विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और उच्च शिक्षण संस्थान जल्द ही एक नई श्रेणी के तहत शिक्षक संकाय के रूप में प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की नियुक्ति कर सकेंगे। इसके लिए औपचारिक पात्रता और प्रकाशन संबंधी अर्हताएं अनिवार्य नहीं होंगी। यूजीसी की गत सप्ताह हुई ५६०वीं बैठक में यह निर्णय लिया गया। इसके तहत अगले महीने प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस (पेशेवर प्रोफेसर) योजना को अधिसूचित किया जा सकता है। योजना के मसौदा के मुताबिक‚ इंजीनियरिंग‚ विज्ञान‚ मीडि़या‚ साहित्य‚ उद्यमिता‚ सामाजिक विज्ञान‚ ललित कला‚ लोक सेवा‚ सशस्र बल आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस श्रेणी के तहत नियुक्त के लिए पात्र होंगे। मसौदे के मुताबिक‚ ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ के तहत वे लोग पात्र होंगे जिन्होंने विशिष्ट पेशों में विशेषज्ञता साबित की हो या जिनका सेवा या पेशेवर अनुभव १५ वर्ष से ज्यादा हो। ऐसे लोगों के लिए औपचारिक अकादमिक पात्रता अनिवार्य नहीं होगी। इन विशेषज्ञों को प्रोफेसर स्तर पर नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रकाशन और पात्रता संबंधी अन्य दिशा–निर्देशों से भी छूट होगी। यूजीसी ने यह भी निर्णय लिया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की संख्या मंजूर पदों के १० फीसद से अधिक नहीं होगी। योजना के तहत पूरा ध्यान कुशलता पर केंद्रित है। दरअसल‚ हाल के वर्षों में शिक्षा क्षेत्र में बदलाव के मद्देनजर सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं। देश में पढ़ाई के लिए विदेशी छात्रों का रुझान बढ़ाने के लिए २०१८ में स्टड़ी इन इंडि़या प्रोग्राम की शुरुआत की गई। इसके लिए १५० करोड़़ रुपये का बजट भी मंजूर किया गया था। दो साल बाद नई शिक्षा नीति घोषित की गई। जरूरी है कि उच्च शिक्षा के लिए विदेशी छात्रों के बढ़ते रुझान का फायदा उठाए जाए। हम अपने विश्वविद्यालयों को ब्रांड़ के रूप में उभारें तो इस दिशा में काफी सफल हो सकते हैं। शिक्षण में व्यावहारिकता का पुट होना जरूरी है। यूजीसी ने इस बाबत देश के विश्वविद्यालयों को सुझाव भी दिएहैं कि कैसे वे शिक्षण–पाठ¬क्रम को बाजार की जरूरतों के मुताबिक तैयार कर सकते हैं। शोध और नवोन्मेषन ऐसे हों कि उच्च शिक्षण बाजार की मांग पूरी कर सके। जरूरी नहीं कि विशुद्ध अकादमिक व्यक्ति कार्य निस्तारण में भी पर्याप्त कुशल हो। बेशक‚ इस नये प्रयोग के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
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