ये सब उस गौरवशाली प्रक्रिया के अहम पड़़ाव हैं‚ जिन्होंने महिलाओं की समानता और सम्मान की लड़ाई को नई ताकत दी है। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि देश में आए इस बदलाव और इसके प्रणेता बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आज दुनिया भर में चर्चा होती है। हाल ही में ग्लासगो में कॉप–२६ सम्मेलन का एक वीडियो वायरल हो रहा है‚ जिसमें इजराइली प्रधानमंत्री बेनेट हमारे प्रधानमंत्री को उनकी लोकप्रियता का हवाला देते हुए उन्हें इजराइल आने और अपनी पार्टी में शामिल होने का न्योता देते दिखे हैं। यह बहुत स्वाभाविक है क्योंकि जब बदलाव का पैमाना इतना बड़ा हो‚ तो उसके प्रभाव का दायरा भी उतना ही विशाल होता है…
दिल्ली से एक बड़े परिवर्तन की खबर है। बड़ी बात यह है कि यह खबर राजनीतिक नहीं है। बल्कि इसका राजनीति से दूर–दूर तक कोई लेना–देना भी नहीं है। देश के भले के लिए हर देशवासी को प्रार्थना करनी चाहिए कि आगे चलकर भी इसका राजनीति से कोई कनेक्शन न जुड़ने पाए। दरअसल‚ दिल्ली में अब छह जिलों की सुरक्षा का जिम्मा महिला पुलिस उपायुक्तों यानी महिला डीसीपी को दे दिया गया है। १५ पुलिस जिलों वाली जिस दिल्ली को महिलाओं के लिए ‘असुरक्षित’ बताया जाता है‚ वहां के ४० फीसद हिस्से की कमान सुपर लेडी कॉप्स को मिलना यकीनन महिला सशक्तिकरण की एक बड़ी मिसाल है। देश की राजधानी में पिछले एक महीने में नौ महिला एसएचओ की तैनाती भी हुई है। इसके साथ ही ‘तेजस्विनी’ योजना के अंतर्गत दिल्ली के उत्तर–पश्चिमी जिले में ४६ महिला पुलिसकर्मी भी बीट अफसर के रूप में काम कर रही हैं॥। यह तमाम आंकड़े बताते हैं कि देश की महिलाओं ने किस तरह उस मिथक को तोड़ दिया है कि पुलिसिंग केवल पुरु ष प्रधान पेशा है। अब तक महिलाओं के लिए तो पुलिस में नौकरी पाना ही मुश्किल होता था। जो महिलाएं अपने जज्बे और जुनून के दम पर इस लक्ष्मण रेखा को पार कर जाती थीं‚ उन्हें महिलाओं और बच्चों को संवेदनशील बनाने और महिलाओं पर होने वाले अपराध से निपटने की जिम्मेदारी दे दी जाती थी। यह पहली बार हो रहा है जब महिलाओं को डकैती‚ लूट‚ जेबकटी‚ स्नैचिंग और संगठित अपराधों की रोकथाम समेत सड़कों पर गश्त लगाने जैसे महत्व के काम सौंपे जा रहे हैं। यह सब कुछ ऐसे काम हैं जिन पर अभी तक पुरु षों का ही एकाधिकार था और महिलाओं पर इसके लिए ‘पर्याप्त रूप से सख्त नहीं’ होने का लेबल चिपका दिया जाता था‚ लेकिन दिल्ली पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने राजधानी के ६ पुलिस जिलों में महिला डीसीपी की तैनाती कर हर क्षेत्र में महिलाओं की ज्यादा–से–ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रधानमंत्री के विजन को हकीकत के धरातल पर उतारने की बड़ी पहल की है।
इस बदलाव के बाद अब दिल्ली पुलिस में महिलाओं की संख्या १६ फीसद तक पहुंच गई है। यकीनन यह एक–तिहाई के तय लक्ष्य से अभी भी कम है‚ लेकिन देश के बाकी राज्यों की ही तरह हाल के वर्षों में यह संख्या तेजी से बढ़ी है। साल २०१४ में देश भर में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या १.५ लाख के करीब थी‚ जो अब लगभग दोगुनी वृद्धि के साथ २.१५ लाख को पार कर गई है। पिछले सात साल में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भी महिलाओं की भागीदारी इसी दर से बढ़ी है। बात केवल संख्या की नहीं है। किसी एक क्षेत्र की उपलब्धि की भी नहीं है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आज देश की बेटियां और महिलाएं पूरी ताकत और जोश के साथ कठिन–से–कठिन कर्तव्यों को भी सफलतापूर्वक निभा रही हैं। हाल ही में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस बदलाव को रेखांकित करते हुए कहा था कि हमारी यह पुलिसकर्मी देश के लाखों बेटियों की रोल मॉडल का काम कर रही हैं। महिला सुरक्षाकर्मियों की उपस्थिति स्वाभाविक रूप से लोगों में खासकर महिलाओं में आत्मविश्वास की भावना पैदा करती है। प्रधानमंत्री के शब्दों में कहें‚ तो भारत अब ‘महिला विकास’ से ‘महिला के नेतृत्व में विकास’ की तरफ बढ़ रहा है। यह ऐसा बदलाव है‚ जिसने महिला सशक्तिकरण की परिभाषा में लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय के दायरे को नया विस्तार दिया है। अब इसमें महिलाओं के लिए नौकरियों‚ उद्यमिता‚ सुरक्षा और विकास में समान अवसरों का अधिकार भी शामिल हो गया है। इस लिहाज से मोदी सरकार ने वास्तव में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाले ऐसे दृष्टिकोण का प्रदर्शन किया है जो साहसिक होने के साथ परिपक्व दिखता है और आधुनिकता की आवश्यकताओं को भी पूरा करता है। इस अमूर्त विचार को अभिव्यक्ति मिलती है सरकार के लागू किए गए नियम–कायदों और उसके चलाए गए कार्यक्रमों में जहां महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा देने के साथ–साथ उनके सामर्थ्य में वृद्धि की कोशिश दिखाई देती है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना‚ शौचालय‚ आवास योजनाएं केवल गरीबों के लिए रोजमर्रा की चुनौतियों से राहत की ही नहीं‚ बल्कि इन परिवारों की महिलाओं को भी सम्मानजनक गुजर–बसर के अवसर प्रदान कर रही हैं। इसी तरह प्रधानमंत्री मुद्रा योजना‚ स्वनिधि योजना की ज्यादातर लाभार्थी समाज के हाशिए के वर्गों से संबंधित महिलाएं ही हैं‚ जिन्हें इन योजनाओं की मदद से आजीविका और स्वरोजगार के ऐसे माध्यम सुलभ हुए हैं‚ जो केवल उनके ही नहीं‚ समूचे परिवार के हितों का पोषण कर रहे हैं। इसी तर्ज पर देश में पिछले छह–सात साल में स्वयं सहायता समूहों की संख्या भी तीन गुना से ज्यादा बढ़ी है यानी इनके जरिए तीन गुना से ज्यादा महिलाओं के आर्थिक स्वाबलंबन की नई राह भी खुली है।
अनुमान है कि आज देश भर में ७० लाख से ज्यादा स्वयं सहायता समूह के माध्यम से ८ करोड़ से ज्यादा महिलाएं जमीनी बदलाव की एक बड़ी मुहिम को साकार करने में योगदान कर रही हैं। इतना ही नहीं‚ ग्रामीण महिलाओं को कौशल विकास‚ रोजगार‚ डिजिटल साक्षरता‚ स्वास्थ्य और पोषण के अवसरों के साथ सशक्त बनाने के लिए महिला शक्ति केंद्र भी शुरू किए गए हैं। पिछले चार साल से देश के ११५ से भी ज्यादा पिछड़े जिलों में यह केंद्र छात्र स्वयंसेवकों के माध्यम से सामुदायिक जुड़ाव का काम कर रहे हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने का एक बड़ा प्रतीक जन–धन योजना में भी मिलता है। देश की महिलाएं पारंपरिक रूप से‚ और विकल्पों के अभाव के कारण भी‚ रसोई के डिब्बों में अपने पैसे रखा करतीं थीं‚ लेकिन जन–धन योजना ने इस बचत के लिए रसोई से बैंक तक का मजबूत और सुरक्षित पुल बनाने का काम किया। आज देश में ४२ करोड़ से ज्यादा जन–धन बैंक खाते हैं और इनमें से ५५ फीसद महिलाओं के नाम पर हैं। महिलाओं और बालिकाओं को सशक्त बनाने के लिए मोदी सरकार की इन पथ–प्रदर्शक पहलों की कोई भी सूची ‘बेटी बचाओ‚ बेटी पढ़ाओ’ की बात किए बिना पूरी नहीं हो सकती। साल २०१५ में १०० जिलों में पायलट योजना के तौर पर शुरुआत के बाद अब इसका विस्तार ६४० जिलों तक हो चुका है और इसका असर पूरे देश में दिख रहा है। हरियाणा इसकी सबसे बड़ी मिसाल है जहां के पानीपत और यमुनानगर जैसे जिलों में केवल छह साल में लिंग अनुपात १००० पुरुषों पर ८७१ से बढ़कर ९४५ तक पहुंच गया है। बात फिर केवल संख्या की नहीं‚ महत्वपूर्ण है बच्चियों को लेकर मानसिकता में आया बदलाव। इस बदलाव की बुनियाद में केवल महिला–अनुकूल कार्यक्रम ही नहीं है‚ बल्कि मोदी सरकार के लागू किए गए सुधारवादी कानून भी हैं।
१९७१ के मेडिकल टर्मनेशन प्रेग्नेंसी एक्ट में संशोधन हो या महिलाओं को उनके शरीर पर प्रजनन अधिकार का मसला या फिर भ्रूण के गर्भधारण की अवधि को २० से बढ़ाकर २४ सप्ताह करना या महिलाओं के लिए विवाह योग्य आयु में वृद्धि पर चर्चा शुरू करवाना‚ ट्रिपल तलाक की अमानवीय प्रथा का कानूनन उन्मूलन करना‚ सीमा और तटीय क्षेत्रों में अपराधों की रोकथाम के लिए एनसीसी में अधिक महिलाओं की भर्ती करना; ये सब उस गौरवशाली प्रक्रिया के अहम पड़़ाव हैं‚ जिन्होंने महिलाओं की समानता और सम्मान की लड़ाई को नई ताकत दी है। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि देश में आए इस बदलाव और इसके प्रणेता बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आज दुनिया भर में चर्चा होती है। हाल ही में ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र के कॉप–२६ सम्मेलन का एक वीडियो वायरल हो रहा है‚ जिसमें इजराइली प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट हमारे प्रधानमंत्री को उनकी लोकप्रियता का हवाला देते हुए उन्हें इजराइल आने और अपनी पार्टी में शामिल होने का न्योता देते दिखे हैं। यह बहुत स्वाभाविक है क्योंकि जब बदलाव का पैमाना इतना बड़ा हो‚ तो उसके प्रभाव का दायरा भी उतना ही विशाल होता है॥।







