे का फॉर्मूला क्या है? किन सीटों पर कौन उम्मीदवार होगा और राज्यवार गठबंधन का स्ट्रक्चर क्या होगा? इस स्टोरी में इन्हीं सवालों के बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं…

नीतीश की ‘पटना पार्टी’ में कौन-कौन होंगे शामिल?
पटना की पार्टी में शामिल होने के लिए कांग्रेस, आप और सीपीएम (तीनों राष्ट्रवादी पार्टी), सपा, टीएमसी, शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी, जेएमएम, सीपीआई, डीएमके, नेशनल कॉन्फ्रेंस, मुस्लिम लीग, एमडीएमके (सभी राज्य स्तरीय पार्टी) को आमंत्रण भेजा गया है.

इसके अलावा केरल कांग्रेस (मणि), आरएसपी, वीसीके जैसी छोटी पार्टियों को भी गठबंधन के लिए न्यौता दिया गया है. सभी नेताओं की मीटिंग नीतीश कुमार के सरकारी आवास पर हो सकती है. हालांकि, अभी तक लोकेशन पूरी तरह फाइनल नहीं हुई है.

गठबंधन में शामिल होने वाले दल उसी दिन चेयरमैन और संयोजक का नाम फाइनल करेंगे.
नीतीश कुमार विपक्षी एकता के संयोजक बनाए जा सकते हैं. चेयरमैन का पद कांग्रेस को मिल सकता है.

किस दल को कहां मिलेगी कितनी सीटें?

1. उत्तर प्रदेश- विपक्षी एकता में यहां एक साथ 4 दल आ सकते हैं. इनमें सपा, कांग्रेस, आरएलडी और आजाद समाज पार्टी का नाम शामिल हैं. सपा, कांग्रेस और एएसपी पहले से गठबंधन में है. कांग्रेस लोकसभा में इस गठबंधन के साथ जा सकती है.

उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सबसे अधिक 80 सीटें हैं. 2019 में यहां आरएलडी, सपा और बीएसपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस अलग से मैदान में उतरी थी. सपा गठबंधन ने 15 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि एनडीए को 64 और कांग्रेस को एक सीट हासिल हुआ था.

सीट बंटवारे की बात करें तो कांग्रेस का दावा यहां अधिक सीटों पर है, लेकिन सपा देने को तैयार नहीं है. गठबंधन के फॉर्मूले के हिसाब से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 7-12 सीटें मिल सकती है. इनमें रायबरेली, अमेठी, कुशीनगर, फतेहपुर सीकरी, कानपुर, बिजनौर और सीतापुर जैसी सीटें हैं.

हालांकि, कांग्रेस की डिमांड हाई है. कांग्रेस 2009 के रिजल्ट के आधार पर 20-25 सीटों का दावा भी ठोक रही है.

आरएलडी को 3-5 सीट मिलने का अनुमान है. जयंत चौधरी की पार्टी को मथुरा, बागपत, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर जैसी सीटें मिल सकती है. चंद्रशेखर आजाद सहारनपुर सीट से मैदान में उतर सकते हैं.

बाकी के बचे सीटों पर अखिलेश यादव की पार्टी चुनाव लड़ेगी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर मायावती गठबंधन में आने पर हामी भरती है तो उन्हें भी गठबंधन में एडजस्ट किया जाएगा.

2. महाराष्ट्र- यहां कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी. महाराष्ट्र में लोकसभा की कुल 48 सीटें हैं. कांग्रेस 16-16-16 सीटों का फॉर्मूला लागू करने की मांग कर रही है. उद्धव ठाकरे 18 सीटों पर अपना दावा ठोक रखा है.

2019 में उद्धव की पार्टी को 18 सीटें मिली थी. एनसीपी के अजित पवार भी उद्धव के इस दावे का समर्थन कर चुके हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि शिवसेना (यूबीटी) को 18 और एनसीपी-कांग्रेस को 15-15 सीटें मिल सकती है.

महाराष्ट्र की करीब 10 सीटें ऐसी है, जहां शिवसेना और एनसीपी में पेंच फंस सकता है. इनमें पुणे और मुंबई जोन की अधिक सीटें हैं. कांग्रेस भी मुंबई साउथ पर अपना दावा बरकरार रखना चाहता है. यह सीट देवड़ा परिवार का गढ़ है.

3. पश्चिम बंगाल- बंगाल में सीट बंटवारे की कमान बड़ी पार्टी तृणमूल के हाथों में होगी. बंगाल में लोकसभा की कुल 48 सीटें हैं. 2014 में तृणमूल को 34, कांग्रेस को 4 और सीपीएम को 2 सीटें मिली थी. इस बार भी इन तीनों दलों के गठबंधन में जाने की बात कही जा रही है.

2019 में तृणमूल कांग्रेस की सीट घटकर 22 और कांग्रेस की 2 पर पहुंच गई. सीपीएम 2019 में एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई. हालांकि, पार्टी का वोट 6 प्रतिशत के आसपास ही रहा. बंगाल में तृणमूल 32, कांग्रेस 6 और सीपीएम 4 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है.

कांग्रेस को मुर्शिदाबाद, ब्रह्मपुर, मालदा उत्तर, मालदा दक्षिण, पुरुलिया और रायगंज सीट दिए जाने की चर्चा है. सीपीएम को उत्तर बंगाल से 2 और मेदिनीपुर-जंगलमहल से 1-1 सीट मिल सकती है.

4. बिहार- बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं और विपक्षी गठबंधन में दलों की संख्या 7. बिहार में 4 दलों को ही अब तक लोकसभा की सीट मिलने की बात कही जा रही है. इनमें जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस और माले शामिल है.

जेडीयू के पास वर्तमान में 17 लोकसभा सांसद हैं, जबकि कांग्रेस को 1 सीटों पर 2019 में जीत मिली थी. बिहार में सीट बंटवारे के फॉर्मूले में जिताऊ उम्मीदवार को तरजीह दिए जाने की बात कही जा रही है.

अगर ऐसा हुआ तो जेडीयू-आरजेडी 16-16, कांग्रेस 6-8 और माले 0-2 सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है. कांग्रेस का दावा किशनगंज, कटिहार, सासाराम, पश्चिमी चंपारण, सुपौल, बेगूसराय और समस्तीपुर सीट पर है.

कटिहार और सुपौल अभी जेडीयू के पास है. इसी तरह आरजेडी की नजर जेडीयू की मधेपुरा और बाकां सीट पर भी है.

5. तमिलनाडु- यहां लोकसभा की 39 सीटें हैं और पिछली बार की तरह इस बार भी डीएमके और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी में है. डीएमके पिछली बार की तरह ही इस बार भी 28 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, जबकि कांग्रेस को 10 और एक सीट मुस्लिम लीग को मिल सकता है.

कांग्रेस तमिलनाडु में डीएमके के सहारे 9 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. 2019 में कांग्रेस का सबसे सफल गठबंधन तमिलनाडु में ही रहा था.

6. हरियाणा- हरियाणा में लोकसभा की 10 सीटें हैं और यहां कांग्रेस के इनेलो से गठबंधन में रहकर चुनाव लड़ सकती है. इनेलो के मुखिया ओम प्रकाश चौटाला को नीतीश कुमार का करीबी माना जाता है. इनेलो की ही रैली में नीतीश समेत कई विपक्षी नेता पहली बार जुटे थे.

हरियाणा में अगर इनेलो-कांग्रेस का गठबंधन होता है, तो कांग्रेस 8 और इनेलो 2 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है. इनेलो को हिसार और जिंद सीट गठबंधन के तहत दिया जा सकता है.

तीन राज्यों में अब भी पेंच, सुलझाने की कवायद जारी
केरल, पंजाब और दिल्ली में सीट बंटवारे पर अब तक पेंच फंसा ही है. इसकी वजह कांग्रेस की उहापोह स्थिति है. कांग्रेस पंजाब और दिल्ली में आप से गठबंधन करने को राजी नहीं है, लेकिन नीतीश कुमार ने अरविंद केजरीवाल को भी न्यौता दे दिया है.

पंजाब में आप की सरकार है, लेकिन वहां की 13 में से 9 सीटों पर 2019 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. कांग्रेस पंजाब में मुख्य विपक्षी पार्टी है. दिल्ली में भी कांग्रस और आप में झगड़ा है. पंजाब और दिल्ली के स्थानीय नेताओं ने आप से गठबंधन का विरोध किया है.

ठीक इसी तरह केरल में भी विवाद है. केरल में सीपीएम की सरकार है, लेकिन लोकसभा में कांग्रेस को बढ़त मिली थी. 2019 में कांग्रेस गठबंधन ने 20 में से 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस अपना सीटिंग सीट सीपीएम को नहीं देना चाहती है.

7 राज्यों की 157 सीटों पर सिर्फ कांग्रेस उम्मीदवार
मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, कर्नाटक और ओडिशा की 157 सीटों पर कांग्रेस अकेले लड़ेगी. इन जगहों पर विपक्ष का पूरा समर्थन कांग्रेस को रहेगा. 2019 में इन 157 में से कांग्रेस को सिर्फ 10 सीटों पर जीत मिली थी.

मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की 120 सीटों पर बीजेपी से सीधी लड़ाई है. ओडिशा और तेलंगाना में कांग्रेस की लड़ाई क्षेत्रीय पार्टियों से है. दोनों जगहों पर बीजेपी भी मजबूत स्थिति में है.

कर्नाटक में कांग्रेस का मुकाबला बीजेपी और जेडीएस के साथ है. संभावनाएं जताई जा रही है कि 2024 चुनाव में जेडीएस बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती है.

असम का फैसला अभी होल्ड है. माना जा रहा है कि यहां गठबंधन पर फैसले का जिम्मा कांग्रेस हाईकमान पर छोड़ा जा सकता है. असम में लोकसभा की 14 सीटें हैं.

 

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