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आइए‚ बचाएं सामूहिक विवेक

UB India News by UB India News
July 2, 2022
in Lokshbha2024, खास खबर, प्रदेश, ब्लॉग
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आइए‚ बचाएं सामूहिक विवेक
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निस्संदेह‚ एक दूजे के खिलाफ गले फाड़ती और नेजे चमकाती रहने वाली धार्मिक व सांप्रदायिक कट्टरता अपने मूल रूप में एक दूजे की पूरक और अपने अस्तित्व के लिए एक दूजे पर निर्भर होती हैं। न सिर्फ हमारे देश बल्कि दुनिया के अतीत में भी ऐसी कई मिसालें हैं‚ जब परस्पर उलझी हुई दो कट्टरता में से किसी एक का उन्मूलन कर दिया गया तो उसके खिलाफ रोज–रोज युद्धघोष करती रहने वाली दूसरी कट्टरता भी खुद को नहीं ही बचा पाई। इसीलिए कट्टरता आपस में भिड़ंत का कितना भी दिखावा करें‚ सर्वाधिक एकजुट मनुष्य के उस विवेक पर हमले में ही होती हैं‚ जो इस समझदारी के विकास के लिए सक्रिय रहता है कि वैर से वैर कभी शांत नहीं होता।

वैर से वैर को शांत करने की कोशिश अंततः घी से आग बुझाने की कोशिश जैसी सिद्ध होती है और वैर को सचमुच शांत करना हो तो अवैर की राह अपनानी पड़ती है और अपने द्वेषपूर्ण चित्त को मैत्रीपूर्ण चित्त से प्रतिस्थापित करना पड़ता है। राजस्थान के उदयपुर शहर में भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्टों की श्रृंखला से पैदा हुए एक विवाद में पैगम्बर मोहम्मद का अपमान करने वाली बहुचर्चित नूपुर शर्मा के समर्थन का बदला लेने के नाम पर कथित तौर पर ‘दावत–ए–इस्लामी’ से जुड़े दो नरपिशाचों द्वारा कन्हैयालाल नामक दर्जी से जो दरिंदगी की गई है और जिसने देश के शांति और सौमनस्य के लिए गम्भीर अंदेशे पैदा करते हुए सद्भाव के सारे पैरोकारों को हिलाकर रख दिया है‚ उसे कुछ इसी तरह समझा जा सकता है। हां‚ यह समझना तब तक किसी काम का नहीं‚ जब तक यह भी न समझ लिया जाए कि कन्हैयालाल की जान लेने वाले सिरफिरों के पीछे‚ जैसा कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत अंदेशा जता रहे हैं‚ कोई विदेशी साजिश हो या देशी‚ साजिशियों को कन्हैयालाल की जान से ज्यादा इस देश के सामूहिक विवेक से खेलना अभीष्ट है। क्योंकि उसके सामूहिक विवेक को सामूहिक अविवेक में बदले बगैर तो वे कितनी भी बर्बरता बरत लें‚ वह सब पाने से रहे‚ जो हर कीमत पर हासिल करना चाहते हैं। अच्छी बात है कि अभी तक इस सामूहिक विवेक ने एक भी ऐसा संकेत नहीं दिया है जिससे लगे कि वह किंचित भी उद्वेलित या आक्रांत हो रहा है। अभी तक तो उस पर कोई खरोंच भी नजर नहीं आई है। इसे इस रूप में देख सकते हैं कि कुछ नाशुक्रों को छोड़ दें तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के नेताओं ने सारे मतभेद भुलाकर कन्हैयालाल के हत्यारों की कड़ी निंदा‚ उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांगें और उनके मंसूबे नाकाम करने के लिए हर तरह की नफरत को हराने व भाईचारे को उसकी भेंट चढ़ने से बचाने की अपीलें की हैं। यहां कहना होगा कि राज्य की पुलिस ने इस बर्बरता से जुडे भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्टों के विवाद को शुरू में ही गम्भीरता से लिया होता तो शायद विवाद इस त्रासद अंजाम तक पहुंच ही नहीं पाता‚ लेकिन शुक्र है कि बाद में उसने भी दोनों हत्यारोपियों को तत्परतापूर्वक राजसमन्द से गिरफ्तार कर लिया। इस कांड़ की जांच इसलिए भी जरूरी है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अंदेशा है कि उदयपुर में जो कुछ हुआ‚ वह किसी बड़े राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय लिंक के बिना नहीं हो सकता। इस सिलसिले में एक और अच्छी बात यह हुई है कि जिन अल्पसंख्यकों के धर्म के नाम पर उदयपुर में यह बर्बरता बरती गई है‚ उन्होंने खुद को उससे अलग करने में देर नहीं लगाई है। बरेली में मुस्लिम धर्मगुरुû मौलाना तौकीर रजा ने तो यह कहकर लोगों को चकित कर दिया है कि चूंकि उनके धर्म के नाम पर यह जुर्म किया गया है‚ इसलिए वे समझते हैं कि इस गुनाह में उनका भी हिस्सा है और उन्हें भी सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने हत्यारोपियों के कृत्य को गैरइस्लामी बताते हुए उन पर सख्त–से–सख्त कार्रवाई की मांग की है। इतना ही नहीं‚ उन्हें मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा दुश्मन बताया और कहा है कि इस्लाम ऐसे अपराधों की इजाजत नहीं देता।

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न्यायशास्त्र का नियम है कि एक अपराध को दूसरे अपराध का औचित्य सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। फिर इस सबसे इतर इस वक्त हर देशवासी का कर्तव्य है कि वह देश के सामूहिक विवेक को कलंकित करने वाला कोई भी कृत्य न करे। इसी तरह देश की सरकार का कर्तव्य है कि वह देर से ही सही‚ उन महानुभावों की सुद्धि जगाने का अभियान शुरू करे‚ जो वैर को वैर से शांत करने के बेहिस प्रयासों के तहत धर्म संसदों को भी अधर्म की संसद बनाए दे रहे हैं और अल्पसंख्यकों के नरसंहार की अपीलों तक के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। महाभारत की लड़ाई में हारने वालों को तो सर्वस्व गंवाना ही पड़ा था‚ जीतने वालों को भी लाशों के अंबार पर बैठे थोथे विजय दर्प के अलावा कुछ हासिल नहीं हो पाया था। किसी शायर ने क्या खूब कहा हैः दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम‚ तुम भी थक जाओगे‚ हम भी थक जाएंगे।

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