टीवी की एक खूबी यह है कि अगर उसमें एक ही तरह के सीन दैनिक भाव से दिखते रहें तो वे दर्शकों के दिमागों में बैठ जाते हैं। इसीलिए लोग अपनी ‘शिकायतों’ को टीवी में ‘दैनिक खबर’ के रूप में दिखाते–दिखवाते हैं ताकि वे धीरे–धीरे एक ‘नैरेटिव’‚ ‘कहानी’ या ‘गाथा’ की तरह यानी एक ‘सीरियल’ की तरह बन जाएं और दर्शकों की ‘दैनिक अदालत’ में सुनी जाएं। ऐसी हर ‘खबर’ (कहानी) में एक ‘पीडित’ पक्ष होता है‚ और एक ‘उत्पीडÃक’ पक्ष होता है। ‘पीडित’ कहता है कि ‘उत्पीडक’ को सजा दो। ‘उत्पीडक’ कहता है कि वो बेकसूर है। उसके खिलाफ राजनीति हो रही है।
यहीं मीडिया की ‘भूमिका’ आती है‚ और कहना न होगा कि अपनी सारी सीमाओं के बावूजद मीडिया ने संसद और अदालतों के समानांतर ‘दर्शकों की अदालतें’ बना कर अपनी सार्थकता सिद्ध भी की है। शायद इसीलिए आज की जनता जानती है कि उसकी शिकायत कोई सुने न सुने‚ ‘मीडिया’ जरूर सुनेगा–सुनवाएगा और इसीलिए ‘सोशल मीडिया’ से लेकर ‘टीवी मीडिया’ तक ऐसी ‘मीडिया अदालतें’ सुनवाई करती रहती हैं‚ और फैसले देती रहती हैं। इनको मीडिया की ‘लोक अदालत’ कहा जा सकता है‚ जो अपने ‘दर्शकों’ को एक प्रकार की ‘ज्यूरी’ में बदल देती हैं‚ जो हर खबर‚ हर कहानी पर अपना फैसला दे सकती है।
कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जो अलग–अलग वक्त पर अलग–अलग मुद्दों और शिकायतों की ‘सीरियल खबर’ बनाते रहे और सत्ता–समाजों को हिलाते भी रहे। कुछ बरस पहले हुआ ‘अन्ना आंदोलन’ ऐसी ही ‘शिकायती कहानी’ थी‚ जो दिन–रात आई और जिसका असर भी हुआ। ‘शाहीनबाग’ भी एक ‘शिकायती कहानी’ रही जिसने महीनों तक रोज किसी सीरियल की तरह अपनी ‘खबर’ बनाई और जिसका अंत दिल्ली के दंगों के रूप में दिखा। एक ‘सीरियल खबर’ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के ‘धरने’ के रूप में आती दिखी। महीनों तक चैनलों की ‘दैनिक कहानी’ बनी रही। दर्शकों की ‘अदालतें’ देखती रहीं और अपनी राय बनाती रहीं। सत्ता दबाव में आती रही और अंततः उसे कानून वापस लेने पड़े़। एक कहानी इन दिनों ‘अंतरराष्ट्रीय इनामी पहलवानों’ की ‘शिकायतों’ की आ रही है। एक महीने से अधिक धरने पर बैठी‚ रोती और गुहार करती कहानी की ‘नायक’ कुछ ‘महिला पहलवान’ हैं‚ और ‘खलनायक’ वो हैं जो कुश्ती संघ के अघ्यक्ष रहे हैं‚ और जिनके खिलाफ कुछ महिला पहलवानों ने ‘सेक्सुअल हेरासमेंट’ की शिकायतें की हैं।
शुरू में मीडिया इस कहानी को कुछ तटस्थता के साथ दिखाता रहा लेकिन ज्यों–ज्यों समय निकला‚ त्यों–त्यों ‘इनामी महिला पहलवानों’ की इस कहानी के प्रति मीडिया की हमदर्दी भी बढती दिखी। कई एंकर और रिपोर्टर‚ जो शुरू में इस कहानी के ‘पक्ष–विपक्ष’‚ दोनों को दिखाते थे‚ अब साफ कहने लगे हैं कि इस मामले में ‘कार्रवाई’ में इतनी देर क्यों हो रही हैॽ कहने की जरूरत नहीं कि जब बडी अदालत ने आदेश दिया और मीडिया ने सवाल उठाने शुरू किए‚ तब जाकर पुलिस ने शिकायत दर्ज की लेकिन ‘अपेक्षित कार्रवाई’ अभी तक नहीं हुई। और अब तो पहलवानों की इस कहानी में ‘कुछ राजनीतिक दल’ भी डुबकी लगाते दिखते हैं। जाहिर है इस कहानी के एक ओर ‘सत्ता’ है‚ जो खामोश है तो दूसरी ओर पीडित हैं‚ जो मुखर हैं।
लेकिन सत्ताएं अक्सर ऐसा ही करती हैं। वे तुरंत ‘एक्शन’ में नहीं आतीं। हम सब जानते हैं कि इस तरह की ‘लेटलतीफी’ के चलते जब समय से कार्रवाई नहीं होती तो वही शिकायत ‘डबल शिकायत’ बन जाती है‚ और सत्ता ‘टारगेट’ बनती रहती है। मगर‚ सत्ताएं इसी तरह से सोचती हैं कि हर खबर अपनी मौत अपने आप मर जाती है। कोई एक दो दिन में मर जाती है‚ कोई दस पंद्रह दिन लेती है। इसलिए खबर के मरने का इंतजार करते रहो। लेकिन आज के ‘चौबीस बाई सात’ के ‘रीयल टाइम’ मीडिया और ‘सोशल मीडिया’ की अदालतों के दौर में न कोई खबर जल्दी मरती है‚ न कोई लंबा ‘इंतजार’ करता है। इसीलिए आज अगर सत्ता और प्रशासन किसी ‘समस्या’ का हल वक्त रहते नहीं करते तो वो उनके लिए ‘सिरदर्द’ बन जाती है। यही होता दिख रहा है। ध्यान रहे कि मीडिया ने आम आदमी की न्याय की आंकाक्षा को इतना ‘तीखा’ किया है कि आज कोई भी इंतजार नहीं करना चाहता। हर आदमी यही चाहता है कि उसे न्याय मिले और वो भी ‘अभी और इसी वक्त’ मिले। इस स्थिति से सत्ताओं और संस्थानों को उचित ‘सबक’ लेना चाहिए और ‘तिनके’ को ‘पहाडÃ’ न बनने देना चाहिए।
कहना न होगा कि अपनी सारी सीमाओं के बावूजद मीडिया ने संसद और अदालतों के समानांतर ‘दर्शकों की अदालतें’ बना कर अपनी सार्थकता सिद्ध की है। शायद इसीलिए जनता जानती है कि उसकी शिकायत कोई सुने न सुने‚ ‘मीडिया’ जरूर सुनेगा–सुनवाएगा। इनको मीडिया की ‘लोक अदालत’ कहा जा सकता है




