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जातीय जनगणना: सियासी उठापठक होगी तेज…..

UB India News by UB India News
January 11, 2023
in खास खबर, बिहार, ब्लॉग
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जातीय जनगणना: सियासी उठापठक होगी तेज…..
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बिहार सरकार द्वारा जातीय जनगणना करने से मना करने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में जाति आधारित जनगणना शुरू कर दी है। इससे क्या सामाजिक लक्ष्य हासिल होंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है‚ लेकिन जाति आधारित राजनीति को बल मिलने के साथ जाति आधारित आरक्षण की मांग जरूर पुरजोर ढंग से उठेगी। इस गिनती में एक अच्छी बात यह है कि इसमें सभी जाति समूह के लोगों की आर्थिक स्थिति का भी सर्वेक्षण किया जाएगा।

देश के सभी राजनीतिक दल जातीय समीकरण के आधार पर ही चुनाव में टिकट बांटते हैं। इस लिहाज से कहना गलत नहीं लगता कि जाति गिनती से सामाजिक संरचना दूषित होगी। अनुसूचित जातियों/जनजातियों की गिनती जातीय आधार पर ही होती है‚ फिर भी जातीय ताना–बाना अपनी जगह बदस्तूर है। नीतीश ने तो अति–पिछड़ी और अति–दलित जातियों के विभाजन के आधार पर ही जदयू का वजूद कायम किया हुआ है। भाजपा अब इसमें सेंध लगा रही है। नब्बे के दशक में वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं‚ तब से जाति गणना की मांग तीव्रता से उठती रही है। यह मांग भिन्न विचारधारा वाले राजनीतिक दल उठाते रहे हैं। ड़ॉ. राममनोहर लोहिया की समाजवादी वैचारिकता से उदित इस राजनीति का नारा है‚ ‘जिसकी जितनी संख्या भारी‚ उसकी उतनी हिस्सेदारी।’ हालांकि इन मांगों के चलते २०११ की जनगणना के साथ अलग से एक प्रारूप पर सामाजिक‚ आर्थिक और जाति आधारित जनगणना की गई थी किंतु मूल जनगणना के साथ की गई इस गिनती के आंकड़े न तो मनमोहन सिंह सरकार ने उजागर किए और न ही नरेन्द्र मोदी सरकार ने।

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दरअसल‚ जातिगत जनगणना ऐसा मुद्दा है‚ जिसमें सतह पर तो खूबियां दिखाई देती हैं‚ लेकिन अनेक डरावनी आशंकाएं भी इसके गर्भ में छिपी हैं। बहरहाल‚ आनन फानन में ऐसे गंभीर मुद्दे पर कोई आसान निर्णय भविष्य में कठिन साबित हो सकता है। हालांकि भारत में १९३१ की जनगणना जाति के आधार पर हुई थी। इसी आधार पर अनुमान लगाया गया है कि पिछड़े वर्ग की आबादी ५२ फीसदी है‚ जिसे इस गणना के पैरोकार ६० फीसदी तक मानते हैं। २०११ में जिलेवार जातियों के नमूने के आधार पर पिछड़ेपन का आकलन किया गया था‚ लेकिन इसके नतीजे विसंगतिपूर्ण मिले। निष्कर्षतः कोई जाति किसी एक जिले या प्रांत में पिछड़ी थी‚ तो दूसरे प्रांत में सामाजिक‚ आर्थिक और शैक्षक रूप में सक्षम और संपन्न थी। जातिगत गणना के परिणामों को संख्या बल के आधार पर आरक्षण दिया जाता है‚ तो समाज में विषमता के साथ कटुता भी उत्पन्न होगी। बृहत्तर हिंदू समाज (हिन्दू‚ जैन‚ बौद्ध‚ सिख) में जिस जातीय संरचना को ब्राह्मणवादी व्यवस्था का दुष्चक्र माना जाता है‚ हकीकत में यह व्यवस्था इतनी पुख्ता है कि इसकी तह में जाना मुश्किल है। मुस्लिम समाज में भी जाति प्रथा पर पर्दा डला हुआ है। अभिजात्य मुस्लिम वर्ग यही स्थिति बनाए रखना चाहता है‚ जबकि मुसलमानों की सौ से अधिक जातियां हैं परंतु इनकी गिनती भी पहचान का आधार धर्म और लिंग है।

शायद इसीलिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है‚ ‘जाति ब्राह्मणवादी व्यवस्था का कुछ ऐसा दुष्चक्र है कि हर जाति को अपनी जाति से छोटी जाति मिल जाती है। यह ब्राह्मणवाद नहीं है‚ बल्कि पूरी की पूरी एक साइकिल है। अगर यह जातिचक्र एक सीधी रेखा में होता तो इसे तोड़ा जा सकता था। यह वर्तुलाकार है। इसका कोई अंत नहीं है।’ अर्थात इससे मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। वैसे भी धर्म के बीज–संस्कार जिस तरह से हमारे बाल अवचेतन में‚ जन्मजात संस्कारों के रूप में बो दिए जाते हैं‚ कमोबेश उसी स्थिति में जातीय संस्कार भी नादान उम्र में उड़ेल दिए जाते हैं। इस तथ्य को एकाएक नहीं नकारा जा सकता कि जाति एक चक्र है। जाति चक्र न होती तो अब तक टूट गई होती। जाति पर जबरदस्त कुठाराघात महाभारत काल के भौतिकवादी ऋषि चार्वाक ने किया था। उनका दर्शन था‚ ‘इस अनंत संसार में कामदेव अलंघ्य हैं। कुल में जब कामिनी ही मूल है तो जाति की परिकल्पना किसलिएॽ

इसीलिए संकीर्ण योनि होने से भी जातियां दुष्ट‚ दूषित या दोषग्रस्त ही हैं‚ इस कारण जाति एवं धर्म को छोड़कर स्वेच्छाचार का आचरण करें।’ गौतम बुद्ध ने भी जो राज सत्ता भगवान के नाम से चलाई जाती थी‚ उसे धर्म से पृथक किया। बुद्ध धर्म‚ जाति और वर्णाश्रित राज व्यवस्था को तोड़कर समग्र भारतीय नागरिक समाज के लिए समान आचार संहिता प्रयोग में लाए। चाणक्य ने जन्म और जातिगत श्रेष्ठता को तिलांजलि देते हुए व्यक्तिगत योग्यता को मान्यता दी। गुरुनानक देव ने जातीय अवधारणा को अमान्य करते हुए राज सत्ता में धर्म के उपयोग को मानवाधिकारों का हनन माना। संत कबीरदास ने जातिवाद को ठेंगा दिखाते हुए कहा भी‚ ‘जाति न पूछो साधु की‚ पूछ लीजियो ज्ञान। मोल करो तलवार का‚ पड़ी रहने दो म्यान।’ महात्मा गांधी के जाति प्रथा तोड़ने के प्रयास तो इतने अतुलनीय थे कि उन्होंने ‘अछूतोद्धार’ जैसे आंदोलन चलाकर भंगी का काम दिनचर्या में शामिल करके उसे आचरण में आत्मसात किया। भगवान महावीर‚ संत रैदास‚ राजा राममोहन राय‚ दयानंद सरस्वती‚ विवेकानंद‚ ज्योतिबा फुले‚ अंबेडकर ने जाति तोड़क अनेक प्रयत्न किए लेकिन जाति है कि मजबूत होती चली गई। इतने सार्थक प्रयासों के बाद भी क्या जाति टूट पाईॽ नहीं‚ क्योंकि कुलीन हिंदू मानसिकता‚ जाति तोड़क कोशिशों के समानांतर अवचेतन में पैठ जमाए बैठे मूल से अपनी जातीय अस्मिता और उसके भेद को लेकर लगातार संघर्ष करती रही है।

इसी मूल की प्रतिच्छाया हम पिछड़ों और दलितों में देख सकते हैं। मुख्यधारा में आने के बाद न पिछड़ा‚ पिछड़ा रह जाता है‚ और न दलित‚ दलित। वह उन्हीं ब्राह्मणवादी हथकंड़ों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगता है‚ जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हजारों साल से हथकंडे़ रहे हैं। नतीजतन‚ जातीय संगठन और दल भी अस्तित्व में आ गए। अतएव बिहार में जातिगत आंकड़े आने के बाद यदि उन्हें आरक्षण और लाभदायी योजनाओं का आधार बनाया जाता है‚ तो जातिगत खाई और चौड़ी होगी जो समाज‚ राज्य और देश को बड़ी हानि पहुंचा सकती है।

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