भारत समृद्धिशाली ऋतुओं का देश है। विशेष तौर पर उत्तर और पश्चिमी भारत में तो छह ऋतुएं–ग्रीष्म‚ वर्षा‚ शरद‚ हेमंत‚ शिशिर और बसंत–वर्ष भर प्रकृति की हर छटा बिखेरती हैं। ऋतु चक्र पर दृष्टिपात करें तो मार्च और अप्रैल के महीने खूबसूरत बसंत ऋतु कहलाते हैं। सर्दियां कम होने लगती हैं‚ और रबी की फसलें पकने की ओर होती हैं। मई और जून में गर्मी का मौसम आ जाता है। तापमान बढ़कर अपना मिजाज दिखाने लगता है। इसके बाद जुलाई और अगस्त में ऋतुओं की रानी वर्षा ऋतु का आगमन होता है। गर्मी से राहत मिलती है और पेड़–पौधों को मानसूनी वर्षा आह्लादित कर नया जीवन प्रदान करती है। वर्षा के बाद सर्दियों से पहले सितम्बर और अक्टूबर के महीनों में शरद का आगमन पतझड़ के मौसम की शुरुआत के साथ नदियों को साफ–स्वच्छ कर देता हैं। नवम्बर और दिसम्बर के महीनों में हेमंत तो सर्दियों का पूरी तरह अहसास दिलाने लगती है। कड़ाके की ठंड के साथ जनवरी में शीत ऋतु शुरू हो जाती है‚ और फरवरी तक प्रभाव रखती है।
इस तरह भारत का मौसमी चक्र सदियों से चला आया है। शीत ऋतु के बाद बसंत ऋतु आती है‚ लेकिन ग्लोबल वामिग के कारण मौसम के बदलाव ने ऋतुराज बसंत ऋतु पर खतरा मंडरा दिया है। तापमान में इतनी बढ़ोतरी हो गई है कि फरवरी का महीना मार्च के महीने की तरह लगने लगा। फरवरी के मौसम में ही तापमान बढ़ने से रबी की फसलें गेहूं‚ जौ‚ सरसों‚ चना‚ मटर‚ अलसी‚ आलू आदि पर बहुत असर पड़ रहा है। किसानों को चिंता है कि अगेती गेहूं की फसल पर तो तापमान का कुछ कम असर पड़ेगा लेकिन जिन किसानों ने देरी से गेहूं फसल की बुवाई की थी‚ उनकी फसल की पैदावार पर पूरा असर होगा। सामान्य मौसम की अपेक्षा अधिक तापमान बढ़ने से खेतों में नमी की कमी आएगी। फसलों को अधिक पानी लगाने की जरूरत होगी।
तापमान अधिक होने से गेहूं‚ सरसों जैसी अपरिपक्व फसलें जल्दी पकने लगेंगी। पानी की कमी रही तो गेहूं का दाना सुकड़ कर पैदावार पर असर करेगा। सब्जियों की पैदावार भी खतरे में है। उत्तरी और पश्चिमी भारत में अभी तक फरवरी माह में जो अधिकतम तापमान २८ और न्यूनतम १५ डिग्री सेल्सियस रहता था‚ इस बार सामान्य तापमान से ५ से ८ डिग्री सेल्सियस के बीच अधिक तापमान देखा जा रहा है। हालत यह है कि अभी से उत्तर पश्चिमी भारत के सात राज्यों में मध्य मार्च में रहने वाले तापमान के बराबर तापमान है। न्यूनतम और अधिकतम तापमान में इजाफा हो रहा है। माना जा रहा है कि सर्दियों में बारिश का न होना‚ नमी और आद्रता की कमी‚ प्रदूषण में बढ़ोतरी और जलवायु परिवर्तन से पिघलते ग्लेशियर के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है। भारत में गर्मी की दशाएं बढ़ रही हैं। हीट वेव की घोषणाएं अप्रैल से जुलाई के महीने में घोषित की जाती थीं। फरवरी–मार्च में हीट वेव की घोषणाएं होने लगेंगी तो अभी से सरकार को निपटने को योजनाएं बनानी होंगी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की जनवरी‚ २०२३ की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले ८ साल विश्व स्तर पर रिकार्ड सबसे गर्म रहे हैं‚ जो लगातार वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मौजूदगी का प्रभाव हैं। २०२२ में पूर्व औद्योगिक (१८५०–१९००) स्तर से औसत वैश्विक तापमान करीब १.१५ डिग्री सेल्सियस ऊपर था जबकि २०१३–२०२२ की अवधि के लिए १० साल का औसत तापमान पूर्व औद्योगिक (१८५०–१९००) आधार रेखा से १.१४ डिग्री सेल्सियस ऊपर है।
यही कारण है कि २०२२ में विश्व स्तर पर नाटकीय मौसम आपदाओं का सामना किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े आर्थिक नुकसान और इंसानी मौतों के साथ पाकिस्तान के बड़े क्षेत्रों में बाढ़ आई। चीन‚ यूरोप‚ उत्तर और दक्षिण अमेरिका में रिकॉर्डतोड़ लू चली। अमरीका के हॉर्न में लंबे समय तक चलने वाला सूखा मानवीय तबाही का खतरा है। अभी ग्लोबल वामिग और अन्य दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तनों के रुझान जारी रहने की उम्मीद है। वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के रिकॉर्ड स्तर के कारण अत्यधिक गर्मी की लहरों‚ सूखे और विनाशकारी बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया है। क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप२७) यानी संयुक्त राष्ट्र संघ के २७वें सालाना जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भारत ने अपनी दीर्घकालीन कम कार्बन विकास रणनीति में सात क्षेत्रों को शामिल किया है। इनमें नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार और ग्रिड को मजबूत बनाना‚ जीवाश्म इधन स्रोतों का तर्कसंगत उपयोग‚ ई वाहनों को प्रोत्साहन‚ पेट्रोल और डीजल में जैव इधन के मिश्रण में निरंतर वृद्धि‚ ऊर्जा दक्षता का विस्तार और भावी इधन के तौर पर ग्रीन हाइड्रोजन को शामिल किया है। विश्व स्तर पर गहराते ग्लोबल वामिग के प्रभावों से साल दर साल मौसमी घटनाएं चरम स्तर तक पहुंच रही हैं। विश्व पटल पर जलवायु में परिवर्तन गंभीर समस्या बन गई है। वैश्विक तापमान को १.५ डिग्री सेल्सियस तक रखने के लिए भारत को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती और अनुकूल उपायों पर तेजी लाने की जरूरत है।







