पटना में नौकरी के लिए सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों पर पुलिस लाठीचार्ज राज्य सरकार के लिए निहायत ही शर्मनाक वाकया है। तकलीफ ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि अतिरिक्त जिला अधिकारी (एड़ीएम–कानून–व्यवस्था) ने खुद एक प्रदर्शनकारियों को पीटा‚ जबकि उस प्रदर्शनकारी के हाथ में राष्ट्रीय ध्वज था। हालांकि उप मुख्यमंत्री ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं‚ मगर यह वाकई शर्मसार करने वाली घटना है। नई सरकार के लिए शिक्षकों की मांगों को सुने बिना ऐसी कार्रवाई से निश्चित रूप से शिक्षक बनने की उम्मीद लगाए प्रतिभागियों का भरोसा टूटेगा। प्रदर्शनकारी पिछले तीन साल से सरकार के आश्वासन के सहारे समय बिता रहे हैं। उनकी हर इक मांग पर सरकार का रवैया बेहद चलताऊ किस्म का रहा है। नीतीश कुमार पिछले १५ वर्षों से शासन की बागड़ोर संभाले हुए हैं। यहां तक कि शिक्षा महकमा भी उन्हीं की पार्टी जनता दल (यू) के कोटे में है‚ फिर भी शिक्षक भर्ती में तमाम गड़़बडि़़यां और लेटलतीफी है। कई अभ्यर्थी नौकरी के लिए जरूरी उम्र को पार करने के मुहाने पर हैं तो किसी को नियुक्ति पत्र नहीं मिला है। इन सब अनियमितताओं के कारण शिक्षक अभ्यर्थियों में सरकार के खिलाफ गुस्ता और तकलीफ दोनों है। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि जो सरकार १० लाख नौकरियां देने और २० लाख लोगों को रोजगार देने का वादा करती है‚ वह वर्षों से अभ्यर्थियों आश्वासन का लालीपॉप दे रही है। ठीक है कि सरकार के स्तर पर राज्य में उथल–पुथल मची हुई है‚ मगर सीटीईटी व टीईटी परीक्षा पास करके अपनी नौकरी के इंतजार में एक–एक रोज गिनने वाले शिक्षक अभ्यर्थियों का कोई पुरसाहाल नहीं है। शायद अपनी नाकामियों पर पर्दा ड़ालने के लिए सरकार प्रशासन को बर्बर होने का अघोषित लाइसेंस दे देती है। नीतीश के शासन में शिक्षकों पर लाठीचार्ज की यह कोई पहली घटना नहीं है। जिस नीतीश मॉड़ल की चर्चा देश–दुनिया में होती रही है‚ उसके शासनकाल में नौकरी की मांग करने वालों को पीटकर अधमरा करने का ‘मॉड़ल’ सर्व समावेशी तो कतई नहीं है। सरकार में अगर थोड़़ी सी भी ईमानदारी और नैतिकता बची है तो वह जल्द–से–जल्द उन खाली पदों पर भर्ती प्रक्रिया को सुचारू करे। हां‚ अपने ओहदे की गरिमा को नहीं समझने वाले एड़ीएम के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई जरूरी है।
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