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जापान में सजा महाशक्तियों का महामंच, रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा क्या होंगे G7 के सबसे बड़े एजेंडे?

UB India News by UB India News
May 21, 2023
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर, ब्लॉग
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जापान में सजा महाशक्तियों का महामंच, रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा क्या होंगे G7 के सबसे बड़े एजेंडे?
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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी7 समिट में हिस्सा लेने के लिए शुक्रवार (19 मई) को जापान के हिरोशिमा पहुंचे थे. पीएम नरेंद्र मोदी ने हिरोशिमा में जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा से मुलाकात की. इस दौरान दोनों नेताओं ने जापान और भारत की जी 7 और जी 20 की अध्यक्षता के तहत विभिन्न वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए बातचीत है.

इस बार जी7 में सबसे चुनौती वाला मुद्दा Russia-Ukraine युद्ध है. हालांकि जानकारी के मुताबिक यूक्रेन रूस की जंग के अलावा भी जी 7 में कई अहम मुद्दों पर बात हो सकती है. दुनिया के 7 धनी देशों का ये संगठन 19 मई से लेकर 21 मई तक उसी हिरोशिमा शहर के सबसे शानदार होटल ग्रैंड प्रिंस में जी 7 समिट कर रहा है. इस बार जी7 का सबसे जरूरी मुद्दा Russia-Ukraine युद्ध है.

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इन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा

यूक्रेन रूस की जंग को एक साल से बहुत ज्यादा समय हो गया है, लेकिन ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जी 7 में तीन जरूरी मुद्दों पर भी बात होने का अनुमान है. जैसे आतंकवाद, इकोनॉमी रिकवरी, यूनाइटेड नेशन स्ट्रेटजी. इसके अलावा महंगाई, क्लाइमेट चेंज और भविष्य में होनी पानी के संकट पर भी बात की जा सकती है.

जापान के हिरोशिमा शहर में दुनिया के अमीर देशों के संगठन ‘G7’ की बैठक 19 मई को कल से शुरू हुई. इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार चौथी बार इस संगठन की मीटिंग में बतौर गेस्ट शामिल हो रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने G7 की बैठक में हिस्सा लेने से पहले फुमियो से मुलाकात की और महात्मा गांधी की प्रतिमा का अनावरण किया.

इस दौरान उन्होंने दुनिया को शांति का संदेश भी दिया. इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिरोशिमा में महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित करने और उसका अनावरण करने का अवसर देने के लिए जापान सरकार को धन्यवाद दिया.

जापान के हिरोशिमा में शुक्रवार से जी-7 समिट शुरू हो गया है. भारत जी-7 का स्थायी सदस्य नहीं है लेकिन फिर भी पिछले कई सालों से लगातार भारत को इस समिट में गेस्ट के तौर पर बुलाया जाता है. 2019 के बाद से यह लगातार पांचवीं बार है जब भारत को जी-7 समिट में बुलाया गया है. गेस्ट कंट्री के तौर भारत को सबसे पहले जी-7 समिट में फ्रांस ने 2003 में बुलाया था. उसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी पांच बार जी-7 बैठक में हिस्सा लिया है.

इस साल भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कोमोरोस, कुक आइलैंड्स, इंडोनेशिया, साउथ कोरिया, वियतनाम को भी गेस्ट कंट्री के तौर पर बुलाया गया है. वहीं, संस्था के रूप यूनाइटेड नेशन, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, डब्ल्यूएचओ और डब्ल्यूटीओ को बुलाया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को तीन देशों जापान, पापुआ न्यू गिनी और ऑस्ट्रेलिया दौरे पर रवाना हुए. पीएम मोदी जापान के हिरोशिमा शहर में आयोजित हो रही जी-7 समिट में भाग लेंगे.

वैसे तो यह पहली बार नहीं है जब भारत को जी-7 देशों की ओर से भारत को बुलाया गया है. लेकिन पीएम मोदी का यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद यह पहली बार है जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री हिरोशिमा का दौरा कर रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1945 में परमाणु हमले का शिकार हिरोशिमा के दौरे पर इससे पहले 1957 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू गए थे.

इसके अलावा यूक्रेन में रूसी आक्रमण को लेकर भी भारत का रुख अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी के रुख से अलग रहा है. साथ ही आर्थिक प्रतिबंध के बावजूद भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है. इससे पहले गेहूं के निर्यात पर भी भारत ने रोक लगा दी थी. जिससे अमेरिका खुश नहीं था. ऐसे में एक बार फिर से भारत को गेस्ट कंट्री के तौर पर बुलाने के क्या मायने हैं?

जी-7 की आर्थिक हिस्सेदारी में गिरावट

पिछले कुछ सालों से जी-7 का प्रभाव कम हो रहा है. 1980 के दशक में दुनिया की कुल GDP का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा जी-7 देशों का होता था. अब यह घटकर करीब 30 फीसदी के करीब रह गया है. भविष्य में भी जी-7 देशों का प्रमुख देश ब्रिटेन के लगभग बराबर है. वहीं, अन्य सदस्य देश जैसे फ्रांस, इटली और कनाडा से अधिक है. रक्षा बजट पर खर्च करने वाला भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है. इसके अलावा भारत एक लोकतांत्रिक देश है. भारत के मत के बाद जी-7 अपनी बातों को प्रमुखता से रख सकता है. यही कारण है कि जी-7 भारत को पिछले कई सालों से हर समिट में आमंत्रित करता रहा है.

2022 के समिट के लिए जर्मनी ने जब भारत को बुलाया था तो भारत के विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने कहा भी था कि जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत की नियमित भागीदारी यह दिखाती है कि पश्चिमी देशों को दुनिया के सामने बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत के समर्थन की जरूरत है.

चीन को रोकने की कोशिश

दक्षिण चीन सागर में चीन फिलीपींस सहित कई अन्य देशों के क्षेत्रों में भी अपना दावा ठोंकता रहता है. फिलीपींस इस मामले को अन्तराष्ट्रीय अदालत में ले गया. 2016 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने चीन के इस दावे को खारिज कर दिया. चीन ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को नजरअंदाज करते हुए फिलीपींस के आसपास कृत्रिम द्वीपों का निर्माण जारी रखा.

चीन का ऐसा रवैया मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानून को चुनौती दे रहा है. चीन के साथ भारत का भी सीमा विवाद है. आए दिन भारत और चीन के बीच एलएसी के पास झड़प की खबरें आती रहती हैं. ऐसे में चीन को रोकने में जी-7 देश भारत को अपने साथ लाना चाहते हैं.

इसके अलावा जी-7 समिट में भारत को बुलाना जी-7 के लिए ग्लोबल साउथ के महत्व को भी दर्शाता है. जी-7 और ग्लोबल साउथ के देशों के बीच काफी समय से तनाव रहा है. ग्लोबल साउथ में अपना प्रभाव जमाने के लिए चीन और अमेरिका आमने-सामने है. यूक्रेन में रूसी आक्रमण के बाद दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है जी-7 देशों की ओर से से बार-बार अनुरोध और चेतावनी के बावजूद ग्लोबल साउथ के अहम देश जी-7 के साथ सहमत नहीं हुए.

हाल ही में जापान के एक अधिकारी ने भी एक अंग्रेजी वेबसाइट से बात करते हुए कहा है कि जापान ने भारत को ग्लोबल साउथ के 120 विकासशील और अल्प-विकसित देशों के प्रतिनिधि के तौर पर बुलाया है. अधिकारी ने यह भी कहा कि भारत को समिट में बुलाना ग्लोबल साउथ तक जी-7 की पहुंच को मजबूत करने का हिस्सा है.

क्या भारत जी-7 का स्थायी सदस्य बन पाएगा?

पिछले पांच सालों में आयोजित जी-7 समिट को देखा जाए तो सभी समिट में भारत को गेस्ट कंट्री के तौर पर बुलाया गया है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि अगर निकट भविष्य में भारत जी-7 का स्थायी सदस्य बन जाता है तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी.

हडसन इंस्टीट्यूट में फेलो Dr Satoru Nagao का कहना है कि वैश्विक पटल पर भारत का बढ़ता प्रभाव और विश्व के प्रति भारत के उत्तरदायित्व को देखते हुए जी-7 भारत के मत को नजरअंदाज नहीं कर सकता है.

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) अपना प्रभाव खो रहा है. अब जी-7 समूह को सबसे प्रभावशाली समूह माना जाता है. ऐसे में भारत के आने से जी-7 और मजबूत तरीके से अपनी बात रख पाएगा. क्योंकि अमेरिका के चीन और रूस से संबंध खराब होते जा रहे हैं. पहले की तरह UNSC अब कड़े फैसले नहीं ले पा रहा है.

इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि उत्तर कोरिया ने नियमों का उल्लंघन करते हुए मिसाइलों का परीक्षण किया. लेकिन UNSC चाह कर भी उत्तर कोरिया के खिलाफ कड़े प्रतिबंध नहीं लगा सकता, क्योंकि चीन और रूस इस पर वीटो पर कर देते हैं. ऐसे मे UNSC के बजाय G7 का रोल बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है. यूक्रेन में रूसी आक्रमण के बाद भी जी-7 देशों ने अपनी बात मजबूती से रखी है.

 

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