पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने वास्तव में ऐतिहासिक फैसला दिया है। डिप्टी स्पीकर के निर्णय तथा राष्ट्रपति के आदेश को पलटना पाकिस्तान की पृष्ठभूमि को देखते हुए सामान्य फैसला नहीं है। इमरान की ओर से सर्वोच्च अदालत में पुनरीक्षण याचिका दायर करने की बात कही गई है। देखना है पुनरीक्षण याचिका पर सर्वोच्च अदालत क्या निर्णय देता है। किंतु न्यायालय के फैसले के बाद इमरान और उनकी पार्टी के लिए विपक्ष पर यह आरोप लगाना कठिन हो गया है कि वह विदेशी साजिश के तहत सरकार गिराना चाहते थे। डिप्टी स्पीकर ने अविश्वास प्रस्ताव खारिज करने के पीछे यह एक प्रमुख कारण बताया था। इमरान और उनकी पार्टी झूठ बोल रही है। यह सबको पता था लेकिन ऐसे आरोपों से चुनाव में जनता को बरगलाना थोड़ा आसान होता है। न्यायालय ने इस प्रकरण का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार इमरान से छीन लिया है। इमरान यह तो नहीं कह सकते कि न्यायालय भी विपक्ष के साथ है तथा वह भी विदेशी हाथों से खेल रहा है। जो भी हो इससे यह स्पष्ट हुआ है कि इमरान और उनके समर्थकों ने जानबूझकर ऐसी स्थिति पैदा की ताकि किसी तरह सत्ता विपक्ष के हाथ में न जाए। उनका दांव सफल होता लग ही रहा था लेकिन अदालत ने सब पलट दिया। विपक्ष आक्रामक है और उसकी आक्रामकता का तार्किक जवाब देना इमरान और उनकी पार्टी के लिए कठिन हो होगा। सच कहे तो डिप्टी स्पीकर द्वारा अविश्वास प्रस्ताव खारिज करने का कदम ही विपक्ष को ज्यादा नजदीक लाया तथा सर्वोच्च अदालत के फैसले से उसका आत्मविश्वास बढ़ा है। पीपीपी और पीएमएल–एन के बीच सामान्य तौर पर ऐसा तालमेल संभव नहीं जैसा इस समय दिख रहा है। कहना न होगा कि इसका असर पाकिस्तान की राजनीति पर पड़ेगा। इस समय एक ओर इमरान है तो दूसरी ओर समूचा विपक्ष। यह कहां तक जाएगा कहना कठिन है क्योंकि पाकिस्तान में कभी लोकतंत्र के सामान्य अवस्था में गतिमान होने का की परंपरा नहीं है। सर्वोच्च अदालत के फैसले ने उम्मीद जगाई है। बावजूद कोई निष्कर्ष नहीं दिया जा सकता। वास्तव में पाकिस्तान के अतीत को देखते हुए जब तक कोई परिणाम सामने न आ जाए केवल घटनाओं पर नजर रखी जा सकती है।
क्या इस बार पास होगा परिसीमन बिल?
20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में एक बार फिर संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 यानी...







