थोक कीमतों पर आधारित मुद्रास्फीति अप्रैल में बढ़कर १५.०८ फीसद के रिकॉर्ड़ उच्च स्तर पर पहंुच गई। यह नौ साल का उच्चतम स्तर है। थोक महंगाई लगातार तेरह महीने से दो अंकों में बनी हुई है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार‚ गेहूं‚ सब्जियां‚ फल और आलू के दामों में वृद्धि हुई है। कच्चे तेल‚ प्राकृतिक गैस‚ रासायनिक उत्पादों और रसायनों के दाम भी बढ़े हैं। अर्थशास्रियों का कहना है कि रूस–यूक्रेन युद्ध और भीषण गर्मी से फल‚ सब्जियां और दूध जैसे जल्द खराब होने वाले सामान के दाम बढ़ने से थोक महंगाई में उछाल आया है। तो महंगाई के मोर्चे पर चुनौतियों कम होने में नहीं आ रहीं। अंदेशा है कि जून में होने वाली मौद्रिक नीति की अपनी समीक्षा बैठक में रिजर्व बैंक नीतिगत ब्याज दरों में और इजाफा कर सकता है। इससे बैंक भी ब्याज दरें बढ़ाने को विवश होंगे और नतीजतन सभी के कर्ज और महंगे हो सकते हैं। बेशक‚ महंगाई काबू रखने की गरज से सरकार नकदी की तरलता घटाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाती है‚ लेकिन इससे आर्थिक रफ्तार थमने का अंदेशा उठ खड़़ा होता है। थोक महंगाई थोक विक्रेताओं के बिंदु पर कीमतों में वृद्धि के जरिए मापी जाती है यानी यह सीधे तौर पर आपूर्ति से जुड़़ी होती है। इसमें इजाफा होने पर निर्माता बढ़ी लागत का बोझ दाम बढ़ाकर खुदरा दुकानदारों और ग्राहकों पर ड़ाल देते हैं। ग्राहक पर इस इजाफे का असर कुछ समय अंतराल बाद पड़़ता है। थोक महंगाई का आंकड़़ा ऐसे समय आया है‚ जब खुदरा महंगाई की दर आठ साल के रिकॉर्ड़ स्तर पर है। माना जा रहा है कि अप्रैल की थोक महंगाई के इस आंकड़े़ का असर मई के खुदरा महंगाई के आंकड़़ों में देखने को मिल सकता है यानी आने वाले महीनों में महंगाई नये रिकॉर्ड़ बना सकती है। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए महंगाई का कम और स्थिर होना जरूरी है। यही कारण है कि केंद्रीय बैंक ने महंगाई को काबू में रखने के लिए नीतिगत ब्याज दर बढ़ाने का तरीका अपनाया है। दरअसल‚ केंद्रीय बैंक के सामने दोहरी चुनौती है। पहली कि उसे आर्थिक परिदृश्य में सुस्ती नहीं आने देनी और दूसरी कि इसी के साथ महंगाई को नियंत्रण में रखना है। कोरोना महामारी का एक प्रतिकूल प्रभाव यह भी रहा कि बड़ी संख्या में लोगों के रोजगार छिन गए। ऐसे में आर्थिक सुस्ती की स्थिति किसी सूरत वांछनीय नहीं है। लेकिन दामों को काबू में रखना ही केंद्रीय बैंक की प्राथमिकता बना रहेगा।
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