एक सौ तीस एकड़ में बने ३४० कमरे वाले देश के प्रथम नागरिक के निवास यानी राष्ट्रपति भवन का प्रांगण मदर इंडिया के स्वागत को बेताब है। इस प्रांगण ने बड़े–बड़े नेता‚ दलित‚ महिला‚ अल्पसंख्यक का स्वागत अब तक किया है। पहली बार होगा जब एक आदिवासी महिला के कदम यहां पड़ेंगे। एक ऐसी महिला जो साधारण जीवन जीकर‚ अपनी जीवटता के दम पर शीर्ष पद पर पहुंचेंगी। उनका संघर्ष ही उनको मदर इंडिया बनाता है। उनका जीवन देश और खासकर युवाओं‚ महिलाओं‚ गरीबों‚ वंचितों‚ दलितों और आदिवासियों के लिए प्रेरणा है। यह एनडीए की ही सरकार है‚ जिसने समानता और संषर्घ की इस देवी को शीर्ष पद पर आसीन करने की ठानी। मुझे इस बात का गर्व है कि मेरा एक वोट उनके काम आ सकेगा। अभी एक वर्ष पहले तक द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल थीं। वे राज्य की ऐसी पहली राज्यपाल बनीं जिन्होंने न केवल कार्यकाल पूरा किया‚ बल्कि एक भी विवाद में उनका नाम नहीं आया। बात केवल राज्यपाल के पद की नहीं है। २० जून‚ १९५८ को उड़ीसा के एक गरीब आदिवासी परिवार में जन्म लेने वाली द्रौपदी मुर्मू ने स्नातक के बाद १९७९ से लेकर १९९७ तक बिजली विभाग और फिर शिक्षक के तौर पर नौकरी की। १९९७ में वह पहली बार उड़ीसा के रायरंगपुर जिले की नगर पंचायत में पार्षद चुनी गइ। मयूरगंज विधानसभा सीट से दो बार विधायक तथा बीजेडी और बीजेपी गठबंधन की सरकार में मंत्री बनीं। २०१५ में झारखंड की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल बनीं। आदिवासी समुदाय के संथाली समुदाय से ताल्लुक रखने वाली द्रौपदी मुर्मू की शादी श्याम चरण मूर्मु से हुई। दो बेटों और एक बेटी की मां द्रौपदी मुर्मू ने जीवन के उस पल को भी जीवटता के साथ जीया जब उनके दो बेटों और पति का असमय निधन हो गया।
फिर भी द्रौपदी मुर्मू ने हार नहीं मानी। एक बेटी के सहारे अपने संघर्ष को आगे बढ़ाती हुई समाज के लिए काम करती रहीं। उनका हर कार्यकाल बेदाग और जीवन बेहद सादा रहा। ६४ वर्ष की आयु में सबसे कम उम्र की राष्ट्रपति बनने की ओर अग्रसर द्रौपदी मुर्मू आज भी एक छोटे से घर में रहती हैं। उन्होंने अपने दुख को नियति की मांग मानते हुए वंचितों की सेवा जारी रखी। जब उनको राष्ट्रपति पद का एनडीए ने उम्मीदवार बनाया तो भी वह शिव मंदिर में पूजा कर झाडू लगाने लगीं। यह दिखाता है कि उनकी राष्ट्र और समाज के लिए सोच क्या है। दूसरों की सेवा‚ किसी को कष्ट न देना‚ अपना काम खुद ही करना और हर विपत्ति में संघर्ष कर विजय प्राप्त करने की क्षमता उनको एक आम इंसान से महान बनाती है। सहनशीलता‚ संघर्ष और त्याग की इस देवी को इसी वजह से एनडीए ने अपना उम्मीदवार बनाया है॥। देश के हर वंचित‚ गरीब‚ दलित‚ आदिवासी और महिला वर्ग को यह उम्मीद है कि द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी आवाज और बुलंद होगी। कुछ ऐसे परिवर्तन आने वाले समय में देश में दिखाई देंगे जो हर वर्ग को समानता के अधिकार का अहसास कराएंगे। देश में एक ऐसा संदेश जाएगा कि अगर आप लगन‚ ईमानदारी और मेहनत से अपना कार्य करते रहते हैं‚ तो कोई भी पद आपके व्यक्तित्व के आगे छोटा हो जाएगा।
आदिवासी समुदाय के संथाली समुदाय से ताल्लुक रखने वाली द्रौपदी मुर्मू की शादी श्याम चरण मूर्मु से हुई। दो बेटों और एक बेटी की मां द्रौपदी मुर्मू ने जीवन के उस पल को भी जीवटता के साथ जीया जब उनके दो बेटों और पति का असमय निधन हो गया। फिर भी द्रौपदी मुर्मू ने हार नहीं मानी। एक बेटी के सहारे अपने संघर्ष को आगे बढ़ाती हुई समाज के लिए काम करती रहीं। उनका हर कार्यकाल बेदाग और जीवन बेहद सादा रहा। ६४ वर्ष की आयु में सबसे कम उम्र की राष्ट्रपति बनने की ओर अग्रसर द्रौपदी मुर्मू आज भी एक छोटे से घर में रहती हैं। उन्होंने अपने दुख को नियति की मांग मानते हुए वंचितों की सेवा जारी रखी॥







