वर्तमान समय में किसानों की स्थिति में भले थोड़ा बहुत परिवर्तन आया हो परंतु वह अपेक्षाकृत अभी भी बहुत ही कम है। ध्यान देने वाली बात यह है कि २०१६ में पीएम मोदी ने कहा कि २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी जब देश अपनी आजादी के ७५ साल पूरे करेगा। ठीक है कि सरकार का इस दौरान पूरा फोकस पैदावार बढ़ाने और किसानों की आमदनी में वृद्धि पर रहा है। लेकिन किसानों की आय दोगुनी होने का लक्ष्य अब भी काफी पीछे है। अब तो वह डेडलाइन खत्म हो रही है‚ जो पीएम मोदी द्वारा निर्धारित की गई थी।
दरअसल‚ मार्च‚ २०२२ में एग्रीकल्चर पर बनी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में दो सर्वे के आंकड़े बताए थे जो २०१५–१६ और २०१८–१९ के थे। इन सर्वे के आधार पर संसदीय समिति ने बताया था कि २०१५–१६ में देश के किसानों की महीने की औसत आमदनी ८ हजार ५९ रु पये थी‚ जो २०१८–१९ तक बढ़कर १० हजार २१८ हो गई यानी ४ साल में महज २ हजार १५९ रु पये की बढ़ोतरी हुई है।
किसानों की आमदनी अगर बढ़ी है‚ तो खर्च भी बढ़ रहा है। पिछले साल नवम्बर में सरकार ने बताया था कि हर महीने १०‚२१८ रु पये कमाते हैं‚ तो ४‚२२६ रु पये खर्च हो जाते हैं। किसान हर महीने २ हजार ९५९ रु पये बुआई और उत्पादन पर तो १ हजार २६७ रु पये पशुपालन पर खर्च करता है यानी किसानों के पास हाथ में ६ हजार रु पये भी पूरे नहीं आते। इसी में उसे अपना घर चलाना पड़ा है‚ परिवार पालना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई‚ मां–बाप की दवाई‚ सब कुछ उसे उन्हीं ६ हजार रु पयों में करना पड़ता है। ६ हजार रु पये होते क्या हैं‚ यह हम और आप सब जानते हैं। इतनी कम कमाई के चलते ही किसान कर्ज लेने को मजबूर हो जाता है।
सबसे ज्यादा कमाई मेघालय के किसानों की है। यहां के किसान की हर महीने की आमदनी २९ हजार ३४८ रु पये है। दूसरे नम्बर पर पंजाब है‚ जहां के किसान २६ हजार ७०१ रु पये एक महीने में कमाते हैं। तीसरे नम्बर पर २२ हजार ८४१ रु पये की कमाई के साथ हरियाणा के किसान हैं। देश में चार राज्य ऐसे हैं‚ जहां किसानों की आमदनी कम हो गई है। इनमें हैं–झारखंड‚ मध्य प्रदेश‚ ओडिशा और नागालैंड़। झारखंड के किसानों की हर महीने की कमाई २ हजार १७३ रु पये कम हो गई है। वहीं‚ नागालैंड़ के किसानों की आमदनी १ हजार ५५१ रु पये कम हो गई। मध्य प्रदेश के किसानों की आमदनी १४०० रु पये तो ओडिशा के किसानों की आमदनी १६२ रु पये घट गई है। किसान को एक ओर जहां देश का अन्नदाता कहा जाता है वहीं किसान स्वयं का पेट भरने के लिए जिंदगी भर संघर्ष करता रह जाता है‚ और कभी–कभी इतना मजबूर हो जाता है कि उसके सामने आत्महत्या के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं रह जाता।
वर्तमान परिवेश में किसानों को ऋण बड़ी आसानी से उपलब्ध हो जाता है परंतु फसल बर्बाद होने पर कर्ज की भरपाई कैसी की जाए‚ इसका अभी कोई प्रावधान किसानों के पास नहीं है‚ और न ही सरकार इस दिशा में कोई ठस कदम ही उठा रही है। अतः वर्तमान में भी किसानों का जीवन बहुत अधिक सुखद नहीं माना जा सकता। कमेटी ने सुझाव दिया है कि सरकार को एक स्पेशल टीम बनानी चाहिए जो इन राज्यों में किसानों की घटती आमदनी के कारणों का पता लगाए। इन राज्यों में सही कदम उठाने का सुझाव भी दिया है। इन साक्ष्यों को देखने के बाद लगता है कि किसानों के हालत अब दयनीय ही बनी हुई है।
देश की दो तिहाई जनसंख्या ग्रामीण आबादी वाली है। साठ फीसदी जनता ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं खेती से जुड़ी हुई है। लेकिन विकास की भरपूर संभावना वाला कृषि सेक्टर हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा है। कृषि को अभी तक की सरकारें देश की अवाम का पेट भरने तक का ही संसाधन मानती आई है। कृषि के माध्यम से देश की जीडीपी बढ़ाने पर कभी गहन मंथन नहीं हुआ है। देश के अलग–अलग हिस्सों में किसानों की समस्याएं अलग हो सकती हैं‚ लेकिन कुछ समस्याएं हैं‚ जो सब किसानों के साथ हैं। आज कृषि के समक्ष मौजूद चुनौतियों पर विचार करने की जरूरत है। खेती के प्रति लोगों की उत्सुकता और लगाव बढ़ना चाहिए‚ खेती अगली पीढ़ी के लिए आकर्षक हो और खेती करने वालों को खेती के लिए रोका जा सके‚ इस दिशा में और अधिक काम करने की जरूरत है।
कृषि को अभी तक की सरकारें देश की अवाम का पेट भरने तक का ही संसाधन मानती आई है। कृषि के माध्यम से देश की जीडीपी बढ़ाने पर कभी गहन मंथन नहीं हुआ है। देश के अलग–अलग हिस्सों में किसानों की समस्याएं अलग हो सकती हैं‚ लेकिन कुछ समस्याएं हैं‚ जो सब किसानों के साथ हैं॥







