कट्टरता और कलाओं में जन्म का बैर है। यह बैर कभी प्रकट‚ कभी अप्रकट रूप में चलता रहता है और यह आज का नहीं है। इतिहास गवाह है कि समाजों में ज्यों–ज्यों कट्टरताएं बढती हैं‚ त्यों–त्यों वे कलाओं को दबोचती हैं। क्यों कलाएं ही सबसे निरीह होती हैं। नाजुक होती हैं‚ उनको कोई भी दबोच सकता है। इतिहास की बात करें तो ये तब से है‚ जब से कला का इतिहास है। और इतिहास ही बताता है कि भरत के ‘नाट्य शास्त्र’ का जन्म भी इसी ‘कट्टरता बरक्स कला’ की बहसों के बीच ही हुआ था। ‘नाट्य शास्त्र’ के जन्म को लेकर एक कहानी प्रसिद्ध है। कहानी के अनुसार पुराने वक्तों में जब इंद्र और अन्य देवता अपने मनोरंजन के लिए अक्सर ‘नाटक’ किया करते थे लेकिन वे ज्यों ही नाटक मंचित करते तो असुर लोग आकर उनके मंचन को तहस–नहस कर जाया करते थे। देवता इससे बडे परेशान होते थे। असुर ऐसा उत्पात न करें‚ इसके हेतु देवता लोग ब्रह्मा जी के पास गए ब्रह्मा जी ने उनकी बात सुनी तो उनको सुझाया कि वे ऐसा नाटक करें जिनमें असुरों की भी बात हो। देवताओं ने ऐसा ही किया लेकिन असुर आकर फिर तोडफोड कर गए। देवता फिर ब्रह्मा जी से मिले तो ब्रह्मा जी ने भरत को बुलाकर कहा कि वे एक ऐसा ‘नाट्य शास्त्र’ लिखें जिसमें ‘सबके मनोरंजन की बात’ हो जिसे सब पसंद करें और इसी प्रक्रिया में ‘रस सिद्धांत’ का जन्म हुआ जो आज तक कलाओं का सबसे बुनियादी सिद्धांत है‚ जो पश्चिमी सिद्धांतों से एकदम अलग है।
रस सिद्धांत कहता है कि असली कला रसवादी होती है। श्रोता दर्शक ‘रसावस्था’ में ‘मेरे तेरे’ के ‘भेदभाव’ को भूल जाता है‚ और यही ‘रस’ आदमी को आदमी से जोडता है। यही कला की आत्मा है। सारी समस्या यही है कि आज कल कला ‘रस से रहित’ कला है। उसमें रस का निष्पादन नहीं होता। उसे ‘यथार्थवादी’ बनाया जाता है। उसमें ‘ऐजंडा’ लगाया जाता है‚ और यही चीज झगडा पैदा करती है। यों भी पश्चिम की जितनी सिद्धांतिकी हैं‚ वे सब कला को ‘झगडे की जगह’ मानती हैं जबकि भरत का ‘नाट्य शास्त्र’ उनको ‘एकता की जगह’ मानता है। रस यही करता है। जब हम किसी सीन का देखकर अचानक मुग्ध हो उठते हैं‚ आनंदित हो उठते हैं‚ और ताली मारने लगते हैं‚ तब हम ‘रसावस्था’ में ही होते हैं। ‘रस’ में झगडे की जगह बनती ही नहीं!
जब पाकिस्तान में जिया उल हक का शासन था‚ तब इकबाल बानो ने फैज की नज्म ‘हम देखेंगे’ गाई और ऐसी गाई कि लोग ताली बजाने लगे। जब उसमें वे लाइनें आइ जो ‘तख्त गिराने वाली’ थीं तो भीड ने जोश में आकर देर तक ताली बजाई और इस तरह लोगों ने उसमें अपने क्रोध का शमन किया। इसी तरह जब लता का गाया ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ गाना बजता है‚ तो हम सबकी आंखें नम होने लगती हैं। यही ‘रस दशा’ है। इसी तरह ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल’ गीत सुनते हैं‚ तो हमें रोमांंच सा होने लगता है। यह भी ‘रस दशा’ है। लेकिन चूंकि आज की कलाओं में ‘रस’ नहीं होता‚ इसलिए उनको लेकर झगडा होता है। यह झगडा ‘पावर’ के लिए होता है। जाहिर है अगर कला न होगी तो वह ‘प्रचार’ होगी और इसीलिए ‘झगडे की जड’ बनेगी। लेाग उसके जरिए अपनी ताकत बढाना चाहेंगे और इसके लिए उसे हांकना चाहेंगे। अगर कला में कला न हेागी तो कट्टरता उसे अपना शिकार बनाएगी ही। यही हो रहा है। इन दिनों कला में ‘कला’ कम ‘विचार’ या ‘बिजनेस’ अधिक होता है। इसलिए भी कट्टरताएं कलाओं को कंट्रोल करने में लग जाती हैं।
अब चाहे फिल्म ‘शमशेरा’ के ‘बॉयकाट’ की बात हो या अब ‘लाल सिंह चढ्ड़ा’ फिल्म के ‘बॉयकाट’ की बात हो या उस एक मामूली सी मुस्लिम ‘स्ट्रीट सिंगर’ द्वारा ‘शिव स्तुति’ गाने को ‘गैर–इस्लामी’ कहने का दुराग्रह हो‚ कट्टरता और कला के बीच नया बैर भाव बार–बार नजर आता है। लोग उनके ‘रस निर्माण की क्षमता’ को न देखकर उनके ‘विचार’ को देखते हैं‚ और उसे ही कंट्रोल करना चाहते हैं। इसलिए इन दिनों कलाओं को दबोचने की कोशिशें बढती नजर आती हैं। यदि कला सचमुच कला होती तो ऐसा होना कठिन होता।
पिछले ‘कॉलम’ में हमने जिस फिल्म ‘शमशेरा’ के खिलाफ चलने वाले ‘बॉयकाट’ के अभियान के कारण उसके बॉक्स ऑफिस पर डूब जाने की बात की थी‚ फिल्म ‘लाल सिंह चढ्ड़ा’ भी इसी रास्ते जाने वाली लगती है। ऐसा आगे भी होते रहना है। उचित यही है कि पसंद न हो तो न आप फिल्म न देखें। यों भी इन दिनों बॉयकाट या बैन का कोई मतलब नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर हर चीज रहती है। देखने वाले वहां देख सकते हैं। इसी माने में सोशल मीडिया ‘डबल’ खेलता है। वहां बैन की बात होती है‚ तो हर चीज ‘अमर’ भी होती है।







