आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड़्ढा’ भी डूब गई। उसकी पहले दिन की कमाई कुल बारह करोड रही जो आमिर की ही पिछले दिनों आई ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’ से बेहद कमतर है। यह सोशल मीडिया में चले ‘बॉयकाट अभियान’ का असर रहा। ऐसा नहीं कि आमिर ने ‘बायकाटियों’ को मनाना नहीं चाहा। उन्होंने आठ बरस पहले के अपने कथन कि ‘मेरी पत्नी यहां अपने को असुरक्षित महसूस करती है’ पर अफसोस जाहिर किया और लोगों से ‘लाल सिंह चड़्ढा’ को देखने की अपील की। इतना ही नहीं मीडिया में लाल सिंह चड़्ढा के प्रोमो और विज्ञापन में 19 करोड़़ भी खर्च किए गए। बडे–बडे सेलीब्रिटीज ने उसकी तारीफ की और लोगों से देखने का आग्रह किया लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। अगले रोज फिल्म की कमाई में चालीस फीसदी गिरावट भी देखी गई। यह सभी के लिए अचरज की बात रही।
इसीलिए टीवी के कई चैनलों में ‘लाल सिंह चड्ढा’ के ‘पिटने’ पर चरचाएं रहीं। यों आमिर को बॉलीवुड का ‘मास्टर ऑफ परफेक्शन’ कहा जाता है। वे जो भी फिल्म बनाते हैं‚ उसके लिए बेहतरीन कहानी खोजते हैं। बनने के बाद फिल्म को चुने दर्शकों को दिखाकर सर्वे कराते हैं कि लोगों को क्या पसंद है‚ क्या नहीं। फिर नापसंद हिस्सों को बदलते हैं। फिर खुद ही उसके हीरो के मेकअप में आकर विज्ञापन करके उसका ‘अप्रत्यक्ष प्रोमो’ करते हैं। तब रिलीज करते हैं। लेकिन इस बार उनका एक भी उपाय न चला। आठ बरस पहले कहा गया उनका वही वाक्य कि ‘मेरी पत्नी को यहां रहने में डर लगता है’ फिल्म को ले डूबा। लाल सिंह चड़्ढा के फ्लॉप होने के मीडिया में जो कारण गिनाए गए उनमें सबसे बडा कारण यही ‘विवादित बयान’ और उसके फलस्वरूप बॉयकाट का आह्वान माना गया। यह फिल्म सपाट और बोर है। यह भी कई रिव्यूअर्स ने बताया है। उसे पांच में से कुल डेढ सितारे मिले हैं। कारण यह कि हॉलीवुड की इनामी फिल्म ‘फॉरेस्ट गंप’ की सतही ‘रिमेक’ है। यों अक्षय कुमार ‘रक्षाबंधन’ को भी दर्शक नहीं मिले क्योंकि वह सन साठ के जमाने की लगती है। तीसरा कारण दक्षिणी फिल्में हैं जिन्होंने दर्शकों की रुचियों को बदला है। शायद इस कारण भी दर्शकों को लाल सिंह चड़्ढा पसंद नहीं आई। लेकिन इन तीन कारणों में सबसे बडा कारण बॉयकाट ही माना जा रहा है।
एक अंगेजी चैनल की बहस में अधिकांश चरचाकारों ने आमिर के ‘विवादित बयान और उसकी प्रतिक्रिया में बॉयकाट के आह्वान’ को ही सबसे बडा कारण माना। जब बताया गया कि विवादित बयान के बाद आई ‘पीके’ और ‘दंगल’ खूब चलीं तो बताया गया कि तब तक समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण इतना तीखा नहीं था। यहीं एक कश्मीरी हिंदू चरचाकार ने दो टूक कहा कि ‘कश्मीर फाइल्स’ के ‘बॉयकाट’ का आह्वान किया गया था तो इसके जवाब में इस फिल्म का भी बॉयकाट हुआ. लगता है कि हिंदू अब अपना दावा देश पर करने लगे हैं। यह अच्छा है.कहने की जरूरत नहीं कि तीखे ध्रुवीकरण के इस दौर में अब फिल्मों को ‘हिंदू–मुसलमान’ की नजर से देखा जाने लगा है। इसे ‘कश्मीर फाइल्स’ और ‘ज्ञानवापी’ बाद का दौर भी कहा जा सकता है‚ जो तीखे धार्मिक ध्रुवीकरण और धार्मिक हिंसा से भरा है‚ जिसमें कोई भी किसी को रंच मात्र नहीं सहता।
यह दौर कलाओं के लिए भी नई चुनौतियों का दौर है। समाज में धार्मिक विभाजन बढता है‚ तो उसका असर देर सबेर कलाओं पर भी पडता है। ऐसा पहले भी हो चुका है‚ लेकिन वह इतना निर्णायक नहीं था। यह तब की बात है जब अभिषेक बच्चन की शादी हुई। शादी के बाद अभिषेक के पिता अमिताभ बच्चन ने तिरुपति मंदिर में पूजा कराई। जैसे ही पूजा का वीडियो टीवी में दिखा वैसे ही रिएक्शन हुआ। अगले दिन एक ‘आर्थिक अखबार’ में एक ‘मारकेटिंग एक्सपर्ट’ ने लेख लिखा कि अमिताभ चूंकि बडे ‘ब्रांड़ एंबेसेडर’ हैं‚ इसलिए उनको किसी खास धर्म के प्रतीक के साथ नहीं दिखना चाहिए क्योंकि ब्रांड किसी एक धर्म के ग्राहकों के लिए नहीं होते‚ बल्कि ‘सभी के लिए’ होते हैं। तब अमिताभ बच्चन सबसे बडे ब्रांडों के एंबेसेडर थे। टीवी पर हर चौथा विज्ञापन उनका था। उनके मंदिर में जाने से ब्रांड़ की ‘सार्वभौमिक छवि’ विवादित होती दिखी। एक्सपर्ट का कहना था कि बडे स्टारों को विवाद से परे रहना चाहिए। नहीं तो वे नहीं चलेंगे। आमिर के लिए ही नहीं बाकी सब के लिए भी इसका यही ‘सबक’ है कि स्टार सबके लिए हैं‚ इसलिए वे विवाद में न फंसें तो बेहतर‚ नहीं तो वही होगा‚ जो हो रहा है।







