लोकसभा चुनाव नजदीक आने के पूर्व विपक्षी दलों द्वारा सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध एकजुट होने और सत्ता में पहुंचने की कवायद नई नहीं है। बावजूद इसमें देश की रु चि बनी रहती है। इस समय दो मुख्यमंत्रियों बिहार के नीतीश कुमार तथा तेलंगाना के के. चंद्रशेखर राव केंद्र की सरकार और भाजपा विरोधी मोर्चा के लिए सबसे ज्यादा कवायद करते देखे जा रहे हैं।
नीतीश ने अपनी पार्टी की बैठक में साफ कहा कि हम एकजुट हो गए तो ये लोग सत्ता से चले जाएंगे। पिछले दिनों जद (यू) की बैठक में उनकी पार्टी के अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा कि हम बिहार की सभी ४० लोक सभा सीट जीतेंगे। बैठक में बाहर से दिखता पूरा माहौल नीतीश को राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी विरोधी मोर्चे के नेतृत्व करने के उत्साही वातावरण से भरा था। विपक्ष और सत्ता पक्ष की राजनीति का लंबा अनुभव रखने वाले जद (यू) के महासचिव केसी त्यागी ने उसी बैठक में कहा कि नीतीश कुमार को ६ महीना के लिए आप लोग दिल्ली भेज दो फिर देखो कैसे पूरा माहौल बदल जाता है। चंद्रशेखर राव ने नई दिल्ली में अपनी पार्टी कार्यालय की शुरुआत की‚ जिसमें अखिलेश यादव शामिल हुए। अखिलेश यादव ने नीतीश कुमार का भी समर्थन किया। वे इसके पहले कई राज्यों की राजधानियों का दौरा कर नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं।
लोक सभा चुनाव में अब सवा साल से भी कम समय बचा है। प्रश्न है कि इन गतिविधियों के आधार पर भाजपा विरोधी राजनीति की क्या तस्वीर खींची जा सकती हैॽ नीतीश ने भाजपा से अलग होने की घोषणा के साथ ही इस दिशा में बयान आरंभ कर दिया था। वो बाद में दिल्ली आए और कई नेताओं से मिले। लालू प्रसाद यादव के साथ सोनिया गांधी से भी उनकी मुलाकात हुई। २०१३ में भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश ने इस तरह विपक्षी गोलबंदी की कोशिश नहीं की थी। केवल बिहार में मोदी विरोधी आक्रामक अभियान चलाया था। २०१४ के चुनाव में क्या हुआ यह सामने है। हालांकि तब उनके साथ राजद‚ कांग्रेस‚ कम्युनिस्ट पार्टियां आदि नहीं थी। इस बार वे इन सब दलों के गठबंधन के नेता है। उस समय उनकी पार्टी के लोग बताते थे कि अगर हमने लोक सभा में २८ से ३० सीटें जीत लिया तो नीतीश प्रधानमंत्री के दावेदार होंगे। उन्हें यह भी लगता था कि भाजपा को बहुमत मिलेगा नहीं और पार्टी में भाजपा मोदी विरोधी उस स्थिति में नीतीश को नेता स्वीकार कर सकते हैं। अगर गैर भाजपा सरकार की नौबत आई तो विपक्ष उन्हें स्वीकार करने से गुरेज नहीं करेगा क्योंकि उनकी छवि सुशासन बाबू की बन गई है। इस बार भी उनकी पार्टी के नेता यही कह रहे हैं कि अगर हमने बिहार से भाजपा की सीटें कम कर दी‚ इसका असर दूसरे राज्यों में हुआ तो ये सत्ता से बाहर होंगे‚ विपक्ष की सरकार बनेगी और नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे। हालांकि सार्वजनिक तौर पर नीतीश कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। यही नहीं वे बिहार में भी घोषित कर चुके हैं कि आगे तेजस्वी जी को ही नेतृत्व करना है। जाहिर है‚ इसके द्वारा उन्होंने संदेश दिया कि वो केंद्रीय राजनीति में अभिरु चि रखते हैं तथा उनका लक्ष्य मोदी सरकार को सत्ता से हटाना है और राज्य का नेतृत्व तेजस्वी करें। इससे गठबंधन की एकता बनी रहेगी तथा दूसरी ओर उन्हें लगता है कि देश भर के विपक्ष का विश्वास उनकी ओर बढ़ेगा कि वो इस विषय को लेकर गंभीर हैं।
नीतीश कुमार की इस राजनीति का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अभी तक विपक्ष के किसी बड़े नेता ने स्वयं आकर उनसे विपक्षी एकता पर बातचीत तक नहीं की है। उद्धव ठाकरे के सुपुत्र आदित्य ठाकरे अवश्य वहां गए थे‚ लेकिन उन्होंने पहली मुलाकात तेजस्वी यादव से की और बाद में नीतीश से मिलने गए। पिछले वर्ष बोचहां विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की उम्मीदवार बुरी तरह पराजित हुई थी। यह बिहार के सामाजिक समीकरण में कुछ जातियों का राजग के विरु द्ध विद्रोह था क्योंकि उन्हें लगता था कि लंबे समय से हम भाजपा को और उसके कारण नीतीश को समर्थन दे रहे हैं‚ लेकिन राजनीति में उन्हें महत्व नहीं मिलता। इसके आधार पर जद (यू) के नेताओं ने मान लिया कि राज्य में भाजपा विरोधी वातावरण है जबकि सच यह नहीं था। बाद में हुए तीन उपचुनावों परिणाम में से दो भाजपा जीत गई। इससे भाजपा का उत्साह बढ़ा है।
जहरीली शराब से हुई मौत के मामले में उसका तेवर देखने लायक हैं। कम–से–कम इन उप चुनाव परिणामों के आधार पर यह मानना कठिन है कि लोक सभा चुनाव में जद (यू)‚ राजद आदि की आकांक्षाएं उसी रूप में साकार होंगी जैसी वह कल्पना कर रहे हैं। हां‚ तेलंगाना के उपचुनाव में चंद्रशेखर राव को अवश्य सफलता मिल रही है लेकिन भाजपा वहां मुख्य विपक्ष के रूप में उभर चुकी है। भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में तेलांगना‚ बिहार‚ पश्चिम बंगाल‚ पंजाब आदि राज्यों पर ज्यादा फोकस कर रही है। दूसरे‚ नीतीश अगर कांग्रेस को साथ लेकर चलना चाहते हैं तो चंद्रशेखर राव इसके विरुद्ध हैं। तीसरी‚ आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा बढी है और वह विपक्षी कावायदों से अपने को दूर रखता है। चन्द्रशेखर राव ने किसान आंदोलन के नेता गुरनाम सिंह चढुनी को हरियाणा किसान मंच का अध्यक्ष घोषित कर संदेश दिया कि वह बाहर के राज्यों में भी उन नेताओं को महत्व देने वाले हैं‚ जो मोदी विरोधी अभियान में किसी–न–किसी तरह शामिल रहे हैं। किंतु अभी तक उनके ऑफर को स्वीकार करने वाला किसी पार्टी का कोई आसान नेता सामने नहीं आया जिसका जनाधार हो।
कांग्रेस इन मामलों पर अभी खामोश है तथा राहुल गांधी की भारत यात्रा पर फोकस कर रही है। उसे लगता है कि राहुल गांधी की छवि निखारने के बाद वे भाजपा और नरेन्द्र मोदी विरोध के सबसे बड़े चेहरा होंगे। अभी तक तमिलनाडु में डीएमके तथा महाराष्ट्र में उनके साथी राकांपा और शिवसेना को छोड़कर किसी दल ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में सक्रिय सहभागिता नहीं दिखाई है। शरद पवार ने कुछ महीने पूर्व अवश्य कहा था कि वे किसी मोर्चे का नेता नहीं बनेंगे। ममता बनर्जी की स्वयं महत्वाकांक्षाएं हैं। हां‚ अब उनका पूर्व का आक्रामक तेवर गायब है। इस तरह देखा जाए तो नीतीश कुमार और राव की अनवरत कोशिशों के बावजूद मोदी विरोधी विपक्षी एकता के राष्ट्रीय स्तर पर साकार प्रतिध्वनि हमें सुनाई नहीं पड़ रही।







