बिहार में भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ा जनता दल (यू) ने और आरोप लग रहा है कि भाजपा गठबंधन धर्म ठीक से नहीं निभा रही थी। देश में कहीं भी जब भाजपा के साथ किसी दल का गठबंधन टूटता है‚ तो आरोप लगने लगते हैं कि भाजपा गठबंधन धर्म का पालन ठीक से नहीं कर रही थी‚ इसलिए गठबंधन टूट गया। ऐसे आरोप महाराष्ट्र‚ बिहार‚ पंजाब‚ उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में लगते रहते हैं।
हाल ही में महाराष्ट्र में शिवसेना सिरे से दो–फाड़ हो गई‚ तो भी भाजपा पर ही उसे तोड़कर खुद सरकार बनाने का आरोप लगा‚ लेकिन इन आरोपों को समग्रता में देखे जाने की जरूरत है। चूंकि भाजपा का सबसे पहला गठबंधन महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ ही हुआ‚ इसलिए शुरु आत यहीं से करते हैं। जनता पार्टी से दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अलग हो जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी का जन्म ही १९८० में हुआ था। उसके पांच वर्ष बाद ही देश में श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन की आहट सुनाई देने लगी। इसी दौरान १९८५ में हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना एवं भाजपा एक–दूसरे के नजदीक आए। उसके बाद से ही शिवसेना और भाजपा के बीच प्रदेश स्तरीय गठबंधन में २०१४ तक शिवसेना ज्यादा एवं भाजपा कम सीटों पर चुनाव लड़ती रही है। सीटों का यह अंतर ५० से अधिक सीटों का होता था। इसके बावजूद शिवसेना हमेशा कहती रही कि जिसकी सीटें अधिक आएंगी‚ उसका ही मुख्यमंत्री बनेगा। कई चुनावों में शिवसेना १७१ एवं भाजपा ११७ सीटों पर चुनाव लड़ती रही। इस स्थिति में तो कभी भी भाजपा की सीटें शिवसेना से अधिक आ ही नहीं सकती थीं।
२०१४ में भाजपा कहती रही कि जिन ५० सीटों पर शिवसेना आज तक कभी नहीं जीती‚ कम–से–कम वह सीटें तो भाजपा को लड़ने के लिए दे दे‚ लेकिन शिवसेना को वह ५० सीटें अपने पास रखकर हारना मंजूर था‚ भाजपा को देकर जीतना नहीं। यह कहां का गठबंधन धर्म था भलाॽ अंततः उसकी इसी जिद के कारण २०१४ में शिवसेना–भाजपा का २५ साल पुराना गठबंधन टूट गया। भाजपा २६० सीटों पर अकेले लड़ी और १२२ सीटों पर जीतने में कामयाब रही। २०१९ में पुनः दोनों दल साथ आकर लड़े। तब भाजपा के हिस्से में १५० सीटें आइ। भाजपा इनमें भी १०५ सीटें जीतने में सफल रही‚ जबकि शिवसेना अपने हिस्से की १३८ सीटों पर लड़कर ५६ सीटें ही जीत सकी। ध्यान देने की बात है कि इस चुनाव में चुनाव पूर्व गठबंधन होने के बावजूद शिवसेना ने परिणाम आते ही पलटी मार ली। भाजपा के साथ संवाद एकतरफा रोक दिया और कांग्रेस–राकांपा के साथ सरकार बनाने के जुगाड़ में लग गई। ‘महाविकास आघाड़ी’ का गठन कर सरकार बना भी ली। उद्धव ठाकरे ने स्वयं मुख्यमंत्री बनने के लिए भाजपा के साथ हुए चुनाव पूर्व गठबंधन का भी सम्मान नहीं रखा। ये कौन सा गठबंधन धर्म था भलाॽ उद्धव के इस धोखे से तो उनके दल के विधायक–सांसद भी हैरान थे। वही हैरानगी ढाई साल में उबाल खाते–खाते बगावत तक आ पहुंची। क्योंकि शिवसेना के सांसदों–विधायकों को जवाब उस जनता के सामने देना है‚ जिसने अपना कीमती वोट कांग्रेस–राकांपा–शिवसेना की महाविकास आघाड़ी को नहीं‚ बल्कि शिवसेना–भाजपा गठबंधन को दिया था।
पुराने गठबंधनों को याद करें तो एक गठबंधन भाजपा और बहुजन समाज पार्टी का भी याद आता है। १९९३ में मायावती और समाजवादी पार्टी ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। तब यह नारा प्रचारित था ‘मिले मुलायम कांशीराम‚ हवा में उड़ गए जय श्रीराम’। मुलायम–कांशीराम के समझौते से बनी मुलायम सरकार दो साल ही चली थी कि मायावती समर्थन वापस लेने की योजना बनाने लगीं। तभी मुलायम सिंह ने दो जून‚ १९९५ को अपना असली रूप दिखाया और ‘गेस्टहाउस कांड’ हो गया। ऐसे आड़े वक्त में भाजपा नेताओं ने ही गेस्टहाउस पहुंचकर मायावती की रक्षा की थी। यही नहीं‚ अगले दिन ही तीन जून को भाजपा के ही समर्थन से मायावती ने मुख्यमंत्री पद की भी शपथ ले ली थी।
ये सारे अहसान भूलकर जब मायावती ने भाजपा के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह पर व्यक्तिगत हमले शुरू किए तो भाजपा को माया सरकार से समर्थन वापस लेना पड़ा। इसके दो साल बाद भाजपा और मायावती एक बार फिर साथ आए। भाजपा की मदद से मायावती फिर एक बार मुख्यमंत्री बनीं। इस बार मायावती और कल्याण सिंह को छह–छह महीने मुख्यमंत्री पद का बंटवारा करना था। मायावती ने अपना कार्यकाल तो पूरा कर लिया‚ लेकिन कल्याण सिंह की बारी आते ही कुछ दिन बाद ही समर्थन वापस ले लिया। अब सवाल उठता है कि गठबंधन धर्म किसने नहीं निभायाॽ नीतीश कुमार द्वारा दो दिन पहले भाजपा से नाता तोड़े जाने के बाद उनकी तारीफों के पुल बांधते हुए राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने अकाली दल एवं भाजपा गठबंधन को भी याद किया। कहा कि भाजपा अपने साथी क्षेत्रीय दलों को आगे नहीं बढ़ने देती। उसके कारण ही आज शिरोमणि अकाली दल की हालत खस्ता है।
अब शरद पवार को कौन समझाए कि पंजाब में तो हमेशा वर्चस्व की स्थिति में अकाली दल ही रहा है। उसने कभी भाजपा के किसी सिख नेता को पनपने ही नहीं दिया। आज अकाली दल की हालत खस्ता है‚ तो स्वयं उसके कारण। ना कि भाजपा के कारण। रही बात बिहार में नीतीश कुमार की‚ तो बताने की जरूरत नहीं है कि नीतीश बाबू आठ में से पांच बार भाजपा के ही सहयोग से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सके हैं। यहां तक कि जब उनके अपने दल के लोग भी उनका विरोध कर रहे थे‚ तब भी भाजपा ही उनके साथ खड़ी दिखाई दे रही थी। भाजपा नेताओं ने ही उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर उनकी पार्टी में भी बढ़त दिलाए रखी। २०२० का चुनाव पूर्व गठबंधन भी नीतीश बाबू ने भाजपा के साथ किया था‚ वह भी जंगलराज पुनः न आने देने के नारे के साथ। अब यदि वह पुनः उसी जंगलराज के समर्थक हो गए हैं‚ तो ये कौन से गठबंधन धर्म का द्योतक माना जाएगाॽ







