जातीय जनगणना का मुद्दा इन दिनों काफी चर्चा में है। इसके निमित्त विभिन्न राजनीतिक दलों के अनेक नेताओं ने जातीय जनगणना कराने के पक्ष में आवाज भी उठाई है। बिहार और उप्र में तो यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। बिहार विधान सभा एवं विधान परिषद में तो जातीय जनगणना को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने सकंल्प भी पारित करवाया है। अब बिहार के मुख्यमंत्री के साथ–साथ अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडल भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर जातीय जनगणना के लिए दबाव भी बनाने जा रहे हैं। यह विषय चर्चा में होने के कारण इसके फायदे और नुकसान के बारे में जानना महkवपूर्ण हो जाता है। जातीय जनगणना के प्रति अपनी आवाज बुलंद करने वाले नेताओं को भी इस पर गंभीरता से अवश्य विचार करना चाहिए; क्योंकि यह साधारण विषय नहीं है‚ अपितु यह सीधे राष्ट्र के खिलाफ लिया जाने वाला निर्णय सिद्ध होगा। ऐसा नहीं है कि जातिगत जनगणना की यह चर्चा देश में पहली बार शुरू हुई है। भारत में अंतिम बार सन १९३१ में जातिगत जनगणना की गई थी। पुनः १९४७ में देश आजाद होने के पश्चात १९५१ में तत्कालीन सरकार के पास भी जातीय जनगणना कराने का प्रस्ताव आया था‚ परंतु तब के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने यह कह कर उसको खारिज कर दिया कि जातीय जनगणना कराए जाने से देश का सामाजिक ताना–बाना बिगड़ सकता है। इसके बाद सन् २०११ में आर्थिक आधार पर सर्वेक्षण हुआ और उसी आधार पर आज आर्थिक रूप से पिछड़े हुए गरीब लोगों के लिए योजनाएं तैयार की गई। इसी के आधार पर नरेन्द्र मोदी की सरकार द्वारा देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त में अनाज‚ महिलाओं को घरेलू गैस सिलेंडर‚ आयुष्मान योजना जैसे अनेक जन कल्याणकारी योजनाओं के लाभ के साथ–साथ अन्य कई तरह की सुविधाएं प्रदान की जा रही है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज जो राजनेता अपने आप को लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया का अनुयायी बताकर राजनीति कर रहे हैं‚ वही जातीय जनगणना की मांग जोर–शोर से कर रहे हैं‚ जबकि इन महापुरुषों का भी मानना कि जातीयता भारत लिए अभिशाप है। लोकनायक ने संपूर्ण क्रांति की सात क्रांतियों में सामाजिक क्रांति को सबसे महत्वपूर्ण माना था। उन्होंने कहा था कि जातीयता के भाव जो लोगों के मन में बैठे हुए हैं‚ उनसे हर क्षेत्र प्रभावित होता है। आज उनकी आत्मा कचोट रही होगी कि उनके कथित शिष्य ही जातीय जनगणना की मांग कर रहे हैं। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर भी जातिवाद के घोर विरोधी थे। जाति के खिलाफ दोनों नेताओं के समान मत थे। डॉ. आंबेडकर कहा करते थे कि जाति से आर्थिक दक्षता में वृद्धि नहीं होती। जातीयता नस्ल में सुधार नहीं कर सकती और न ही उसने ऐसा किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक समरसता के लिए अनेक संकल्प और प्रकल्प के माध्यम से महत्वपूर्ण काम किया है। इस संदर्भ में सामाजिक समरसता के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सर संघचालक बाला साहेब देवरस के कार्य को मील का पत्थर माना जाता है। इनके अलावा महात्मा गांधी‚ विनोबा भावे‚ पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसी महान विभूतियों ने भी जाति प्रथा की घोर निंदा करते हुए सामाजिक समरसता की बात की है। जातीय जनगणना से राष्ट्र का बहुत अधिक अहित होगा। इससे जातीय राजनीतिकरण बढ़ेगा और समाज का विभाजन होगा। इससे राष्ट्र की एकता और अखंडता को भी क्षति पहुंचने की आशंका है। भारत के कुछ राजनेताओं को भ्रम है कि जातीय जनगणना से उन्हें नये वोट–बैंक मिल जाएंगे‚ परन्तु उनका वोट–बैंक तो उन्हीं की जाति और उप–जातियों के उम्मीदवार चौपट कर देंगे। यदि सभी जातियों के लोग ऐसा करेंगे तो यह देश एक राष्ट्र नहीं रहेगा‚ हजारों जातियों का अखाड़ा बन जाएगा। जातीय जनगणना का दूसरा दुष्परिणाम यह होगा कि समाज में जातीय वैमनस्यता का विस्तार तेजी से होगा। इसका तीसरा दुष्परिणाम यह होगा कि इससे सामाजिक समरसता का ताना–बाना भी टूटेगा। जातीय जनगणना से जिन जातियों की जनसंख्या कम होगी उनमें अपनी जातियों की जनसंख्या बढ़ाने की भी होड़ लग सकती है। इससे चौथे दुष्परिणाम के रूप में सरकार की अहम नीति ‘जनसंख्या नियंत्रण’ भी प्रभावित हो सकती है। इससे पांचवें दुष्परिणाम के रूप में आरक्षण का मामल भी जटिल हो जाएगा। इस तरह जातीय जनगणना बिल्कुल ही तर्कसंगत नहीं दिखती है। इस तरह सीधे शब्दों में कहा जाए तो ‘जातीय जनगणना’ भारत की एकता और अखंडता को ठेस पहुंचानेवाली जनगणना है।
पटना मैनेजमेंट एसोसिएशन ने आयोजित किया बीमा जागरूकता सत्र
पटना, 1 अगस्त। पटना मैनेजमेंट एसोसिएशन (PMA) ने इंडियन सोसाइटी फॉर ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट (ISTD), पटना चैप्टर के सहयोग से...







