नाकारात्मक समाचारों के उमड़़ते समंदर के बीच से जब कोई मानवीय करुणा और उदात्तता का कोई समाचार सामने आ जाता है तो मनुष्य की मानवीयता से डि़गती आस्था पुनः स्थापित होने लगती है। पांच बहनों का सबसे छोटा भाई १६ महीने का रिशांत के सिर में गिरने से गंभीर चोट लग गई। उसके पिता उपिंदर जो पेशे से निजी ठेकेदार हैं‚ बच्चे को निकट के एक निजी अस्पताल लेकर गए। जब यह अस्पताल उसके उपचार में असमर्थ दिखा तो इस बच्चे को दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर में रेफर कर दिया गया। डॉक्टरों के भरसक प्रयास के बावजूद बच्चे को बचाया नहीं जा सका और अंततः उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। घर के सबसे चहेते बच्चे का निधन मां–बाप के लिए एक भयावह आघात की तरह होता है‚ जिससे बाहर निकालना आसान नहीं होता। ऐसे क्षण व्यक्ति को कोई भी अन्यथा निर्णय नहीं लेने देते सिवाय इसके कि बच्चे का पारंपरिक तौर पर अंतिम संस्कार कर दिया जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रिशांत के पिता उपिंदर ने इन क्षणों में भी वह निर्णय लिया जो कि गहन मानवीय तो था ही‚ अन्य बच्चों को जीवन दान देने वाला भी था। उपिंदर ने बच्चे का अंगदान कर दिया‚ जिससे अन्य पीडि़त बच्चों को उसके अंग मिल सके और वे जीवन की पुनप्र्राप्ति कर सकें। रिशांत की दोनों किडनी को एम्स में ही दिल्ली में इलाज करा रहे ५ वर्षीय बच्चे में प्रत्यारोपित किया गया‚ जबकि उसके लीवर को मैक्स अस्पताल में उपचार करा रही छह महीने की बच्ची में प्रत्यारोपित किया गया। रिशांत के दिल के वॉल्व और कोर्निया को एम्स के बैंक में सुरक्षित रखा गया है। एम्स‚ नई दिल्ली के मुताबिक रिशांत सबसे कम उम्र का अंग दानकर्ता है। इससे पहले नोएड़ा की ६ साल की बच्ची रोली प्रजापति का अंगदान किया गया था। भावनात्मक दृष्टि से एक पिता के लिए ऐसा निर्णय करना कठिन होता है‚ लेकिन रिशांत के पिता ने व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर अपनी मानवीय करु णा को सामाजिक बना दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने नन्हें बच्चों की मृत्यु को दूसरों के लिए जीवन बना दिया। उस नन्हें बच्चे को श्रद्धांजलि‚ उसके पिता के प्रति गहरी सहानुभूति जिन्होंने अन्य के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया।
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