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निष्पक्ष हों संवैधानिक संस्थाएं

UB India News by UB India News
March 6, 2023
in कानून, खास खबर, ब्लॉग
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चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए SC बनाएगा कमेटी, PM समेत ये होंगे मेंबर
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भारत निर्वाचन आयोग में चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च अदालत की ५ सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने पिछले गुरुûवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। फैसले के बाद भारत निर्वाचन आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति पर केंद्र का सीधा हस्तक्षेप घटेगा। कोर्ट ने फैसला सुनाते समय इस बात पर जोर डाला कि संविधानिक संस्थाओं का निष्पक्ष होना लोकतंत्र के लिए बहुत आवश्यक है। सभी राजनैतिक दलों ने फैसले का स्वागत किया जा रहा है। शीर्ष अदालत के ३७८ पन्नों के इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे १९९७ का ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ का फैसला है।

इस फैसले में प्रवर्तन निदेशालय‚ सीबीआई और सीवीसी के निदेशकों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को लेकर दिशा–निर्देश दिए गए थे‚ जिससे जांच एजेंसियों को सरकारी दखल से अलग रख कर निष्पक्ष और स्वायत्त रूप से कार्य करने की छूट दी गई थी परंतु सवाल उठता है कि क्या जांच एजेंसियां सरकार के दबाव से मुक्त हुईॽ ऐसा क्या हुआ कि उसी शीर्ष अदालत ने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कहाॽ दरअसल‚ पिछले कुछ वर्षो से चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर विपक्षी दलों में ही नहीं‚ बल्कि लोकतंत्र में आस्था रखने वाले हर जागरूक नागरिक के मन में भी अनेक प्रश्न खड़े हो रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति की फाइल मांग कर भारत सरकार की स्थिति को असहज कर दिया था पर इसका सकारात्मक संदेश देश में गया। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की विवादास्पद भूमिका पर टिप्पणी करते हुए १९९०–९६ में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन को याद किया और कहा है‚ ‘देश को टीएन शेषन जैसे व्यक्ति की जरूरत है।’

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सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी २०१८ से लंबित कई जनहित याचिकाओं की संवैधानिक पीठ के सामने चल रही सुनवाई के दौरान की जिनमें मांग की गई है कि चुनाव आयोग के सदस्यों का चयन भी कॉलेजियम प्रक्रिया से होना चाहिए। बहस के दौरान पीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जोसेफ ने कहा कि यह चयन सर्वोच्च न्यायालय के ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ फैसले के अनुरूप भी क्यों नहीं हो सकता हैॽ जिसके अनुसार चयन समिति में तीन सदस्य हों–भारत के प्रधान न्यायाधीश‚ प्रधानमंत्री और लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष।

यह मांग सर्वथा उचित है क्योंकि चुनाव आयोग का वास्ता देश के सभी राजनैतिक दलों से पड़ता है। उसके सदस्यों का चयन केवल सरकार करती है तो जाहिरन ऐसे अधिकारियों को चुनेगी जो उसके इशारे पर चले। इस फैसले के आधार पर जब तक संसद द्वारा कानून पास नहीं हो जाता तब तक इसी फैसले के दिशा–निर्देशों के अनुसार चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां होंगी। पिछले कुछ वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करते हुए जिस तरह मुख्य जांच एजेंसियों के निदेशकों की नियुक्ति और सेवा विस्तार किए जा रहे हैं‚ उससे इन एजेंसियों की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर स्वाल उठ रहे हैं। यदि किसी जांच एजेंसी के निदेशक को इस बात का पता है कि शीर्ष अदालत के आदेश के तहत उसकी नियुक्ति पारदर्शिता से हुई है तो उसे उसके दो साल के निश्चित कार्यकाल से कोई नहीं हटा सकता‚ परंतु यदि उसके नियुक्ति पत्र में कुछ ऐसा लिखा जाए कि उस निदेशक का कार्यकाल एक निश्चित अवधि ‘या अगले आदेश तक’ वैध है‚ तो उस पर अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी दबाव बना रहता है। ऐसे में वो निदेशक कितना स्वायत्त या निष्पक्ष रहेगा कहा नहीं जा सकता। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने राज्य सभा में कहा था‚ ‘यह खतरा बड़ा है‚ रिटायर होने के बाद सरकारी पद पाने की इच्छा रिटायर होने से पहले के जज के फैसलों को प्रभावित करती है‚ यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है।’ एक अन्य बयान में जेटली ने कहा था‚ ‘रिटायर होने से पहले दिए जाने वाले फैसले रिटायर होने के बाद मिलने वाले पद के प्रभाव में दिए जाते हैं।’ जेटली का बयान न सिर्फ जजों पर लागू होता है‚ बल्कि जांच एजेंसियों और कुछ संविधानिक पदों पर नियुक्त लोगों पर भी लागू होता है। ऐसे में इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए‚ परंतु सरकार जिस भी दल की हो वो ऐसी नियुक्तियों के लिए भेजे जाने वाले नामों के पैनल में केवल अपने चहेते अधिकारियों के ही नाम भेजती है।

ऐसे में नियुक्त करने वाली समिति के पास इन्हीं नामों में से एक का चयन करने का विकल्प रहता है। यदि महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की सूची को सार्वजनिक किया जाए और बेदाग छवि वाले सेवानिवृत्त अधिकारियों की राय भी ली जाए तो ऐसी नियुक्तियों को निष्पक्ष माना जा सकता है। इस दिशा में व्यापक दिशा–निर्देशों की भी आवश्यकता है। ऐसा होता है तो जनता का विश्वास न सिर्फ नियुक्ति की प्रणाली में बढ़ेगा‚ बल्कि इन संस्थाओं की कार्यशैली में भी बढ़ेगा। जांच एजेंसियां हों या चुनाव आयोग या कोई अन्य सांविधानिक संस्था यदि वो निष्पक्ष और स्वायत्त रहती है तो लोकतंत्र मजबूत रहता है। यदि ऐसा नहीं होता तो लोकतंत्र खतरे में आ सकता है। इसलिए सर्वोच्च अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए इसे कानून का रूप दिया जाना चाहिए और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि सभी नियुक्तियों को पारदर्शिता से किया जाए न कि पक्षपात के साथ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने हर चुनाव अभियान में इस बात पर जोर देते हैं कि सभी विपक्षी दल भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं जबकि भाजपा ईमानदार सरकार देने का वायदा करती है। पिछले हफ्ते कर्नाटक के भाजपा विधायक के बेटे को किसी ठेकेदार से ४० लाख की रिश्वत लेते लोकायुक्त ने गिरफ्तार करवाया। उसके घर से ८ करोड़ रुûपये भी बरामद हुए। इसी राज्य में पिछले वर्ष एक ठेकेदार ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि भाजपा सरकार का मंत्री उससे ४० प्रतिशत कमीशन मांग रहा है। कर्नाटक का तो यह एक उदाहरण है पर क्या जनता कह सकती है कि उनके राज्य में भाजपा के सत्ता के आने बाद भ्रष्टाचार खत्म हो गया या कम हो गयाॽ तो क्या वजह है कि पिछले वर्षों में सीबीआई और ईडी के छापे केवल विपक्षी दलों के नेताओं पर ही पड़े हैंॽ इस विवाद से बचने को जरूरी है कि मोदी जी जांच एजेंसियों और संविधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता और स्वायत्तता सुनिश्चित करें।

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