क्या आप जानते हैं कि इंगलैंड के अलावा भी कई देशों में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री हैं? दीपावली के दिन जैसे ही यह खबर आई कि ऋषि सुनक निर्विरोध ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चुन लिए गए हैं, तो विश्व भर के हिंदुओं में खुशी की लहर दौड़ पड़ी, विशेषकर भारत में। लोग बल्लियों उछलने लगे। मानो भारत ने इंगलैंड को जीत लिया हो। औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त रहे भारतीयों के लिए निश्चय ही यह एक गर्व का विषय है कि ऋषि सुनक उन गोरों के प्रधानमंत्री हैं जो कभी भारतीयों को शासन करने में नाकारा बताते थे।
ऋषि सुनक को ये संस्कार श्रील ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा स्थापित इस्कॉन ने दिए हैं, जो मानता है कि हम हिंदू नहीं,हमारी पहचान सनातन धर्मी के रूप में है। जबकि कुछ संगठन सभी सनातन शास्त्रों व मान्यताओं के विपरीत चलते हुए अपना ही बनाया ‘हिंदुत्व’ सब पर थोपते हैं। लंदन के इस्कॉन मन्दिर में ऋषि सुनक ने सपरिवार जाकर गौ माता का पूजन किया तो कुछ लोग इसे इंगलैंड में भारतीय संस्कृति के प्रसार की संभावना मान कर अति उत्साहित हो गए। पर अगले ही दिन ऋषि सुनक ने ट्विटर पर लिखा कि मेरा संसदीय क्षेत्र गाय और बकरों के मांस का व्यापार करने वालों का है।
यह एक बढिय़ा उद्योग है। कोई क्या खाए, ये उसकी पसंद से तय होता है। इसलिए मैं इस उद्योग को पूरा बढ़ावा दूंगा- देश में भी और विदेश में भी। पिछले हफ्ते सोशल मीडिया पर छाए रहे इस पूरे प्रकरण से कुछ बातें समझनी चाहिएं। पहली बात तो यह है कि भारतीय मूल के जो युवा विदेशों में पैदा हुए और पले बढ़े और वहीं के नागरिक हैं, उनका भारत के प्रति न तो वह भाव है और न ही वह आकर्षण, जो उनके माता-पिता या पूर्वजों का रहा है, जो भारत में जन्मे थे और बाद में विदेशों में जा बसे।
ऋषि सुनक भारतीय उपमहाद्वीप मूल के पहले युवा नहीं हैं जो इस ऊंचाई तक पहुंचे हैं। अमरीका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की ननिहाल तमिलनाडु में है। उन्हें दक्षिण भारतीय खाना पसंद है और वे अपने मौसी-मामाओं से जुड़ी रहती हैं। पर भारत के प्रति कमला हैरिस का रवैया वही है जो आम अमरीकी का है। मसलन वे कश्मीर को मानवाधिकार का विषय मानती हैं। जो भारतीय दृष्टिकोण के विरुद्ध है। हम में से कितने लोग यह जानते हैं कि 2017-2020 तक आयरलैंड के प्रधानमंत्री रहे लिओ वराडकर के माता-पिता मुंबई के पास वसई के रहने वाले हैं।
लिओ ने 2003 में मुंबई के के.ई.एम. अस्पताल से इंटर्नशिप पूरी की थी। उनकी मां आयरिश हैं और पिता भारतीय। लिओ वराडकर की इस प्रभावशाली सफलता का भारत में कोई जिक्र क्यों नहीं करता? क्या इसलिए कि वे ईसाई हैं? यह बहुत ओछी मानसिकता का परिचायक है। इसी तरह पुर्तगाल के मौजूदा प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा भी भारतीय मूल के हैं। उनके माता-पिता का जन्म गोवा में हुआ था। ये दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए हैं।
विडंबना देखिए कि न तो भारत के मीडिया को इसकी खबर है और न ही देश की जनता को। तो फिर भारत मां के इन सपूतों की इस उपलब्धि पर जश्न कौन मनाएगा? जबकि एंटोनियो कोस्टा तो आज भी ओ.सी.आई. कार्ड के धारक हैं और लिओ वराडकर अक्सर अपने रिश्तेदारों से मिलने महाराष्ट्र के ठाणे जिले में आते रहते हैं। पर इसकी मीडिया में कहीं कोई चर्चा क्यों नहीं होती? ये प्रमाण हैं इस बात का कि देश का मीडिया कितना संकुचित और कुंद हो गया है। यह रवैया भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि और लोकतंत्र के लिए घातक है।
पिछले कुछ वर्षों से हिंदुत्व को लेकर जो अभियान चलाया जा रहा है उसे लेकर देश के करोड़ों सनातन धर्मियों के मन में अनेक प्रश्न खड़े हो रहे हैं, जिनका संतुष्टि पूर्ण उत्तर संघ परिवार के सर्वोच्च पदाधिकारियों को देना चाहिए। एक तरफ तो सरसंघचालक डा. मोहन भागवत जी ऐसे वक्तव्य देते हैं जिससे लगता है कि संघ अपने कट्टरपंथी चोले से बाहर आ रहा है। जैसे ‘मुसलमानों और हिंदुओं का डी.एन.ए. एक है।’ ‘अब मस्जिदों में और शिवलिंग खोजना बंद करें।’ दूसरी तरफ संघ प्रेरित सोशल मीडिया का दिन-रात हमला मुसलमानों के विरुद्ध भावनाएं भड़काने के लिए होता रहता है।
यह विरोधाभास क्यों? एक तरफतो संघ परिवार हिंदुत्व की जमकर पैरवी करता है और दूसरी तरफ सनातन धर्म की परंपराओं, वैदिक शास्त्रों और शंकराचार्य जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के विरुद्ध आचरण भी करता है। ये विरोधाभास क्यों? ऐसे में हमारे जैसा एक आस्थावान सनातन धर्मी किस मार्ग का अनुसरण करे? ये भ्रम जितनी जल्दी दूर हो उतना ही हमारे समाज और राष्ट्र के हित में होगा। वरना हम इसी तरह ऋषि सुनक की उपलब्धि पर तो बल्लियों उछलेंगे और एंटोनियो कोस्टा व लिओ वराडकर की उपलब्धियों से मूर्खों की तरह बेख़बर बने रहेंगे। भागवत जी के वक्तव्य को यदि गंभीरता से लिया जाए तो यह खाई अब पटनी चाहिए।





