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ये नये शीत युद्ध के संकेत हैं……

UB India News by UB India News
February 10, 2023
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर, टेक्नोलॉजी, ब्लॉग
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ये नये शीत युद्ध के संकेत हैं……
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वेज्ञानिक शोध पर आधारित तकनीक से जुड़ी खुफिया जानकारियों को चोरी से हासिल करने की चीन की कोशिशें लगातार वैश्विक तनाव बढ़ा रही हैं। हाल में अमेरिका के आसमान में चीनी जासूसी गुब्बारे की दस्तक से उठा राजनयिक विवाद महज संयोग नहीं है। पिछले वर्ष चीन ने भारत के लिए भी अप्रत्याशित चुनौतियां पेश की थीं जब अगस्त में हंबनटोटा में एक चीनी जासूसी जहाज युआन वांग के आने के कारण भारत और श्रीलंका के बीच बड़ा राजनयिक विवाद पैदा हो गया था।

युआन वांग उच्च तकनीक पर आधारित ऐसा आधुनिकतम जहाज है‚ जिसे चीन ने मिसाइल परीक्षणों और सैटेलाइट की गतिविधियों की निगरानी के लिए डिजाइन किया है। उस समय चीन ने इस जहाज को अनुसंधान से संबंधित बताया था तो अब अमेरिकी आसमान में चक्कर लगाने वाले गुब्बारे को मौसम का अनुमान लगाने वाला ऐसा बलून बताया जो रास्ता भटक गया था‚ लेकिन चीन की नीयत पर सवाल उठने लाजिमी हैं। अमेरिका और कनाडा के आसमान में घूमने वाला गुब्बारा कोई सामान्य गुब्बारा नहीं था। यह मोंटाना के आसमान में देखा गया था। मोंटाना कम आबादी वाला इलाका है‚ जो अमेरिका के तीन न्यूक्लियर मिसाइल क्षेत्रों में से एक है। अमेरिका को विश्वास है कि चीन का जासूसी गुब्बारा इन संवेदनशील जगहों की जानकारी जुटाने के मकसद से उड़ रहा था। अमेरिका के उत्तरी कमांड के एक लड़ाकू विमान ने चीन के भेजे गए उचाई से सर्विलांस करने वाले स्पाई बलून को सफलतापूर्वक दक्षिण कैरोलिना के पास समंदर में गिरा दिया। इस घटना से चीन और अमेरिका के बीच विवाद इतना बढ गया है कि अमेरिका के विदेश मंत्री ने चीन की अपनी प्रस्तावित यात्रा रद्द कर दी है।

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दरअसल‚ चीन अंतरराष्ट्रीय समझौतों और मापदंडों को नजरअंदाज करके तथा दूसरे देशों की तकनीकों को अवैधानिक तरीकों से हासिल करके महाशक्तियों से आगे निकल जाना चाहता है। हाल में अमेरिका के सामरिक और शोध केंद्रों पर काम करने वाले कुछ चीनी नागरिकों की गिरफ्तारी से कई रहस्य उजागर हुए हैं। चीन के एक नागरिक जी चाओचिन लगभग एक दशक पहले स्टूडेंट वीजा पर अमेरिका आए थे और उसके बाद अमेरिकी सेना के रिजर्व ग्रुप में शामिल हो गए। इस दौरान वे चीन को खुफिया जानकारियां भेजते रहे जो मुख्यतः तकनीक पर आधारित थीं। चाओचिन की कोशिश थी कि सीआईए‚ एफबीआई और नासा जैसे उच्च संस्थानों में बतौर साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ जुड़ा जाए ताकि इन एजेंसियों के डेटाबेस तक उनकी पहुंच हो। इसके पहले भी अमेरिकी एविएशन और एयरोस्पेस कंपनियों के ट्रेड सीक्रेट चुराने के आरोप में एक चीनी नागरिक को पकड़ा गया था। जेंग शियाओचिंग नाम का यह चीनी नागरिक जनरल इले्ट्रिरक से जुड़ा था। जनरल इले्ट्रिरक स्वास्थ्य‚ ऊर्जा और अंतरिक्ष के क्षेत्रों में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी है‚ जो फ्रिज से लेकर हवाई जहाज के इंजन तक का निर्माण करती है। जेंग ने जो जानकारी कंपनी से चुराई वो गैस और भांप से चलने वाली टर्बाइन बनाने की डिजाइन से जुड़ी हुई थी। इसमें टर्बाइन की ब्लेड और उनकी सील से जुड़ी सूचनाएं भी शामिल थीं। माना गया कि अमेरिकी कंपनी से चुराए गए इन तकनीकी राजों से चीन की सरकार‚ विश्वविद्यालयों और कंपनियों को फायदा होना था। अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी ने चीन के इरादों की पुष्टि करते हुए कहा है कि यह साम्यवादी देश बड़े शहरों से छोटे कस्बों तक‚ फॉर्च्यून १०० कंपनियों से लेकर स्टार्टअप तक‚ हवाई उद्योग से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दवा उद्योग तक‚ में सेंधमारी करके तकनीकी राज चुराने में जुटा है ताकि अपना औद्योगिक विकास तेज करके प्रमुख क्षेत्रों में प्रभुत्व हासिल कर सके। चीन ने दुनिया भर से तकनीक हासिल करने के लिए व्यापारिक समझौतों का सहारा लिया है। हालांकि चीन समझौतों और नियमों को दरकिनार करने के लिए बदनाम रहा है। चीन की तकनीक चुराने की कोशिशों से अमेरिका इतना आतंकित है कि दूसरे देशों से समझौते करके सीधे तौर पर सेमीकंड़क्टर के अहम उद्योग में चीन को दूर रखने की कोशिशों में जुट गया है। अब अमेरिकी तकनीक या सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके चिप बनाने वाली कंपनियों को चिप का निर्यात चीन को करने के लिए अमेरिका से लाइसेंस लेना होगा। फिर चाहे वो कंपनियां अमेरिका में चिप बनाती हों या दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में। अमेरिका में बसे चीनी नागरिकों को लेकर भी प्रशासन सतर्क है। इसलिए उसने अपने नागरिकों और ग्रीन कार्डधारकों को कुछ खास चीनी चिप कंपनियों के लिए काम करने पर भी रोक लगा दी है। यह भी विश्वास किया जाता है कि जापान‚ दक्षिण कोरिया‚ ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों से व्यापारिक समझौतों के बूते चीन ने व्यापक तकनीकी राज हासिल किए हैं। खासकर कामगारों को मोटी रकम देकर उनसे खुफिया जानकारी हासिल करने की चीन की कई कोशिशें बेपर्दा हुई हैं। चीन के अधिकारी विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने और फिर उससे आगे निकलने के लिए अंतरिक्ष और हवाई उद्योग पर ज्यादा काम कर रहे हैं‚ और इसीलिए चोरी से हासिल तकनीक के लिए मोटी रकम भी खर्च कर रहे हैं।

भारत अंतरिक्ष विज्ञान में दुनिया की बड़ी शक्ति है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए लॉन्च बेस इंफ़्रास्ट्रक्चर देने वाला सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र‚ श्रीहरिकोटा में स्थित है‚ जो हंबनटोटा से करीब ग्यारह सौ किमी. की दूरी पर है। हंबनटोटा में चीनी जासूसी जहाज युआन वांग ५ को चीन अपना रिसर्च पोत बताता है जबकि चीन अपने इस श्रेणी के पोतों का इस्तेमाल उपग्रह‚ रॉकेट और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल के प्रक्षेपण को ट्रैक करने के लिए करता है। देखने में आया है कि हिंद महासागर में चीन के जासूसी पोत उस समय अक्सर अपनी गतिविधियों को बढ़ा लेते हैं‚ जब भारत का कोई सामरिक या अंतरिक्ष परीक्षण उस क्षेत्र में प्रस्तावित होता है। भारत और अमेरिका जैसे देश इन्हें स्पाई शिप मानते हैं‚ जो दूसरे देशों की जासूसी करने के लिए तैनात किए जाते हैं। अब अमेरिका ने चीनी गुब्बारे को भी स्पाई बलून बताया है। बहरहाल‚ चीन की तकनीक हासिल करने की आक्रामक कोशिशें दुनिया में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा रही हैं‚ और ये नये शीत युद्ध के संकेत हैं।

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