संविधान सभा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय राजनीति में परिवारवाद या वंशवाद के पुराने मुद्दे को उठाकर इसे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। समाजवादी चिंतक और नेता राम मनोहर लोहिया ने सबसे पहले भारतीय राजनीति में परिवारवाद की बढ़øती प्रवृत्ति का विरोध किया था। इसके बाद समय–समय पर संसद और सडक पर इस मुद्दे पर चर्चा होती रही‚ लेकिन भारतीय राजनीति में परिवारवाद की वंशबेलि बढ़øती रही। प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की आलोचना करते हुए कहा कि जो राजनीतिक दल अपना राजनीतिक चरित्र खो चुके हैं‚ वे लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर सकते। उनका विश्वास है कि परिवारवादी पार्टियां संविधान के प्रति समर्पित राजनीतिक दलों के लिए चिंता का विषय है। यह राजनीतिक यथार्थ है कि भारतीय राजनीति में परिवारवाद या वंशवाद की जड़ें़ काफी गहरी हो गइ हैं। राष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय तक एक ही परिवार कर व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता रहा है और पीढ़ी–दर–पीढ़ी पार्टी को संचालित भी करता आ रहा है। विड़ंबना यह है कि क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण परिवारवाद की प्रवृत्ति राज्यों की राजनीति में भी बहुत मजबूत हो चुकी है। देश की प्रायः सभी क्षेत्रीय पार्टियों का विकास वंशवादी ढांचे पर ही हो रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि संविधान दिवस पर आयोजित प्रधानमंत्री के इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने वाले देशों में कम्यूनिस्ट पार्टियों को छोड़़कर प्रायः सभी पार्टियां पारिवारिक पार्टियों की श्रेणी में ही आती है। हालांकि भाजपा भी इस रोग से अछूती नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा राजनीति में वंशवाद की धुर विरोधी रही है। कह सकते हैं कि हमाम में सभी नंगे हैं। जाहिर है परिवारवाद लोकतंत्र के लिए एक बड़़ा संकट है‚ लेकिन परिवारवाद के अलावा अन्य कारक भी हैं जो भारतीय लोकतंत्र की जड़़ों को कमजोर कर रहा है। विधि का शासन लोकतंत्र की सफलता का आवश्यक शर्त है‚ लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी यह ठीक तरह से लागू नहीं हो पाया है। लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाने के लिए स्थानीय स्वशासन को और ज्यादा संपन्न बनाने के साथ–साथ महिलाओं और अल्पसंखयकों को शासन में उचित भागीदार बनाना होगा। सरकार की विभिन्न संस्थाओं में लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को लागू करना होगा।
जेपी मूवमेंट से कितना अलग CJP प्रदर्शन?
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