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आखिर वो दर्द क्या है कि कश्मीर पर आधारित इस फिल्म की आलोचना पर इजरायल सरकार ऐक्टिव हो गई

UB India News by UB India News
December 1, 2022
in मनोरंजन, संपादकीय
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आखिर वो दर्द क्या है कि कश्मीर पर आधारित इस फिल्म की आलोचना पर इजरायल सरकार ऐक्टिव हो गई
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‘कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) फिल्म एक बार फिर चर्चा में है। गोवा में एक हफ्ते तक चले 53वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आखिरी दिन जूरी हेड ने कुछ ऐसी बात कह दी कि देशभर के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं दी जाने लगीं। जूरी हेड इजरायल के थे तो वहां के नई दिल्ली में तैनात राजदूत ने सुबह होते ही लंबा ट्वीट किया। उन्होंने इजरायल के फिल्म निर्देशक (Nadav Lapid) को जमकर सुनाया और बिना पढ़े-समझे इस तरह के बयान देने से बचने की नसीहत दे डाली। दरअसल, इफ्फी के जूरी हेड और इजरायल के फिल्मकार नदव लापिद ने कश्मीर फाइल्स को प्रॉपगेंडा और भद्दी फिल्म कह दिया था। यह फिल्म पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा कश्मीरी पंडितों की हत्या के बाद पलायन की दर्दनाक कहानी दिखाती है। इजरायल के राजदूत ने जिस तरह से मेहमान बनकर भारत आए फिल्म एक्सपर्ट को करारा जवाब दिया, वैसा कम ही देखने को मिलता है। आपके मन में भी शायद यह सवाल उठा हो कि आखिर वो दर्द क्या है कि कश्मीर पर आधारित इस फिल्म की आलोचना पर इजरायल सरकार ऐक्टिव हो गई। असल में वो कहानी भी कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की तरह दर्दनाक और रूह कंपाने वाली है।

लापिद (फिल्म निर्माता) को शर्मिंदा होना चाहिए क्योंकि उन्होंने फिल्म महोत्सव में जज के पैनल की अध्यक्षता करने के भारत के निमंत्रण का सबसे अधिक दुरुपयोग किया। मैं इस तरह के बयानों की कड़ी निंदा करता हूं। इसका कोई औचित्य नहीं है। यह यहां कश्मीर मुद्दे की संवेदनशीलता दिखाता है।
नाओर गिलोन, भारत में इजराइल के राजदूत

इजरायल राजदूत का छलका दर्द
अपने फिल्म निर्देशक को फटकार लगाते हुए इजरायली राजदूत नाओर गिलोन का दर्द भी छलक पड़ा। उन्होंने एक ट्वीट में कहा कि होलोकास्ट सर्वाइवर का बेटा होने के नाते मुझे भारत में प्रतिक्रियाओं को देखकर बहुत दुख हुआ। दरअसल, भारत में कई लोग होलोकास्ट की याद दिलाने लगे थे। राजदूत ने कश्मीर मसले पर संवेदनशीलता की भी बात की।

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naor gilon

इजरायल के राजदूत का ट्वीट।

‘कश्मीर फाइल्स’ में भूमिका निभाने वाले अभिनेता अनुपम खेर ने मशहूर अमेरिकी फिल्म निर्माता स्टीवन स्पिलबर्ग की होलोकास्ट ड्रामा ‘शिंडलर्स लिस्ट’ की तस्वीरों के साथ ही ‘द कश्मीर फाइल्स’ की एक तस्वीर भी पोस्ट की। ‘शिंडलर्स लिस्ट’ फिल्म 1993 में आई थी, जो जर्मन उद्योगपति ऑस्कर शिंडलर पर आधारित थी जिन्होंने एक हजार से ज्यादा पोलिश-यहूदी शरणार्थियों को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बचाया था।

कश्मीर फाइल्स… यहूदियों का होलोकास्ट
दरअसल, कश्मीर फाइल्स की चर्चा होने से इजरायल की होलोकास्ट की डरावनी यादें ताजा हो गई हैं। यह एक ऐसा नरसंहार था जिसमें 60 लाख यहूदी मारे गए थे। इसमें कई बच्चे थे। कहानी दूसरे विश्व युद्ध के समय की है। नाजी सेना यहूदियों का कत्लेआम कर रही थी। यह इतना खतरनाक था कि इजरायल के पीएम रहे नफ्ताली बेनेट ने कुछ समय पहले कहा था कि आज कल की किसी भी जंग से होलोकास्ट की तुलना नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि नाजी चाहते थे कि सारे यहूदियों का नामोनिशान मिटा दिया जाए। नाजियों ने आखिर किया क्या था?

60 लाख यहूदियों का कत्लेआम
नाजी जर्मनी की ओर से जानबूझकर, संगठित रूप से, सरकार द्वारा मशीन की तरह मर्डर करने की खौफनाक घटना होलोकास्ट कही जाती है। इसमें करीब 60 लाख यूरोपीय यहूदी मारे गए थे। होलोकास्ट एक ग्रीक शब्द है जिसका मतलब होता है- आग को दी गई आहुति। नाजियों ने (1933-1945) घोषणा कर दी थी कि रोमनी, पोल्स, रूसी और शारीरिक-मानसिक रूप से अक्षम लोगों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। जर्मनी की सत्ता पर काबिज होने के बाद हिटलर ने शिक्षा व्यवस्था, न्यायपालिका, सेना और सिविल सेवाओं में यहूदियों को हटाने का अभियान चलाया। यहूदियों के इबादत स्थल सिनेगॉग को अपवित्र बताकर जला दिया जाता। यहूदी कारोबार का बहिष्कार हुआ और ताला लगने लगा।

israel

इजरायल के राजदूत और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर।

जल्द ही नूरेमबर्ग कानून 1935 पास किया गया और यहूदियों की जर्मन नागरिकता ही खत्म कर दी गई। यहूदी व्यक्ति के किसी गैर-यहूदी से शादी करने पर रोक लग गई और ज्यादातर राजनीतिक अधिकार खत्म कर दिए गए। जर्मनी में पिछले कुछ दशकों में जो कुछ भी गलत हुआ था उसके लिए यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया गया। महंगाई और पहले विश्व युद्ध में मिली हार के लिए यहूदी जिम्मेदार बताए गए। नाजियों ने दंगा भड़काया और 9 नवंबर 1938 की रात 267 सिनेगॉग नष्ट कर दिए गए। कम से कम 91 लोगों की हत्या कर दी गई। लेकिन यह तो शुरुआत थी। अनगिनत यहूदी बिजनस और घरों को तोड़ दिया गया। 30 हजार से ज्यादा यहूदियों को कंसन्ट्रेशन कैंपों में भेज दिया गया। ये कैंप ‘मौत का घर’ थे।

हालात ऐसे बन गए थे कि यहूदियों के लिए जर्मनी छोड़कर अमेरिका समेत किसी दूसरे देश में भागना मुश्किल हो गया। 1939 में यहूदी आबादी वाले पोलैंड की तरफ हिटलर बढ़ा तो उनके लिए भोजन और मेडिकल सेवाएं बंद कर दी गईं। भूख और बीमारी से वारसॉ और लोड्ज में लाखों लोग मारे गए। जनवरी 1942 में नाजी पार्टी के सीनियर अधिकारियों ने यहूदियों के खिलाफ फाइनल सॉल्यूशन के लिए प्लान बनाया। लाखों की संख्या में नाजी पहले से कैंपों में बंद किए जा चुके थे।

बूढ़ों को गैस चेंबर में डाल देते
अब शुरू हुई इंडस्ट्री या कहिए मशीनी हत्या। काम करने वालों को जिंदा रखा जाता और बूढ़े, अपंगों को गैस चेंबर में पहले डाला जाने लगा। इनके सभी दस्तावेजों को नष्ट कर एक खास निशान बना दिया जाता। जिन्हें जिंदा रखते उन्हें बहुत थोड़ा भोजन दिया जाता। हाड़ कंपाने वाली ठंड में बहुत कम कपड़े पहनने को दिए जाते। जैसे ही वे कमजोर होते उन्हें मार दिया जाता। 1943 के मध्य तक डेथ कैंप में पहुंचे लगभग सभी यहूदियों को मौत के घाट उतारा जा चुका था। एक दिन में करीब 5000 शवों को जलाने के इंतजाम किए गए थे। बाद में दुनियाभर के यहूदी इजरायल में बसे लेकिन वो दर्द उन्हें भुलाए नहीं भूलता।

मैंने कश्मीर फाइल्स फिल्म देखी है और कलाकारों से मिला हूं। मेरी आंखों में आंसू आ गए थे। मेरी नदव लापिद से राय अलग है। उनकी स्पीच के बाद मैंने अपनी राय उनसे शेयर की थी।
कोब्बी शोशानी, मुंबई में इजरायल के महावाणिज्यदूत

तब 5000 यहूदियों को भारत ने बचाया था
कम लोगों को ही पता होगा कि जिस समय हिटलर यहूदियों का कत्लेआम कर रहा था, वहां से भागे कुछ यहूदियों को भारत ने बचाया था। 5000 जर्मन बोलने वाले यहूदियों ने 1933-45 के बीच यहां शरण ली थी। हालांकि ब्रिटिश उन्हें शक की नजरों से देख रहे थे। उन्हें लगा कि ये नाजियों के जासूस हो सकते हैं। जवाहरलाल नेहरू ने यहूदियों के भारत आने की वकालत की थी। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया था कि जरूरतमंद यहूदियों को वीजा दिया जाए। वैसे, भारत में यहूदी पहले से रह रहे थे। 8वीं सेंचुरी में पहली बार यहूदियों के भारत आने की जानकारी मिलती है। कोच्चि और मुंबई जैसे शहरों में बड़ी संख्या में यहूदी रहने लगे। कोच्चि में भारत का सबसे पुराना सिनेगॉग है।

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