नोटबंदी-500 और 1000 रुपये के नोट को चलन से बाहर करने-पर सर्वोच्च अदालत की संवैधानिक पीठ के 4:1 से फैसले से यह बहस अब खत्म हो जानी चाहिए कि नोटबंदी का फैसला गलत था।
शीर्ष अदालत ने नोटबंदी के खिलाफ दायर 58 याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया है। याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार के इस फैसले से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी। सर्वोच्च अदालत के जस्टिस एस. नजीर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने फैसले में नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है।
हालांकि जस्टिस नागरत्ना ने चारों जजों के निर्णय से उलट अपने फैसले में इसे गैरकानूनी बताया। पीठ ने साफ तौर पर कहा कि नोटबंदी के लिए सरकार ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया, इसलिए फैसला वैध था। अलबत्ता, अदालत की यह टिप्पणी को परखा जाना चाहिए कि ‘नोटबंदी का मकसद कालाधन, टेरर फंडिंग जैसे अपराध को रोकना था, लेकिन अब यह बात मायने नहीं रखती कि वे लक्ष्य हासिल हुए या नहीं क्योंकि हम फैसले का कानूनी पहलू जांच सकते हैं, आर्थिक असर की जांच नहीं कर सकते।’
जबकि नोटबंदी के फैसले से अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान हुआ, आमजन को भारी दुारियों का सामना करना पड़ा, छोटे और मंझोले स्तर के उद्योग धंधे बर्बाद हो गए। सोचनीय मसला संसद को नोटबंदी के फैसले से अलग रखने का भी है। संसद लोकतंत्र का आधार है। इसे इतने महत्त्वपूर्ण मामले में अलग नहीं छोड़ा जा सकता है। स्वाभाविक तौर पर यह जरूरी था कि इतने गंभीर मुद्दे पर संसद में चर्चा होती और उसके बाद मंजूरी मिलती।
बहरहाल, केंद्र की मोदी सरकार को इस ‘सुप्रीम फैसले’ से बड़ी राहत मिली है और वह ज्यादा दमखम और तर्क के साथ विपक्ष के खिलाफ हमलावर रुख अख्तियार करेगी। साथ ही इस बड़ी कानूनी जीत के बाद भाजपा इसे भुनाने में कोई कोर-कसर भी नहीं रखेगी। लंबे वक्त से भाजपा को नोटबंदी के फैसले को लेकर घेरा जाता था, मगर अब पार्टी ज्यादा प्रभावी तरीके से इसका सियासी फायदा उठाने की कोशिश करेगी। विपक्ष को भी इससे उबरकर नये सिरे से अपनी रणनीति को पैना करना होगा।
नोटबंदी के फैसले की समीक्षा आगे भी होती रहेगी, मगर खुले दिल से इस बेहद गंभीर मसले के बारे में सोचने का वक्त चला नहीं गया है। खासकर 500 और 1000 के नोट बंद कर 2000 की करेंसी चालू करना कालाधन पर लगाम कैसे लग सकता है?







