प्रजातांत्रिक व्यवस्था जन की निर्मती है। समानता‚ शुचिता और समावेशिता सुनिश्चित करना इसका नैतिक धर्म। आधी आबादी की गरिमामयी भागीदारी इस जनतांत्रिक व्यवस्था को उध्र्वाकार बनाती है। समानता का भावबोध इसके मूल्यों को संवर्धित और संपुष्ट करता है‚ लेकिन क्या महिलाओं के वाजिब प्रतिनिधित्व के बिना इसकी अर्थवत्ता और प्रभावकारिता को विकास के संतुलित पैमाने पर तौला जा सकता है। अभी हाल में ही दो बड़े राज्य सियासी उथल–पुथल के दौर से गुजरे हैं। राज्य में विधायी उठापटक के बाद सियासी संतुलन साधने की कोशिशें लगातार जारी है। महाराष्ट्र में तो मंत्रिमंडलीय गठन को लेकर अब भी उहापोह की स्थिति बनी हुई है। वहीं बिहार जैसा बड़ा सूबा खेमेबाजी और मंत्री पद के बंटवारे की जद्दोजहद में उलझा है‚ लेकिन इन सबके बीच एक तबका ऐसा है जिसे सबसे ज्यादा बेरुखी और बेपरवाही झेलनी पड़ी है वो है महिलाएं।
बात मंत्रिमंडलीय गठन की हो या ओहदेदार पदों की हर जगह महिलाएं सिकड़ रहीं हैं। गोया वैधानिक अक्षुणन्ता बनाए रखने के लिए उनकी नाममात्र की मौजूदगी दर्ज कर ली गई है। मंत्री जैसे जिम्मेदारी के पद पर महिलाओं की लगभग शून्य उपस्थिति निराशा पैदा करती है। महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद एक भी महिला विधायक को मंत्री पद से महरूम रखना‚ दल और नेता विशेष की सोच को परिलक्षित करता है। बिहार में चूंकि अभी मंत्रिमंड़ल गठन की माथापच्ची चल रही है‚ इस नाते वहां क्या कुछ होगा‚ यह देखना शेष है। वैसे‚ अपेक्षा है कि महिलाओं की समानता और सबलता की पैरोकारी करने वाले नीतीश कुमार महिलाओं को अपने कैबिनेट में शामिल करने की बात सशक्तता से उठाएंगे। स्थिति कमोबेश दोनों ओर एक जैसी है। उंगलियों पर गिनी जाने वाली कुछ महिला जनप्रतिनिधियों को छोड़ दें तो मंत्रिमंडल का ये आंकडा बीस को भी पार नहीं करता। येन–केन–प्रकारेण मंत्रिमंडल में जगह बना ली भी गई तो उनकी मूक भागीदारी उदासी पैदा करती है। तयशुदा खांचों में फिट इन महिला जनप्रतिनिधियों की स्थिति जीवंत शिलाखंडों की मांनिंद है। स्तिथिजन्य पाबंदियां उन्हें गहरे जकड़े हुई है। हालांकि कुछेक मंत्री पदों के साथ सत्ता के इस समीकरण को साधने की कोशिश तो जरूर की गई पर कैबिनेट के महत्वपूर्ण पदों के बंद पड़े दरवाजे सारी हकीकत बयां करते हैं। हैरानी है कि २१वीं सदी के उत्तरार्ध में भी महिलाएं जनतंत्र प्रणाली के नेपथ्य में हैं। संतुलित शक्तियों की धूरी बनने की उनकी चाह अब भी संघर्ष के रास्ते धूल फांक रही है। क्या यह निंदनीय नहीं की सत्ता के चौसर पर उनका वजूद‚ उनकी नेतृत्व क्षमता अब भी एक प्यादे की मानिंद है। आंकड़ों बताते हैं कि किसी भी विधानसभा और लोक सभा में चुनी हुई महिलाओं जनप्रतिनिधियों की संख्या १५ प्रतिशत से अधिक नहीं रही है। मतलब साफ है कि महिलाओं को उनके प्रजातांत्रिक अधिकार और प्रतिनिधित्व के अधिकार से जानबूझकर दूर रखा जा रहा है। पार्टियों में अभी भी उनकी दावेदारी प्रबल नहीं दिखती। देश की संसदीय कार्यप्रणाली में समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने और उन्हें समान अवसर देने की बात बार बार दोहराई गई है। नेपथ्य में धकेलने की बजाय यदि उन्हें अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया जाए तो राष्ट्र की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल सकती है। अगर समय रहते चेत जाएं तो जनवादी प्रणालियां स्वस्थ्य और चिरायु होंगी साथ ही एक बदलते गौरवान्वित राष्ट्र की छवि भी पुख्ता होगी।






