केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपना पांचवां बजट पेश करते समय सबको भरमाने की पूरी कोशिश की है। इस साल नौ विधानसभाओं के चुनाव हैं‚ और २०२४ में लोक सभा चुनाव। इसलिए उन्होंने ग्रामीण‚ शहरी मतदाताओं को रिझाने के लिए भरपूर कोशिश की है। मोदी सरकार के सड़़क एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गड़़करी ने यह कहने में कोई संकोच नहीं किया कि मध्यम वर्ग को घास नहीं ड़ाली जाती है‚ लेकिन इस बजट में उनका ध्यान रखा गया है पर आयकरदाताओं को जो राहत वित्त मंत्री ने दी है‚ वे नये और पुराने‚ टैक्स राज के भ्रमजाल में उलझ कर रह गई है।
वित्त मंत्री ने पुराने टैक्स राज में कोई राहत प्रदान नहीं की है जबकि आज की तारीख में ९० फीसदी से अधिक करदाता पुराने टैक्स राज के माध्यम से अपना टैक्स अदा करते हैं‚ जिसमें ८० सी के तहत डे़ढ़ लाख रुपये सालाना बचत निवेश पर टैक्स छूट मिलती थी। नये टैक्स राज में प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने इसमें इनकम टैक्स छूट की सीमा ५ लाख रुपये से बढ़ा कर ७ लाख रुपये कर दी है। इसके साथ ५० हजार रुपये की मानक कटौती का लाभ भी अब नये टैक्स राज में मिलेगा जो पहले नहीं मिलता था। वित्त मंत्री के अनुसार मानक कटौती के शामिल होने से ही प्रत्येक वेतनभोगी व्यक्ति‚ जिसकी आय १५.५ लाख रुपये या उससे अधिक है‚ को परिणामस्वरूप ५२ हजार ५०० रुपये का लाभ मिलेगा। इस बजट में मेहनतकश‚ श्रमजीवी और गरीबों के लिए कोई खास घोषणाएं नहीं की गई हैं जबकि देश के धनाढयों पर अधिकतम टैक्स दर ४२.७ फीसदी थी‚ इसे घटाकर ३९ फीसदी कर दिया गया है। यह उच्चतम अधिभार ३७% को घटाकर २५ फीसदी कर दिया गया है जिससे अधिकतम २५ टैक्स दर में तकरीबन ४ फीसदी की कमी आई है।
ग्रामीण मतदाताओं को भरमाने के लिए वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में बहुत जोर देकर घोषणा की है कि प्रधान मंत्री आवास योजना के परिव्यय को ६६ फीसद से बढ़ाकर ७९५९० करोड़़ रुपये कर दिया गया है। पर वित्त मंत्री द्वारा पेश दस्तावेज बताते हैं कि पिछले साल इस पर ७७१३० करोड़़ रुपये आने का संशोधित अनुमान है। प्रधानमंत्री मोदी की प्रधान मंत्री सड़़क योजना सबसे पसंदीदा योजनाओं में से एक है लेकिन इसके परिव्यय में कोई बढोतरी पिछले या संशोधित बजट अनुमान से नहीं की गई है। बजट बनाते समय वित्त मंत्री पर चुनावों का दबाव साफ दिखाई देता है। कर्नाटक राज्य में सूखे से निपटने के लिए ५३०० करोड़़ रुपये बजट में दिए गए हैं। यहां भाजपा की सरकार है और भाजपा की स्थिति यहां ड़ावांड़ोल बताई जाती है। मई‚ २०२३ में यहां विधानसभा के चुनाव होने हैं। केरल‚ तमिलनाडू़ और ओडि़शा में आइ प्राकृतिक आपदाओं के लिए कभी बजटीय प्रावधान की घोषणा नहीं की गई थी। इस बजट की सबसे गजब बात यह है कि वित्त मंत्री ने अपने पूरे बजट भाषण में किसानों की आय दोगुनी करने का जिक्र तक नहीं किया। प्रधानमंत्री मोदी ने २०१६ में आह्वान किया था कि २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। किसानों की आय कहां तक पहुंची है‚ अब स्वयं प्रधानमंत्री भी इसका जिक्र नहीं करते हैं। पेश बजट में कुल व्यय का अनुमान ४५.०३ लाख करोड़़ रुपये रखा गया है‚ जो पिछले बजट से ७.५ फीसदी ज्यादा है‚ और कुल राजस्व प्राप्तियां २६.३२ लाख करोड़़ रुपये की दर्शाई गईहैं‚ जो पिछले बजट के संशोधित अनुमान से लगभग १२ फीसदी ज्यादा है। ये सारी गणनाएं १०.५ फीसदी की सांकेतिक जीड़ीपी (सकल घरेलू उत्पाद) विकास दर पर की गई हैं। १०.५ फीसदी की सांकेतिक जीड़ीपी दर का गणित बीते मंगलवार को पेश आर्थिक सर्वेक्षण से मेल नहीं खाता है। इस सर्वेक्षण में बताया गया है कि वित्त वर्ष २०२३–२४ में जीड़ीपी की विकास दर ६ से ६.८ फीसदी रहेगी। यदि सांकेतिक दर में से महंगाई दर घटा देते हैं‚ तो वास्तविक जीड़ीपी विकास दर आ जाती है। अब सांकेतिक जीड़ीपी दर १०.५ में से ६ फीसदी की वास्तविक जीड़ीपी दर घटा दें तो महंगाई दर ४.५ फीसदी आती है‚ जिसकी कोई चर्चा न बजट में है‚ न आर्थिक सर्वेक्षण में। मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन का भरोसा है कि २०२३–२४ में जीड़ीपी विकास दर ६.५ रहेगी तो महंगाई दर महज ४ फीसदी होनी चाहिए जिसका भरोसा स्वयं भारतीय रिजर्व बैंक को नहीं है‚ जो महंगाई को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक उपाय करता है। मतलब यह है कि बजट का गणित कच्चा लगता है।
रोजगार को बढ़ाने के लिए बजट भाषण में पर्यटन विकास पर वित्त मंत्री ने काफी जोर दिया है। लेकिन यह कैसे बढ़ेगा‚ इसका कोई खाका पेश नहीं किया गया है। पर्यटन उद्योग जीएसटी की भारी दरों से परेशान है‚ जिससे पर्यटन उद्योग का विकास ठहरा हुआ सा है। हां‚ बजट घाटा अनुमान के अनुसार जीड़ीपी का ५.९ फीसदी रखा गया है। पूंजीगत खर्चे में खासी वृद्धि की गई है‚ जिसके लिए १० लाख करोड़़ रुपये का प्रावधान है। लेकिन शिक्षा–स्वास्थ्य के बजट में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहींू की गई है। सरकार का पूरा जोर लोहे–लगड़ यानी आधार मूल ढांचे के विकास पर ज्यादा है। लेकिन मेहनतकश आदमी को निहत्था छोड़़ दिया गया है। इतनी महंगाई हो जाने के बाद भी ग्रामीण असहाय मजदूरों को रोजगार गारंटी देने वाली योजना मनरेगा के बजट में कोई वृद्धि नहीं गई है‚ बल्कि पिछले साल के संशोधित अनुमान में २९ हजार करोड़़ रुपये घटा दिया गया है। कुल मिला कर इस बजट में चुनावी हल्ला ज्यादा है‚ गल्ला कम।
रोजगार बढ़ाने के लिए बजट भाषण में पर्यटन विकास पर वित्त मंत्री ने काफी जोर दिया है। लेकिन इसका कोई खाका पेश नहीं किया गया है। पर्यटन उद्योग जीएसटी की भारी दरों से परेशान है‚ जिससे पर्यटन उद्योग का विकास ठहरा है। हां‚ बजट घाटा अनुमान के अनुसार जीड़ीपी का ५.९ फीसदी रखा गया है। पूंजीगत खर्चे में खासी वृद्धि की गई है। सरकार का पूरा जोर मूल ढांचे के विकास पर ज्यादा है लेकिन मेहनतकश को निहत्था छोड़़ दिया गया है॥







