दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली दंगा मामलों में उमर खालिद की जमानत याचिका रद्द किया जाना तथा ताहिर हुसैन पर सत्र न्यायालय की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं। खालिद का मामला गुणात्मक रूप से सामान्य जमानत न मिलने के मामले से अलग है। इसमें आरोपों पर लंबी बहस के बाद न्यायालय ने बिंदुवार टिप्पणियां की हैं‚ जिनका सार यही है कि खालिद पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं। ताहिर हुसैन को भी सत्र अदालत ने ऐसी ही टिप्पणियां की हैं।
आइए‚ पहले खालिद के मामले पर विचार करें। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने खालिद को दोषी ठहराने के लिए जो लिखा है उसके कुछ बिंदुओं का उल्लेख जरूरी है। एक‚ साजिश की शुरु आत से दंगा भड़काने तक अपीलकर्ता का नाम और भूमिका का जिक्र बार–बार मिलता है। दो‚ प्रदर्शन राजनीतिक‚ सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक रूप से सामान्य विरोध प्रदर्शन न होकर अधिक विनाशकारी और हानिकारक थे। तीन‚ यह अत्यंत गंभीर परिणामों के लिए तैयार किया गया था। चार‚ सड़कों को अवरु द्ध करने से उत्तर पूर्वी दिल्ली में रहने वालों को असुविधा हुई और वे दहशत व असुरक्षा से घिर गए। महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मियों पर हमला प्रथम दृष्टया आतंकवादी अधिनियम की परिभाषा से स्पष्ट होता है। पांच‚ सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकॉर्ड के विश्लेषण से एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में अपीलकर्ता की मौजूदगी और सक्रिय भागीदारी का संकेत मिलता है।
ध्यान रखिए‚ खालिद की ओर से दलील दी गई थी कि फरवरी‚ २०२० में उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा में उनकी भूमिका नहीं थी और न ही किसी आरोपी के साथ उनका आपराधिक संबंध है। न्यायालय ने सीडीआर की विस्तृत रिपोर्ट के मद्देनजर इस दलील को खारिज कर दिया। खालिद के वकील ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल ने नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए सहित वही मुद्दे उठाए थे जिन्हें लेकर पूरे देश में चर्चा चल रही थी और इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है। दिल्ली पुलिस ने २४ फरवरी‚ २०२० को अमरावती में खालिद के भाषण का उल्लेख करते हुए बताया था कि इसमें हिंसा भड़काने के तत्व थे। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि खालिद द्वारा फरवरी‚ २०२० में अमरावती में दिया गया भाषण नफरत भरा था‚ भड़काऊ था। जब खालिद के वकील ने न्यायालय में अमरावती भाषण को पढ़ा तो न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह आक्रामक है‚ बेहूदा है। क्या आपको नहीं लगता कि यह लोगों को उकसाता हैॽ जैसे खालिद ने कहा था कि आपके पूर्वज अंग्रेजों की दलाली कर रहे थे कि आपको नहीं लगता कि आपत्तिजनक हैॽ न्यायालय ने यह भी लिखा है कि इससे लगता है कि किसी समुदाय विशेष ने ही भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी।
खालिद‚ शरजील इमाम और खालिद सैफी को दिल्ली दंगों के मामलों में पुलिस ने जब से गिरफ्तार किया तभी से एक तबका‚ जो स्वयं को लिबरल कहता है‚ इनके पक्ष में अभियान चलाए हुए है। सच यह है कि सीएए‚ एनआरसी‚ दोनों को लेकर मुसलमानों में भय पैदा करने की साजिश देश और देश के बाहर भी हुई। सीएए‚ एनआरसी पर झूठ फैलाना‚ लोगों को भड़काना अपने आप में अपराध था। इन सबने ट्रंप की यात्रा के पूर्व ऐसा वातावरण बनाया था जिससे मुसलमान पुरुषों–्त्रिरयों‚ सब में गुस्सा भर गया था जिनमें काफी लोग हिंसा पर उतारू थे। तीनों अपने भाषणों में बाबरी मस्जिद या तीन तलाक का जिक्र करते तो यह इस्लाम से संबंधित होता। तीनों के भाषणों में समान पैटर्न मिलता है। कश्मीर आते ही यह राष्ट्रीय एकता का मुद्दा बन जाता। जामिया‚ जेएनयू से लेकर अन्य स्थानों से लोगों को भड़काने का काम किया गया। दंगों के षड्यंत्र को लेकर जैसे ही पहला मामला दर्ज हुआ सभी व्हाट्सएप ग्रुप डिलीट किए गए। पुलिस ने न्यायालय में मौजपुर‚ वजीराबाद रोड का नक्शा दिखाया और बताया कि ये पूरे इलाके को ब्लॉक करने के इरादे से इकट्ठे हुए थे। २०१९ और २०२० में हिंसा हुई और दोनों ही चरणों के हिंसा में शामिल लोग एक ही थे। पहले चरण की हिंसा की विफलता के बाद दूसरे चरण की हिंसा की तैयारी शुरू हुई लेकिन पैटर्न समान था। ४ दिसम्बर‚ २०१९ को केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून को स्वीकृति दी और अगले दिन व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया। इस ग्रुप में सरजील इमाम काफी एक्टिव था। स्टूडेंट्स ऑफ जामिया एसओजी की तरफ से पर्चे बांटे गए।
पुलिस के इन तर्कों को न्यायालय ने स्वीकार किया कि अफवाहों के आधार पर विरोध और सड़कों पर रणनीतिक रूप से हिंसा करने की तैयारी की गई थी तथा पुलिस और अर्धसैनिक बलों के बीच तनाव की स्थिति पैदा की गई। वास्तव में एक ओर पूरे देश में सीएए‚ एनआरसी को लेकर मुसलमानों को भड़काया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यही मुद्दा है‚ जिससे मोदी सरकार को अस्थिर करने के साथ दुनिया भर में बदनाम किया जा सकता है‚ वहीं कट्टरपंथी अपराधी तत्वों ने हिंसा को अंजाम दिया। आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप तय करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने कहा कि उनके घर पर इकट्ठा हथियारबंद भीड़ का मकसद हिंदुओं को निशाना बनाकर मारना और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना था। न्यायालय की टिप्पणी है कि हिंदुओं को मारने और उनकी संपत्तियों को लूटने के लक्ष्य से ताहिर हुसैन के घर हथियारबंद भीड़ इकट्ठा हुई‚ पेट्रोल बम इकट्ठा किए गए।
भीड़ एक दूसरे को हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए उकसा रही थी। वैसे दोनों न्यायालयों ने जो भी टिप्पणियां कीं‚ वे निष्पक्ष रूस से सीएए‚ एनआरसी के शाहीनबाग सहित देशभर में हुए विरोध तथा दिल्ली दंगों पर नजर रखने वालों के लिए कतई आश्चर्य का विषय नहीं हैं। वास्तव में दंगों की प्रामाणिक सच्चाइयां शाहीनबाग के पूरे प्रदर्शन को आपराधिक साजिश साबित कर देती है। नागरिकता संशोधन कानून सामने आते ही पूरा माहौल हिंसक और उत्तेजक बना दिया गया और शाहीनबाग उसका साकार केंद्र था। उसी का विस्तार दिल्ली दंगा था जिसमें प्रत्यक्ष–परोक्ष उन सारे किरदारों की भूमिका थी जिन्होंने सीएए‚ एनआरसी के बारे में झूठ फैला कर शाहीन बाग को महिमामंडित किया और वहां सक्रिय रहे।
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली दंगा मामलों में उमर खालिद की जमानत याचिका रद्द किया जाना तथा ताहिर हुसैन पर सत्र न्यायालय की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं। खालिद का मामला गुणात्मक रूप से सामान्य जमानत न मिलने के मामले से अलग है। इसमें आरोपों पर लंबी बहस के बाद न्यायालय ने बिंदुवार टिप्पणियां की हैं‚ जिनका सार यही है कि खालिद पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं। ताहिर हुसैन को भी सत्र अदालत ने ऐसी ही टिप्पणियां की हैं।
आइए‚ पहले खालिद के मामले पर विचार करें। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने खालिद को दोषी ठहराने के लिए जो लिखा है उसके कुछ बिंदुओं का उल्लेख जरूरी है। एक‚ साजिश की शुरु आत से दंगा भड़काने तक अपीलकर्ता का नाम और भूमिका का जिक्र बार–बार मिलता है। दो‚ प्रदर्शन राजनीतिक‚ सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक रूप से सामान्य विरोध प्रदर्शन न होकर अधिक विनाशकारी और हानिकारक थे। तीन‚ यह अत्यंत गंभीर परिणामों के लिए तैयार किया गया था। चार‚ सड़कों को अवरु द्ध करने से उत्तर पूर्वी दिल्ली में रहने वालों को असुविधा हुई और वे दहशत व असुरक्षा से घिर गए। महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मियों पर हमला प्रथम दृष्टया आतंकवादी अधिनियम की परिभाषा से स्पष्ट होता है। पांच‚ सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकॉर्ड के विश्लेषण से एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में अपीलकर्ता की मौजूदगी और सक्रिय भागीदारी का संकेत मिलता है।
ध्यान रखिए‚ खालिद की ओर से दलील दी गई थी कि फरवरी‚ २०२० में उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा में उनकी भूमिका नहीं थी और न ही किसी आरोपी के साथ उनका आपराधिक संबंध है। न्यायालय ने सीडीआर की विस्तृत रिपोर्ट के मद्देनजर इस दलील को खारिज कर दिया। खालिद के वकील ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल ने नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए सहित वही मुद्दे उठाए थे जिन्हें लेकर पूरे देश में चर्चा चल रही थी और इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है। दिल्ली पुलिस ने २४ फरवरी‚ २०२० को अमरावती में खालिद के भाषण का उल्लेख करते हुए बताया था कि इसमें हिंसा भड़काने के तत्व थे। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि खालिद द्वारा फरवरी‚ २०२० में अमरावती में दिया गया भाषण नफरत भरा था‚ भड़काऊ था। जब खालिद के वकील ने न्यायालय में अमरावती भाषण को पढ़ा तो न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह आक्रामक है‚ बेहूदा है। क्या आपको नहीं लगता कि यह लोगों को उकसाता हैॽ जैसे खालिद ने कहा था कि आपके पूर्वज अंग्रेजों की दलाली कर रहे थे कि आपको नहीं लगता कि आपत्तिजनक हैॽ न्यायालय ने यह भी लिखा है कि इससे लगता है कि किसी समुदाय विशेष ने ही भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी।
खालिद‚ शरजील इमाम और खालिद सैफी को दिल्ली दंगों के मामलों में पुलिस ने जब से गिरफ्तार किया तभी से एक तबका‚ जो स्वयं को लिबरल कहता है‚ इनके पक्ष में अभियान चलाए हुए है। सच यह है कि सीएए‚ एनआरसी‚ दोनों को लेकर मुसलमानों में भय पैदा करने की साजिश देश और देश के बाहर भी हुई। सीएए‚ एनआरसी पर झूठ फैलाना‚ लोगों को भड़काना अपने आप में अपराध था। इन सबने ट्रंप की यात्रा के पूर्व ऐसा वातावरण बनाया था जिससे मुसलमान पुरुषों–्त्रिरयों‚ सब में गुस्सा भर गया था जिनमें काफी लोग हिंसा पर उतारू थे। तीनों अपने भाषणों में बाबरी मस्जिद या तीन तलाक का जिक्र करते तो यह इस्लाम से संबंधित होता। तीनों के भाषणों में समान पैटर्न मिलता है। कश्मीर आते ही यह राष्ट्रीय एकता का मुद्दा बन जाता। जामिया‚ जेएनयू से लेकर अन्य स्थानों से लोगों को भड़काने का काम किया गया। दंगों के षड्यंत्र को लेकर जैसे ही पहला मामला दर्ज हुआ सभी व्हाट्सएप ग्रुप डिलीट किए गए। पुलिस ने न्यायालय में मौजपुर‚ वजीराबाद रोड का नक्शा दिखाया और बताया कि ये पूरे इलाके को ब्लॉक करने के इरादे से इकट्ठे हुए थे। २०१९ और २०२० में हिंसा हुई और दोनों ही चरणों के हिंसा में शामिल लोग एक ही थे। पहले चरण की हिंसा की विफलता के बाद दूसरे चरण की हिंसा की तैयारी शुरू हुई लेकिन पैटर्न समान था। ४ दिसम्बर‚ २०१९ को केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून को स्वीकृति दी और अगले दिन व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया। इस ग्रुप में सरजील इमाम काफी एक्टिव था। स्टूडेंट्स ऑफ जामिया एसओजी की तरफ से पर्चे बांटे गए।
पुलिस के इन तर्कों को न्यायालय ने स्वीकार किया कि अफवाहों के आधार पर विरोध और सड़कों पर रणनीतिक रूप से हिंसा करने की तैयारी की गई थी तथा पुलिस और अर्धसैनिक बलों के बीच तनाव की स्थिति पैदा की गई। वास्तव में एक ओर पूरे देश में सीएए‚ एनआरसी को लेकर मुसलमानों को भड़काया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यही मुद्दा है‚ जिससे मोदी सरकार को अस्थिर करने के साथ दुनिया भर में बदनाम किया जा सकता है‚ वहीं कट्टरपंथी अपराधी तत्वों ने हिंसा को अंजाम दिया। आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप तय करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने कहा कि उनके घर पर इकट्ठा हथियारबंद भीड़ का मकसद हिंदुओं को निशाना बनाकर मारना और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना था। न्यायालय की टिप्पणी है कि हिंदुओं को मारने और उनकी संपत्तियों को लूटने के लक्ष्य से ताहिर हुसैन के घर हथियारबंद भीड़ इकट्ठा हुई‚ पेट्रोल बम इकट्ठा किए गए।
भीड़ एक दूसरे को हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए उकसा रही थी। वैसे दोनों न्यायालयों ने जो भी टिप्पणियां कीं‚ वे निष्पक्ष रूस से सीएए‚ एनआरसी के शाहीनबाग सहित देशभर में हुए विरोध तथा दिल्ली दंगों पर नजर रखने वालों के लिए कतई आश्चर्य का विषय नहीं हैं। वास्तव में दंगों की प्रामाणिक सच्चाइयां शाहीनबाग के पूरे प्रदर्शन को आपराधिक साजिश साबित कर देती है। नागरिकता संशोधन कानून सामने आते ही पूरा माहौल हिंसक और उत्तेजक बना दिया गया और शाहीनबाग उसका साकार केंद्र था। उसी का विस्तार दिल्ली दंगा था जिसमें प्रत्यक्ष–परोक्ष उन सारे किरदारों की भूमिका थी जिन्होंने सीएए‚ एनआरसी के बारे में झूठ फैला कर शाहीन बाग को महिमामंडित किया और वहां सक्रिय रहे।
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली दंगा मामलों में उमर खालिद की जमानत याचिका रद्द किया जाना तथा ताहिर हुसैन पर सत्र न्यायालय की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं। खालिद का मामला गुणात्मक रूप से सामान्य जमानत न मिलने के मामले से अलग है। इसमें आरोपों पर लंबी बहस के बाद न्यायालय ने बिंदुवार टिप्पणियां की हैं‚ जिनका सार यही है कि खालिद पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं। ताहिर हुसैन को भी सत्र अदालत ने ऐसी ही टिप्पणियां की हैं।
आइए‚ पहले खालिद के मामले पर विचार करें। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने खालिद को दोषी ठहराने के लिए जो लिखा है उसके कुछ बिंदुओं का उल्लेख जरूरी है। एक‚ साजिश की शुरु आत से दंगा भड़काने तक अपीलकर्ता का नाम और भूमिका का जिक्र बार–बार मिलता है। दो‚ प्रदर्शन राजनीतिक‚ सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक रूप से सामान्य विरोध प्रदर्शन न होकर अधिक विनाशकारी और हानिकारक थे। तीन‚ यह अत्यंत गंभीर परिणामों के लिए तैयार किया गया था। चार‚ सड़कों को अवरु द्ध करने से उत्तर पूर्वी दिल्ली में रहने वालों को असुविधा हुई और वे दहशत व असुरक्षा से घिर गए। महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मियों पर हमला प्रथम दृष्टया आतंकवादी अधिनियम की परिभाषा से स्पष्ट होता है। पांच‚ सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकॉर्ड के विश्लेषण से एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में अपीलकर्ता की मौजूदगी और सक्रिय भागीदारी का संकेत मिलता है।
ध्यान रखिए‚ खालिद की ओर से दलील दी गई थी कि फरवरी‚ २०२० में उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा में उनकी भूमिका नहीं थी और न ही किसी आरोपी के साथ उनका आपराधिक संबंध है। न्यायालय ने सीडीआर की विस्तृत रिपोर्ट के मद्देनजर इस दलील को खारिज कर दिया। खालिद के वकील ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल ने नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए सहित वही मुद्दे उठाए थे जिन्हें लेकर पूरे देश में चर्चा चल रही थी और इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है। दिल्ली पुलिस ने २४ फरवरी‚ २०२० को अमरावती में खालिद के भाषण का उल्लेख करते हुए बताया था कि इसमें हिंसा भड़काने के तत्व थे। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि खालिद द्वारा फरवरी‚ २०२० में अमरावती में दिया गया भाषण नफरत भरा था‚ भड़काऊ था। जब खालिद के वकील ने न्यायालय में अमरावती भाषण को पढ़ा तो न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह आक्रामक है‚ बेहूदा है। क्या आपको नहीं लगता कि यह लोगों को उकसाता हैॽ जैसे खालिद ने कहा था कि आपके पूर्वज अंग्रेजों की दलाली कर रहे थे कि आपको नहीं लगता कि आपत्तिजनक हैॽ न्यायालय ने यह भी लिखा है कि इससे लगता है कि किसी समुदाय विशेष ने ही भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी।
खालिद‚ शरजील इमाम और खालिद सैफी को दिल्ली दंगों के मामलों में पुलिस ने जब से गिरफ्तार किया तभी से एक तबका‚ जो स्वयं को लिबरल कहता है‚ इनके पक्ष में अभियान चलाए हुए है। सच यह है कि सीएए‚ एनआरसी‚ दोनों को लेकर मुसलमानों में भय पैदा करने की साजिश देश और देश के बाहर भी हुई। सीएए‚ एनआरसी पर झूठ फैलाना‚ लोगों को भड़काना अपने आप में अपराध था। इन सबने ट्रंप की यात्रा के पूर्व ऐसा वातावरण बनाया था जिससे मुसलमान पुरुषों–्त्रिरयों‚ सब में गुस्सा भर गया था जिनमें काफी लोग हिंसा पर उतारू थे। तीनों अपने भाषणों में बाबरी मस्जिद या तीन तलाक का जिक्र करते तो यह इस्लाम से संबंधित होता। तीनों के भाषणों में समान पैटर्न मिलता है। कश्मीर आते ही यह राष्ट्रीय एकता का मुद्दा बन जाता। जामिया‚ जेएनयू से लेकर अन्य स्थानों से लोगों को भड़काने का काम किया गया। दंगों के षड्यंत्र को लेकर जैसे ही पहला मामला दर्ज हुआ सभी व्हाट्सएप ग्रुप डिलीट किए गए। पुलिस ने न्यायालय में मौजपुर‚ वजीराबाद रोड का नक्शा दिखाया और बताया कि ये पूरे इलाके को ब्लॉक करने के इरादे से इकट्ठे हुए थे। २०१९ और २०२० में हिंसा हुई और दोनों ही चरणों के हिंसा में शामिल लोग एक ही थे। पहले चरण की हिंसा की विफलता के बाद दूसरे चरण की हिंसा की तैयारी शुरू हुई लेकिन पैटर्न समान था। ४ दिसम्बर‚ २०१९ को केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून को स्वीकृति दी और अगले दिन व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया। इस ग्रुप में सरजील इमाम काफी एक्टिव था। स्टूडेंट्स ऑफ जामिया एसओजी की तरफ से पर्चे बांटे गए।
पुलिस के इन तर्कों को न्यायालय ने स्वीकार किया कि अफवाहों के आधार पर विरोध और सड़कों पर रणनीतिक रूप से हिंसा करने की तैयारी की गई थी तथा पुलिस और अर्धसैनिक बलों के बीच तनाव की स्थिति पैदा की गई। वास्तव में एक ओर पूरे देश में सीएए‚ एनआरसी को लेकर मुसलमानों को भड़काया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यही मुद्दा है‚ जिससे मोदी सरकार को अस्थिर करने के साथ दुनिया भर में बदनाम किया जा सकता है‚ वहीं कट्टरपंथी अपराधी तत्वों ने हिंसा को अंजाम दिया। आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप तय करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने कहा कि उनके घर पर इकट्ठा हथियारबंद भीड़ का मकसद हिंदुओं को निशाना बनाकर मारना और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना था। न्यायालय की टिप्पणी है कि हिंदुओं को मारने और उनकी संपत्तियों को लूटने के लक्ष्य से ताहिर हुसैन के घर हथियारबंद भीड़ इकट्ठा हुई‚ पेट्रोल बम इकट्ठा किए गए।
भीड़ एक दूसरे को हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए उकसा रही थी। वैसे दोनों न्यायालयों ने जो भी टिप्पणियां कीं‚ वे निष्पक्ष रूस से सीएए‚ एनआरसी के शाहीनबाग सहित देशभर में हुए विरोध तथा दिल्ली दंगों पर नजर रखने वालों के लिए कतई आश्चर्य का विषय नहीं हैं। वास्तव में दंगों की प्रामाणिक सच्चाइयां शाहीनबाग के पूरे प्रदर्शन को आपराधिक साजिश साबित कर देती है। नागरिकता संशोधन कानून सामने आते ही पूरा माहौल हिंसक और उत्तेजक बना दिया गया और शाहीनबाग उसका साकार केंद्र था। उसी का विस्तार दिल्ली दंगा था जिसमें प्रत्यक्ष–परोक्ष उन सारे किरदारों की भूमिका थी जिन्होंने सीएए‚ एनआरसी के बारे में झूठ फैला कर शाहीन बाग को महिमामंडित किया और वहां सक्रिय रहे।
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली दंगा मामलों में उमर खालिद की जमानत याचिका रद्द किया जाना तथा ताहिर हुसैन पर सत्र न्यायालय की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं। खालिद का मामला गुणात्मक रूप से सामान्य जमानत न मिलने के मामले से अलग है। इसमें आरोपों पर लंबी बहस के बाद न्यायालय ने बिंदुवार टिप्पणियां की हैं‚ जिनका सार यही है कि खालिद पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं। ताहिर हुसैन को भी सत्र अदालत ने ऐसी ही टिप्पणियां की हैं।
आइए‚ पहले खालिद के मामले पर विचार करें। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने खालिद को दोषी ठहराने के लिए जो लिखा है उसके कुछ बिंदुओं का उल्लेख जरूरी है। एक‚ साजिश की शुरु आत से दंगा भड़काने तक अपीलकर्ता का नाम और भूमिका का जिक्र बार–बार मिलता है। दो‚ प्रदर्शन राजनीतिक‚ सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक रूप से सामान्य विरोध प्रदर्शन न होकर अधिक विनाशकारी और हानिकारक थे। तीन‚ यह अत्यंत गंभीर परिणामों के लिए तैयार किया गया था। चार‚ सड़कों को अवरु द्ध करने से उत्तर पूर्वी दिल्ली में रहने वालों को असुविधा हुई और वे दहशत व असुरक्षा से घिर गए। महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मियों पर हमला प्रथम दृष्टया आतंकवादी अधिनियम की परिभाषा से स्पष्ट होता है। पांच‚ सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकॉर्ड के विश्लेषण से एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में अपीलकर्ता की मौजूदगी और सक्रिय भागीदारी का संकेत मिलता है।
ध्यान रखिए‚ खालिद की ओर से दलील दी गई थी कि फरवरी‚ २०२० में उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा में उनकी भूमिका नहीं थी और न ही किसी आरोपी के साथ उनका आपराधिक संबंध है। न्यायालय ने सीडीआर की विस्तृत रिपोर्ट के मद्देनजर इस दलील को खारिज कर दिया। खालिद के वकील ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल ने नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए सहित वही मुद्दे उठाए थे जिन्हें लेकर पूरे देश में चर्चा चल रही थी और इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है। दिल्ली पुलिस ने २४ फरवरी‚ २०२० को अमरावती में खालिद के भाषण का उल्लेख करते हुए बताया था कि इसमें हिंसा भड़काने के तत्व थे। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि खालिद द्वारा फरवरी‚ २०२० में अमरावती में दिया गया भाषण नफरत भरा था‚ भड़काऊ था। जब खालिद के वकील ने न्यायालय में अमरावती भाषण को पढ़ा तो न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह आक्रामक है‚ बेहूदा है। क्या आपको नहीं लगता कि यह लोगों को उकसाता हैॽ जैसे खालिद ने कहा था कि आपके पूर्वज अंग्रेजों की दलाली कर रहे थे कि आपको नहीं लगता कि आपत्तिजनक हैॽ न्यायालय ने यह भी लिखा है कि इससे लगता है कि किसी समुदाय विशेष ने ही भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी।
खालिद‚ शरजील इमाम और खालिद सैफी को दिल्ली दंगों के मामलों में पुलिस ने जब से गिरफ्तार किया तभी से एक तबका‚ जो स्वयं को लिबरल कहता है‚ इनके पक्ष में अभियान चलाए हुए है। सच यह है कि सीएए‚ एनआरसी‚ दोनों को लेकर मुसलमानों में भय पैदा करने की साजिश देश और देश के बाहर भी हुई। सीएए‚ एनआरसी पर झूठ फैलाना‚ लोगों को भड़काना अपने आप में अपराध था। इन सबने ट्रंप की यात्रा के पूर्व ऐसा वातावरण बनाया था जिससे मुसलमान पुरुषों–्त्रिरयों‚ सब में गुस्सा भर गया था जिनमें काफी लोग हिंसा पर उतारू थे। तीनों अपने भाषणों में बाबरी मस्जिद या तीन तलाक का जिक्र करते तो यह इस्लाम से संबंधित होता। तीनों के भाषणों में समान पैटर्न मिलता है। कश्मीर आते ही यह राष्ट्रीय एकता का मुद्दा बन जाता। जामिया‚ जेएनयू से लेकर अन्य स्थानों से लोगों को भड़काने का काम किया गया। दंगों के षड्यंत्र को लेकर जैसे ही पहला मामला दर्ज हुआ सभी व्हाट्सएप ग्रुप डिलीट किए गए। पुलिस ने न्यायालय में मौजपुर‚ वजीराबाद रोड का नक्शा दिखाया और बताया कि ये पूरे इलाके को ब्लॉक करने के इरादे से इकट्ठे हुए थे। २०१९ और २०२० में हिंसा हुई और दोनों ही चरणों के हिंसा में शामिल लोग एक ही थे। पहले चरण की हिंसा की विफलता के बाद दूसरे चरण की हिंसा की तैयारी शुरू हुई लेकिन पैटर्न समान था। ४ दिसम्बर‚ २०१९ को केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून को स्वीकृति दी और अगले दिन व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया। इस ग्रुप में सरजील इमाम काफी एक्टिव था। स्टूडेंट्स ऑफ जामिया एसओजी की तरफ से पर्चे बांटे गए।
पुलिस के इन तर्कों को न्यायालय ने स्वीकार किया कि अफवाहों के आधार पर विरोध और सड़कों पर रणनीतिक रूप से हिंसा करने की तैयारी की गई थी तथा पुलिस और अर्धसैनिक बलों के बीच तनाव की स्थिति पैदा की गई। वास्तव में एक ओर पूरे देश में सीएए‚ एनआरसी को लेकर मुसलमानों को भड़काया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यही मुद्दा है‚ जिससे मोदी सरकार को अस्थिर करने के साथ दुनिया भर में बदनाम किया जा सकता है‚ वहीं कट्टरपंथी अपराधी तत्वों ने हिंसा को अंजाम दिया। आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप तय करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने कहा कि उनके घर पर इकट्ठा हथियारबंद भीड़ का मकसद हिंदुओं को निशाना बनाकर मारना और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना था। न्यायालय की टिप्पणी है कि हिंदुओं को मारने और उनकी संपत्तियों को लूटने के लक्ष्य से ताहिर हुसैन के घर हथियारबंद भीड़ इकट्ठा हुई‚ पेट्रोल बम इकट्ठा किए गए।
भीड़ एक दूसरे को हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए उकसा रही थी। वैसे दोनों न्यायालयों ने जो भी टिप्पणियां कीं‚ वे निष्पक्ष रूस से सीएए‚ एनआरसी के शाहीनबाग सहित देशभर में हुए विरोध तथा दिल्ली दंगों पर नजर रखने वालों के लिए कतई आश्चर्य का विषय नहीं हैं। वास्तव में दंगों की प्रामाणिक सच्चाइयां शाहीनबाग के पूरे प्रदर्शन को आपराधिक साजिश साबित कर देती है। नागरिकता संशोधन कानून सामने आते ही पूरा माहौल हिंसक और उत्तेजक बना दिया गया और शाहीनबाग उसका साकार केंद्र था। उसी का विस्तार दिल्ली दंगा था जिसमें प्रत्यक्ष–परोक्ष उन सारे किरदारों की भूमिका थी जिन्होंने सीएए‚ एनआरसी के बारे में झूठ फैला कर शाहीन बाग को महिमामंडित किया और वहां सक्रिय रहे।
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली दंगा मामलों में उमर खालिद की जमानत याचिका रद्द किया जाना तथा ताहिर हुसैन पर सत्र न्यायालय की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं। खालिद का मामला गुणात्मक रूप से सामान्य जमानत न मिलने के मामले से अलग है। इसमें आरोपों पर लंबी बहस के बाद न्यायालय ने बिंदुवार टिप्पणियां की हैं‚ जिनका सार यही है कि खालिद पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं। ताहिर हुसैन को भी सत्र अदालत ने ऐसी ही टिप्पणियां की हैं।
आइए‚ पहले खालिद के मामले पर विचार करें। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने खालिद को दोषी ठहराने के लिए जो लिखा है उसके कुछ बिंदुओं का उल्लेख जरूरी है। एक‚ साजिश की शुरु आत से दंगा भड़काने तक अपीलकर्ता का नाम और भूमिका का जिक्र बार–बार मिलता है। दो‚ प्रदर्शन राजनीतिक‚ सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक रूप से सामान्य विरोध प्रदर्शन न होकर अधिक विनाशकारी और हानिकारक थे। तीन‚ यह अत्यंत गंभीर परिणामों के लिए तैयार किया गया था। चार‚ सड़कों को अवरु द्ध करने से उत्तर पूर्वी दिल्ली में रहने वालों को असुविधा हुई और वे दहशत व असुरक्षा से घिर गए। महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मियों पर हमला प्रथम दृष्टया आतंकवादी अधिनियम की परिभाषा से स्पष्ट होता है। पांच‚ सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकॉर्ड के विश्लेषण से एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में अपीलकर्ता की मौजूदगी और सक्रिय भागीदारी का संकेत मिलता है।
ध्यान रखिए‚ खालिद की ओर से दलील दी गई थी कि फरवरी‚ २०२० में उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा में उनकी भूमिका नहीं थी और न ही किसी आरोपी के साथ उनका आपराधिक संबंध है। न्यायालय ने सीडीआर की विस्तृत रिपोर्ट के मद्देनजर इस दलील को खारिज कर दिया। खालिद के वकील ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल ने नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए सहित वही मुद्दे उठाए थे जिन्हें लेकर पूरे देश में चर्चा चल रही थी और इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है। दिल्ली पुलिस ने २४ फरवरी‚ २०२० को अमरावती में खालिद के भाषण का उल्लेख करते हुए बताया था कि इसमें हिंसा भड़काने के तत्व थे। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि खालिद द्वारा फरवरी‚ २०२० में अमरावती में दिया गया भाषण नफरत भरा था‚ भड़काऊ था। जब खालिद के वकील ने न्यायालय में अमरावती भाषण को पढ़ा तो न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह आक्रामक है‚ बेहूदा है। क्या आपको नहीं लगता कि यह लोगों को उकसाता हैॽ जैसे खालिद ने कहा था कि आपके पूर्वज अंग्रेजों की दलाली कर रहे थे कि आपको नहीं लगता कि आपत्तिजनक हैॽ न्यायालय ने यह भी लिखा है कि इससे लगता है कि किसी समुदाय विशेष ने ही भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी।
खालिद‚ शरजील इमाम और खालिद सैफी को दिल्ली दंगों के मामलों में पुलिस ने जब से गिरफ्तार किया तभी से एक तबका‚ जो स्वयं को लिबरल कहता है‚ इनके पक्ष में अभियान चलाए हुए है। सच यह है कि सीएए‚ एनआरसी‚ दोनों को लेकर मुसलमानों में भय पैदा करने की साजिश देश और देश के बाहर भी हुई। सीएए‚ एनआरसी पर झूठ फैलाना‚ लोगों को भड़काना अपने आप में अपराध था। इन सबने ट्रंप की यात्रा के पूर्व ऐसा वातावरण बनाया था जिससे मुसलमान पुरुषों–्त्रिरयों‚ सब में गुस्सा भर गया था जिनमें काफी लोग हिंसा पर उतारू थे। तीनों अपने भाषणों में बाबरी मस्जिद या तीन तलाक का जिक्र करते तो यह इस्लाम से संबंधित होता। तीनों के भाषणों में समान पैटर्न मिलता है। कश्मीर आते ही यह राष्ट्रीय एकता का मुद्दा बन जाता। जामिया‚ जेएनयू से लेकर अन्य स्थानों से लोगों को भड़काने का काम किया गया। दंगों के षड्यंत्र को लेकर जैसे ही पहला मामला दर्ज हुआ सभी व्हाट्सएप ग्रुप डिलीट किए गए। पुलिस ने न्यायालय में मौजपुर‚ वजीराबाद रोड का नक्शा दिखाया और बताया कि ये पूरे इलाके को ब्लॉक करने के इरादे से इकट्ठे हुए थे। २०१९ और २०२० में हिंसा हुई और दोनों ही चरणों के हिंसा में शामिल लोग एक ही थे। पहले चरण की हिंसा की विफलता के बाद दूसरे चरण की हिंसा की तैयारी शुरू हुई लेकिन पैटर्न समान था। ४ दिसम्बर‚ २०१९ को केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून को स्वीकृति दी और अगले दिन व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया। इस ग्रुप में सरजील इमाम काफी एक्टिव था। स्टूडेंट्स ऑफ जामिया एसओजी की तरफ से पर्चे बांटे गए।
पुलिस के इन तर्कों को न्यायालय ने स्वीकार किया कि अफवाहों के आधार पर विरोध और सड़कों पर रणनीतिक रूप से हिंसा करने की तैयारी की गई थी तथा पुलिस और अर्धसैनिक बलों के बीच तनाव की स्थिति पैदा की गई। वास्तव में एक ओर पूरे देश में सीएए‚ एनआरसी को लेकर मुसलमानों को भड़काया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यही मुद्दा है‚ जिससे मोदी सरकार को अस्थिर करने के साथ दुनिया भर में बदनाम किया जा सकता है‚ वहीं कट्टरपंथी अपराधी तत्वों ने हिंसा को अंजाम दिया। आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप तय करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने कहा कि उनके घर पर इकट्ठा हथियारबंद भीड़ का मकसद हिंदुओं को निशाना बनाकर मारना और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना था। न्यायालय की टिप्पणी है कि हिंदुओं को मारने और उनकी संपत्तियों को लूटने के लक्ष्य से ताहिर हुसैन के घर हथियारबंद भीड़ इकट्ठा हुई‚ पेट्रोल बम इकट्ठा किए गए।
भीड़ एक दूसरे को हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए उकसा रही थी। वैसे दोनों न्यायालयों ने जो भी टिप्पणियां कीं‚ वे निष्पक्ष रूस से सीएए‚ एनआरसी के शाहीनबाग सहित देशभर में हुए विरोध तथा दिल्ली दंगों पर नजर रखने वालों के लिए कतई आश्चर्य का विषय नहीं हैं। वास्तव में दंगों की प्रामाणिक सच्चाइयां शाहीनबाग के पूरे प्रदर्शन को आपराधिक साजिश साबित कर देती है। नागरिकता संशोधन कानून सामने आते ही पूरा माहौल हिंसक और उत्तेजक बना दिया गया और शाहीनबाग उसका साकार केंद्र था। उसी का विस्तार दिल्ली दंगा था जिसमें प्रत्यक्ष–परोक्ष उन सारे किरदारों की भूमिका थी जिन्होंने सीएए‚ एनआरसी के बारे में झूठ फैला कर शाहीन बाग को महिमामंडित किया और वहां सक्रिय रहे।




