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जीएसटी मुआवजा : आर्थिक संकट में अनेक राज्य

UB India News by UB India News
July 4, 2022
in Lokshbha2024, कारोबार, खास खबर
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जीएसटी मुआवजा : आर्थिक संकट में अनेक राज्य
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 30 जून और 1 जुलाई, 2017 की मध्य रात्रि जीएसटी के रूप में देश की कर प्रणाली की नई शुरु आत की घोषणा की थी तो भाजपा नेताओं और भाजपा-नीत सरकारों ने इसे मध्य रात्रि में भारत का भाग्योदय बताया था।

प्रधानमंत्री मोदी के इस मध्यरात्रि भाषण की तुलना 15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक भाषण से की गई थी, लेकिन लगता है कि मध्यरात्रि का यह भाग्योदय देश के कम से कम उन 16 राज्यों के लिए उल्टा होने जा रहा है, जिनको 30 जून, 2022 तक राजस्व हानि के बदले मुआवजे की गारंटी दी गई थी।
यह समय सीमा समाप्त हो चुकी है, और 29 जून को चंडीगढ़ में संपन्न जीएसटी काउंसिल की बैठक में प्रतिपूर्ति के मामले में निर्णय नहीं हो सका। जीएसटी से उत्तराखंड जैसे राज्य को ही सीधे-सीधे 5 हजार करोड़ रुपये सालाना नुकसान है। जब 1 जुलाई, 2017 को केंद्र व राज्यों के 17 तरह के करों को राष्ट्रव्यापी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में समाहित कर नई कर प्रणाली लागू की गई थी, तो तय किया गया था कि राज्यों को नये कर से राजस्व के किसी भी नुकसान के लिए पांच साल के लिए 30 जून, 2022 तक मुआवजा दिया जाएगा। इस समय सीमा से ठीक पहले केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च निर्णायक संस्था जीएसटी काउंसिल की चंडीगढ़ में बैठक आयोजित हुई तो उम्मीद जगी कि मुआवजे के बारे में यथासमय निर्णय हो जाएगा और उन 16 राज्यों को न्याय मिलेगा जिनके लिए जीएसटी कर भाग्योदय नहीं, बल्कि भाग्य अस्त साबित हो रहा है। चूंकि इन राज्यों में उत्तराखंड सहित 12 डबल इंजन वाले राज्य भाजपा शासित हैं, इसलिए उम्मीद थी कि जीएसटी मुआवजे की अवधि समय से बढ़ जाएगी। लेकिन 29 जून को संपन्न चंडीगढ़ की बैठक में इस पर कोई निर्णय नहीं हो सका। यद्यपि इस पर अभी इंकार भी नहीं हुआ है तो भी हीलाहवाली साफ कह रही है कि केंद्र सरकार राज्यों का यह बोझ अपने सिर ढोने को राजी नहीं है। केंद्र की अनिच्छा का कारण उसकी वित्तीय स्थिति भी है। केंद्र सरकार को भारी मात्रा में लोकलुभावन योजनाओं में संसाधन झोंकने पड़ रहे हैं। मुआवजा बंद होने से लोकप्रियता उतनी प्रभावित नहीं होगी जितनी मुफ्त राशन, पेंशन, सम्मान निधि आदि अनेकों योजनाओं को बंद करने से हो सकती है।

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एक जुलाई, 2017 को जीएसटी लागू होने के रोज भी उत्तराखंड में भाजपा की सरकार थी और आज भी उसी की सरकार है। फर्क इतना भर है कि तब राज्य सरकार को जीएसटी की मार की चोट का अहसास नहीं था, इसलिए मुख्यमंत्री से लेकर समूचा काडर जीएसटी का गुणगान कर रहा था लेकिन अब जबकि चोट असहनीय होने लगी तो डबल इंजन की सरकार की आह निकल ही गई। जीएसटी के मारे उत्तराखंड सहित इन 12 राज्यों की बिडम्बना है कि वे प्रधानमंत्री मोदी की इस ऐतिहासिक देन जीएसटी को अपना दुर्भाग्य भी नहीं कह सकते और तारीफ करें तो फिर मुआवजे की मांग ही क्यों? राज्यों के संकट का कारण संरचनात्मक परिवर्तन, न्यून उपभोग आधार, एसजीएसटी के रूप में भुगतान किए गए करों का आईजीएसटी के माध्यम से बहिर्गमन, वस्तुओं पर वैट की तुलना में कर की प्रभावी दर कम होना, कई राज्यों में सेवा का अपर्याप्त आधार तथा जीएसटी के अंतर्गत वस्तुओं एवं सेवाओं पर कर दर में निरंतर कमी होना है। जीएसटी के लिए 16 राज्यों को मुआवजे के रूप में जो पांच साल का अभयदान मिला था उसमें दो साल तो कोरोना महामारी से ही बर्बाद हो गए। इसलिए उम्मीद थी कि केंद्र सरकार इन दो सालों का ध्यान रखते हुए समयावधि विस्तार में संकोच नहीं करेगी। भाजपा शासित राज्य साथ होने से उम्मीद और भी प्रबल थी, जिस पर फिलहाल पानी फिरता नजर आ रहा है।
दरअसल, आशंकित राज्य आज से नहीं, बल्कि काफी पहले से मुआवजा विस्तार की मांग कर रहे थे। समय करीब आते जाने से जब उत्तराखंड सरकार की बेचैनी बढ़ी तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के वित्तीय संकट का दुखड़ा लेकर प्रधानमंत्री मोदी और वित्त मंत्री के पास पहुंचे। बेचैनी अैर बढ़ी तो राज्य के वित्त मंत्री प्रेम चंद अग्रवाल ने चंडीगढ़ में पहली जीएसटी कांउसिल की बैठक में अपनी बात रखी। वित्त मंत्री सीतारमण को राज्य सरकार की ओर से ज्ञापन भी सौंपा। फिर भी उत्तराखंड की आवाज नक्कारखाने की तूती बन गई। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भी काफी पहले से इस विस्तार की मांग कर रहे थे। जीएसटी से कर राजस्व की हानि के साथ ही राज्यों के औद्योगीकरण को भी गहरा धक्का लगा है। जीएसटी के बाद कर राजस्व उत्पादन करने वाले राज्य की बजाय उपभोग करने वाले राज्य को मिल रहा है। इस स्थिति में औद्योगीकरण का कुछ खास लाभ प्रभावित राज्यों को नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में कम खपत वाले राज्य आद्योगीकरण के लिए अपनी ऊर्जा और संसाधन खपाएं भी तो क्यों?

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