बर्बरता की इंतहा हो गई और इंसानी जमीर ताबूतों में कहीं दफन हो गया। काहिली‚ लापरवाही और बेशर्मी की सारी हदें पार करती बिहार की यह हृदयविदारक घटना आपको झकझोरती है‚ उद्वेलित करती है‚ और जिंदगी के सुघड़ पक्ष की बजाय इसके विकृत रूप को गंभीरता से समझने को बाध्य करती है। प्रायः जनजीवन में चिकित्सकों को श्रद्धा भक्ति ही नहीं‚ प्रेम और विश्वास का प्रतीक भी माना जाता है। यह हमारी मनुष्यगत सहज वृत्ति है कि हम जातिगत‚ कुलगत‚ आचारगत सीमाओं से ऊपर श्रेष्ठ मूल्यों की तराजू में डॉक्टरों को तौलते हैं‚ और अबोधपन के चलते महान‚ मसीहा‚ भगवान और महा मानव जैसे समतुल्य शब्दों से उनका बिंब खींचते हैं। लेकिन हाल की एक घटना ने सादगी‚ सहजता और ईश्वरीय गुणों से लैस इन भगवानों के झक्क सफेद आवरण को थोड़ा सरका दिया है।
हाल में बिहार में महिला मरीजों के साथ घटी सन्न कर देने वाली घटना इस विरादरी के प्रति हमारी आस्था को कमजोर करती है। नसबंदी का ऑपरेशन करा रहीं महिलाएं भयानक दर्द से तब गुजरीं जब एक डॉक्टर ने बिना बेहोश किए उन महिलाओं की शल्य चिकित्सा शुरू कर दी। महिला मरीजों के पूछने पर नर्स द्वारा यह बताया जाना कि ये महिलाएं नशा करती हैं‚ इसलिए इन्हें दर्द हो रहा है‚ वीभत्सता की हदें पार करता है। ड़ॉक्टर द्वारा जागृत अवस्था में चीरा मारना और मरीज द्वारा मना करने पर गंदी–गंदी गालियां देना और कहना कि ज्यादा ड्रामा करोगी तो टांका खुला छोड़ दूंगा और जब शिकायत की बात कही जाए तो कहना‚ ‘तुम जैसी न जाने कितनी आइ और चली गइ‚ तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी’‚ वास्तव में बेशर्मी‚ हैवानियत और दरिंदगी की सड़ी परतों को खोलता है। विकृत मस्तिष्क वाले ऐसे लोग क्या सच में डाक्टर कहलाने के हकदार हैं। तर्कपरायण व्यक्ति ऐसी घटनाओं के अटपटेपन को व्याघात कहकर संतोष कर लेता है पर उनका क्या जो भुक्तभोगी हैं। क्या उन महिलाओं के दर्द को बांटा जा सकता है‚ जो चीखती रहीं‚ गुहार लगाती रहीं पर आंखों पर पट्टी बांधे डॉक्टर अनसुनी करता रहा। आम आदमी या मरीज चक्षुरहित होकर सब कुछ देखता है‚ और वाणी हीन होकर बस दर्द पीता है। क्या उसकी नियति इस असीम ब्रमांड में केवल चरम दर्द पाकर चुप रहने की है। विगत में भी असंवेदनशीलता की ऐसी अनेक घटनाएं सुनने को मिली हैं पर शायद ही ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई हो।
हमारे समाज में प्रतिष्ठा की खंडित दीवारों को तोड़ने की जरूरत है न कि उन्हें महिमा मंडित करने की। कोई हमें बाइप्रोडक्ट समझ कर हम पर निर्ममता और कठोरता का हथौड़ा चलाता रहे और हम उसे भगवान‚ दिगम्बर और खुदा मान उसमें अखंड विश्वास के सहारे उसके दुस्साहस को खुली छूट देते रहें। हमें जल्द ही भ्रमजाल से निकलना होगा। परंपरा से चली आ रही उनकी भाषा‚ उनकी भावना‚ उनकी वृत्ति अब प्राणवान‚ कारु णिक और संवेदनशील नहीं रही। संबंधित चिकित्सक ने जिस तरह महिला मरीज को अपशब्द और अभद्र शब्द कहे उसने डॉक्टरों की भाषा और व्यवहार का भंडाफोड़ किया है। अब हमें आंख मूंद कर आस्था दिखाने की बजाय उनसे सवाल पूछने का साहस दिखाना होगा। व्यावहारिक मूल्यों के प्रतिस्थापन पर ध्यान देकर ही उनकी छवि को पुख्ता किया का सकता है। चिकित्सा क्षेत्र में मानवीय मूल्यों की रक्षा सर्वोपरि है। करुणा‚ प्रेम‚ स्नेह और साहस चिकित्सकों के नैतिक गुण हैं। अगर यही गुण तिरोहित होने लगें तो फिर उनकी ईश्वररूपी छवि को व्याख्यायित करना मुश्किल होगा।







