सर्वोच्च अदालत में पेगासस मामले की सुनवाई में सरकार ने न कुछ नया कहा और न कुछ नया किया। शीर्ष अदालत की मंशा के अनुसार सरकार को इस मामले में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करना था‚ जो उसने नहीं किया। सरकार की ओर से पुराने तर्कों को ही एक बार फिर दोहराया गया कि वह इस मामले में विस्तृत हलफनामे के द्वारा कोई भी ऐसी जानकारी बाहर लाना नहीं चाहती जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करे। सरकार का इशारा सीधे–सीधे उग्रवादियों‚ आतंकवादियों और देश विरोधी गतिविधियां चलाने वाले अराजक तत्वों की ओर था। कोई भी सरकार चाहे वह लोकतांत्रिक हो या गैर लोकतांत्रिक अपने शत्रुओं की रणनीतियों के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास करती ही है। कोई भी सरकार उस तकनीक और उसके इस्तेमाल की प्रणाली को उजागर नहीं करती‚ जिसका इस्तेमाल वह शत्रुओं के विरुद्ध करती है। भारत में हजारों आतंकी गतिविधियों को अगर क्रियान्वित होने से पहले ही विफल किया गया तो उसके पीछे इसी तरह की जासूसी थी। यहां तक तो सरकार की दलील उचित प्रतीत होती है‚ लेकिन जब सर्वोच्च न्यायालय यह कहता है कि उसे कोई भी ऐसी जानकारी नहीं चाहिए जो जनहित में न हो अथवा देश की सुरक्षा के लिए खतरा बने। उसके सामने कुछ ऐसी याचिकाएं हैं जो उसने स्वीकार की हैं और जिन्हें निपटाने के लिए उसे कुछ–न–कुछ निर्णय देना ही है। याचिकाओं का केंद्रीय अरोप निजता के हनन का है। सर्वोच्च न्यायालय को विधि के अनुसार निजता के अधिकार के उल्लंघन पर दोष या निर्दोषिता पर फैसला करना ही है‚ लेकिन यह फैसला तब तक नहीं हो सकता जब तक कि सरकार शीर्ष अदालत में उन चीजों को प्रस्तुत न करे जिन्हें कि कोर्ट चाहता है। इसलिए उसकी दरकार विस्तृत हलफनामे की है। सरकार का संकट यह है कि हलफनामा देकर वह ऐसा कुछ बाहर लाना नहीं चाहती‚ जिससे उसके लिए नया संकट खड़़ा हो जाए। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार की कमजोरियां स्पटतः सामने आ रहीं हैं और इसके साथ उसकी दुविधा और गहरी हो रही है। इससे लोगों का संशय भी गहरा हो रहा है। अब सबकी नजर शीर्ष अदालत के उस अंतरिम आदेश पर रहेगी जो उसने २–३ दिन में देने को कहा है। हो सकता है कि इस अंतरिम आदेश के बाद यथास्थिति में थोड़Ãा बदलाव आए‚ लेकिन इस समय तो सरकार की स्थिति सांप–छूछूंदर जैसी ही है।
धरना-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर की जगह कोई और स्थान हो?
सुप्रीम कोर्ट में आज दाखिल एक याचिका में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का मुद्दा भी उठ गया. दरअसल, याचिका में अपील...







